ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने का मतलब..

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-संजय कुमार सिंह।।

ज्योतिरादित्य अगर सिर्फ कांग्रेस छोड़ते तो यह माना जा सकता था कि पार्टी में उनकी उपेक्षा हो रही थी और पर्याप्त सम्मान नहीं मिल रहा था इसलिए उन्होंने पार्टी छोड़ दी। इसमें कोई बुराई नहीं थी। सामान्य बात थी। कोई भी पार्टी किसी व्यक्ति को उसकी अपेक्षा के अनुसार सम्मान दे या दे पाए यह जरूरी नहीं है और उपेक्षित होकर पार्टी में बने रहने का कोई मतलब नहीं है। पर पार्टी छोड़कर किसी और पार्टी में जाने के अलग मायने हैं। आपके पास एक विकल्प था। आप उस पार्टी की नीतियों सिद्धांतों से सहमत हैं। उसपर काम कर सकते हैं उसे देश हित में मानते हैं। इसलिए असंतुष्ट थे। असंतुष्ट होने का कारण भी बदला हुआ लगता है। सिंधिया चूंकि अभी भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं इसलिए मैं ऐसा कुछ नहीं कहूंगा पर पार्टी छोड़ने से मैं सहमत हूं। किसी को भी लगे कि पार्टी में उसकी उपेक्षा हो रही है तो छोड़ देना चाहिए। अपमानित होने का कोई मतलब नहीं है। अपमानित वही होता है जिसके पास विकल्प न हो और विकल्प न होने की स्थिति में व्यक्ति को तय करना होता है कि एक बड़ी पार्टी में ज्यादा अपमान हो रहा है या बिना पार्टी के रहने में ज्यादा होगा। व्यक्ति अपने हिसाब से निर्णय करता है। ममता बनर्जी और शरद पावर ने भी कांग्रेस छोड़ी थी और अपनी अलग पार्टी बनाई।
नेहरू गांधी परिवार का अध्यक्ष होने के कारण कांग्रेस (पार्टी) पर वंशवाद का आरोप लगता है। पर मुद्दा यह है कि एक-एक कांग्रेस ममता बनर्जी के पास और शरद पवार के पास भी है। उसमें वंशवाद नहीं है (मान लीजिए)। इनसे पहले भी नेहरू-गांधी के कांग्रेस से लोग अलग होते रहे हैं। अगर मुझे ठीक से याद है तो इंदिरा गांधी भी कांग्रेस से अलग हो गई थीं और उन्होंने अपनी अलग कांग्रेस (आई) बनाई थी। अब मूल कांग्रेस कौन था? जो इंदिरा गांधी ने छोड़ा या जो अलग अपनी बनाई। तकनीकी तौर पर तो मूल कांग्रेस वही होगा जिससे अलग होकर इंदिरा गांधी ने अपनी अलग इंदिरा कांग्रेस या कांग्रेस आई बनाई। उस मूल कांग्रेस का क्या हुआ मुझे नहीं पता ना अभी वह मुद्दा है। पर इंदिरा गांधी ने जो कांग्रेस बनाई उसे भाई लोगों ने मूल कांग्रेस मान लिया। यह कांग्रेस की कमी नहीं, इंदिरा गांधी की महानता है। जो चाय बेचने से नहीं आई होगी। उसी मूल या इंदिरा कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया थे। आपको लगता है कि यह वंशवाद है तो मुझे कुछ नहीं कहना। उसमें राजा अमरेन्द्र सिंह भी हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया इंदिरा कांग्रेस में इसलिए थे कि उनके पिता, माधव राव सिंधिया उसी कांग्रेस में थे। वरना माधव राव सिंधिया की मां (अब दिवंगत) और बहनें भाजपा में हैं सबको पता है। इसके बावजूद माधव राव सिंधिया कांग्रेस में थे तो साबित उन्हें करना था कि मन, वचन धर्म या चाल, चरित्र और चेहरे से कांग्रेसी हैं।
मुझे नहीं पता कांग्रेस में उनका अपमान उन्हें जांचने के लिए किया गया या इसलिए कि वे अपनी पसंद के अनुसार पार्टी चुन लें। लेकिन अगर कांग्रेस में जांच हो रही हो – कि वे मूल रूप कांग्रेसी हैं और इंदिरा गांधी ने जो वंश वाली कांग्रेस अलग की उसमें रहेंगे या नहीं? तो यह पता चला कि वे भाजपा में भी जा सकते हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस में उनके साथ कुछ गलत हुआ। गलत उन्होंने अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के साथ मिलकर किया। यह बता दिया कि वे कांग्रेसी होने के साथ-साथ भाजपाई भी हैं। यानी दोनों हैं यानी दोनों नहीं हैं। दोनों नहीं हैं से मेरा तात्पर्य यह है कि वे बस राजनीतिज्ञ हैं उन्हें पद और अधिकार चाहिए जिसे वे जनता की सेवा करना कह रहे हैं। जनता की सेवा करने के लिए पद जरूरी नहीं होता है। यह बताने की जरूरत नहीं है। ऐसे में अगर वे अपने साथ 20 विधायक भी ले गए और मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार गिर सकती है तो यह उनकी राजनीति है। इसका मुकाबला कांग्रेस और कमलनाथ करेंगे और उसमें जो भी करेंगे वह गलत नहीं होगा। क्योंकि बार-बार चुनाव कराना जनहित या देशहित नहीं है।
अभी जो स्थितियां बनी हैं उसमें मध्य प्रदेश के 20 विधानसभा क्षेत्रों में फिर से चुनाव कराने की जरूरत हो सकती है। यह जनता के पैसे और समय की बर्बादी है। पांच साल के लिए चुने गए विधायकों का इस्तीफा देना या उनसे दिलवाना जनादेश की तौहीन है। भाजपा कर्नाटक में ऐसा करके सफल रही है। गोदी मीडिया ने उसे अनैतिक नहीं कहा और बाकी लोगों के कहने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि भाजपा सुनती नहीं है और जनता तक बात पहुंचती नहीं है। जो लोग पांच साल के लिए एक पार्टी से चुने गए वे अगर डेढ़ साल बाद ही उस पार्टी से इस्तीफा देते हैं तो क्या उन्हें उसी विधानसभा में उसी अवधि के लिए फिर से चुनाव लड़ना चाहिए? इस विधानसभा में रहकर आप सरकार का समर्थन और विरोध दोनों कर सकते हैं तब भी? कर्नाटक में ऐसे विधायकों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी। पर वे अदालत से जीत गए और उन्हें जीतने का मौका देने के लिए उपचुनाव की तारीख टाली गई थी। बाद में दूसरी पार्टी के टिकट पर वे चुनाव जीत गए। कुल मिलाकर देश में हिन्दू मतों का ऐसा ध्रुवीकरण कर दिया गया है कि किसी के भी फैसले उसी से प्रभावित लगते हैं। इसमें ना संविधान का ख्याल है ना सरकारी धन का उसकी चिन्ता शिक्षा पर होने वाले खर्च के लिए की जाती है और तब भी संविधान की परवाह नहीं की जाती। आम जनता को यह सब समझना होगा। पर गोदी मीडिया के रहते यह संभव नहीं है और जब सब बदल ही गए हैं तो क्या इसकी जरूरत है भी? इस तरह कांग्रेस मुक्त भारत का लक्ष्य पूरा हो सकता है पर क्या कांग्रेस का यह कहना गलत है कि देश में विपक्ष भी होना चाहिए और वह उसे लड़कर हराएगी। क्या सिंधिया जैसे शाही या वंश परंपरा के राजनीतिज्ञों के रहते यह संभव है?

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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