इलाहाबाद हाईकोर्ट का वो फैसला और ये आदेश – तब और अब

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-संजय कुमार सिंह।।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद देश में इमरजेंसी लगी थी। वह कानून का उपयोग था। उसका विरोध याद कीजिए। एक जमाना वह था। अब इमरजेंसी के बगैर सरकार ने नागरिकों के खिलाफ जो किया उसका कानून में प्रावधान नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला फिर आया है। अब देखिए स्थिति और नोट कीजिए तर्क। सरकार के अधिकार और तानाशाही की स्वीकारोक्ति साफ नजर आएगी। हिन्दी अखबारों की स्थिति यह है कि आज यह खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में ही निपट गई है या पहले पन्ने पर है ही नहीं और लीड भी है।
एनडीटीवी डॉट कॉम की एक खबर के अनुसार, लखनऊ होर्डिंग केस में हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार ने पोस्टर नहीं हटाए हैं। एएनआई ने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के सलाहकार, शलभमणि त्रिपाठी के हवाले से लिखा है, “अभी हम लोग इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को जांच रहे हैं। इसमें देखा जा रहा है कि किसके आधार पर पोस्टर हटाने का आदेश दिया गया है। हमारे विशेषज्ञ इसे जांच रहे हैं।“ साथ ही उन्होंने कहा, “सरकार तय करेगी कि अब कौन से विकल्प का सहारा लिया जाएगा। मुख्यमंत्री को इस पर फैसला लेना होगा। लेकिन यह तय है कि सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों को बिल्कुल नहीं बख्शा जाएगा।“
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्येयमूर्ति रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने कहा, ‘हमें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार की कार्रवाई, जो कि इस जनहित याचिका का विषय है, और कुछ नहीं बल्कि लोगों की निजता में अवांछित हस्तक्षेप है।’ कोर्ट ने यूपी सरकार को सभी पोस्टर हटाने के आदेश देते हुए लखनऊ प्रशासन से इस मामले में 16 मार्च तक रिपोर्ट तलब की है। राज्य सरकार अपनी कार्रवाई का चाहे जितना और जैसे बचाव करे, सच यही है कि हाईकोर्ट ने उसकी दलीलों को नहीं माना और होर्डिंग हटाने के आदेश दिए हैं। राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है और अगर ऐसा कोई निर्णय हो तो वह भी खबर है।
यह सब पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में निपटना देने लायक नहीं है और ना ही ऐसा मामला है कि पहले पन्ने पर जगह नहीं दी जाए। निश्चित रूप से यह संपादकीय स्वतंत्रता और विवेक का मामला है और जैसा मैं कहता रहा हूं, सरकार विरोधी खबरों के मामले में ज्यादातर हिन्दी अखबारों का फैसला एक जैसा होता है। आइए, देखें आज के अखबारों में यह खबर कहां कैसे छपी है। अंग्रेजी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड की तरह है। तीन कॉलम में तीन लाइन का शीर्षक औऱ दो लाइन का उपशीर्षक।


अखबार के पहले पन्ने पर ऊपर से नीचे तक चार कॉलम में विज्ञापन है और इस तरह यह मुख्य लीड ही लग रहा है। मुख्य लीड शेयर बाजार गिरने पर है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस प्रकार होगा – “अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को लताड़ा : प्रदर्शनकारियों के नाम वाले पोस्टर हटाए जाएं”। उपशीर्षक में निजता के उल्लंघन की बात के साथ यह भी कहा गया है कि अदालत ने कहा, राज्य सरकार के पास ऐसा करने का कोई कानूनी आधार नहीं है। द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। दो लाइन का शीर्षक है, हाईकोर्ट ने योगी से कहा, बैनर्स नहीं।
हिन्दी अखबारों में दैनिक भास्कर ने एजेंसी की खबर दो कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ छापी है। फ्लैग शीर्षक है, “सीएए विरोधी प्रदर्शन : योगी सरकार को हाईकोर्ट से झटका।” मुख्य शीर्षक है, कोर्ट ने कहा, 16 मार्च से पहले हटाएं फोटो वाले होर्डिंग्स, यह निजता के खिलाफ है। इसके बाद अखबार ने एक कॉलम में दो लाइन का इंट्रो लगाया है, योगी सरकार मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। पूरी खबर पहले पन्ने पर 23 लाइनों में खत्म हो गई है। टर्न नहीं है। नवोदय टाइम्स, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं दिखी।
हिन्दुस्तान में यह खबर पहले पन्ने पर एक कॉलम में दो लाइन के शीर्षक है, सीएए विरोधियों का पोस्टर हटाएं। आठ लाइन की खबर के साथ अंदर के पन्ने पर ब्यौरा होने की सूचना है। नवभारत टाइम्स में यह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर सिंगल कॉलम में है। तीन लाइन के शीर्षक के साथ कुल 16 लाइन में खबर निपटा दी गई है। अंदर विवरण होने की कोई सूचना पहले पन्ने पर नहीं है। हिन्दी के जो अखबार मैं देखता हूं उनमें सिर्फ अमर उजाला में यह खबर लीड है। अखबार ने मुख्यमंत्री की तस्वीर के साथ उनका पक्ष भी छापा है, आदेश का कर रहे अध्ययन, जो जनहित में होगा …. निर्णय उसी हिसाब से लेंगे। अखबार ने शीर्षक लगाया है, “आरोपियों के पोस्टर लगाना निजता में गैरजरूरी दखल, फौरन हटाएं : हाईकोर्ट।”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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