सच क्या है..

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दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस चर्चा में रहा। गूगल के डूडल से लेकर सोशल मीडिया तक पर महिला दिवस छाया रहा। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो एक हफ्ते पहले ही ऐलान कर दिया था कि वे इस दिन अपना सोशल मीडिया एकाउंट महिलाओं को समर्पित करेंगे। आज 7 महिलाओं ने उनके सोशल मीडिया एकाउंट्स पर पोस्ट कर अपने जीवन अनुभव लोगों से साझा किए। राष्ट्रपति भवन में भी चुनिंदा महिलाओं को सम्मानित किया गया। एक दिन के इस ताम-झाम से महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार नहींं होता है, यह बरसों बरस के अनुभव से साबित हो चुका है। महिलाओं की स्थिति तभी सुधर सकती है, जब समाज इसके लिए तैयार हो और सरकार अपनी नीतियों से समाज को इसके लिए तैयार करे।

भारत में बेशक महिलाओं की दशा पहले से बेहतर हुई है, लेकिन पूरी तरह बराबरी का हक उन्हें अब भी नहीं मिला है। घर या बाहर दोनों जगह बिना संघर्ष किए उन्हें आसानी से कुछ हासिल नहीं होता। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने मोदी सरकार के सामने सही सवाल उठाया है कि वे अगर महिलाओं को सम्मान ही देना चाहते हैं तो बरसों से लटके महिला आरक्षण विधेयक को पारित क्यों नहीं करवा देते। जाहिर है मोदी सरकार इसका जवाब देना जरूरी नहीं समझेगी। वैसे देश के बाहर भी महिला अधिकार से जुड़ा एक सवाल उठा है, जिसके तार मोदी सरकार से जुड़ रहे हैं। मामला दुबई की राजकुमारी लतीफा की गुमशुदगी और फिर कथित तौर पर सुरक्षित बचाने का है। 

दरअसल ब्रिटेन की एक कोर्ट में भारत पर आरोप लगे हैं कि इंटरनेशनल नियमों को तोड़कर लतीफा को कैद किया गया और फिर उनके पिता यानी यूएई के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम को सौंप दिया गया। यह मामला 2 साल पुराना है। 2018 में लतीफा का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उनके परिवार ने उन्हें बंधक बना कर रखा है और उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा था कि वे यहां से निकलने की कोशिश करेंगी।  इसके महीने भर बाद लतीफा दुबई से निकलने में कामयाब हो गईं। लेकिन भारतीय नेवी कमांडो ने उन्हें गोवा के निकट अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर पकड़ कर तथाकथित तौर पर उनके पिता को सुरक्षित सौंप दिया। हालांकि विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय दोनों ने इस आरोप पर चुप्पी साधी है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि यह दुबई के शाही परिवार में चल रहे विवाद का मामला है, जिस पर ब्रिटेन की कोर्ट में सुनवाई चल रही है और किसी अन्य देश की सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

गौरतलब है कि ब्रिटिश कोर्ट में इस वक्त शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम और उनकी पूर्व पत्नी जार्डन की प्रिसेंस हया के बीच उनके दो बच्चों की कस्टडी को लेकर सुनवाई चल रही है। प्रिसेंस हया ने डर जताया है कि उनके दोनों बच्चों का भी अपहरण कर लिया जाएगा। इसी सुनवाई में लंदन की कोर्ट ने यह पाया कि शेख मकतूम इससे पहले अपनी दो और बेटियों का अपहरण करवा चुके हैं। उनकी बड़ी बेटी शमसा को 2000 में कैैंब्रिज से अगुवा किया गया था और उसकी छोटी बहन लतीफा को भारत के पास गोवा से। इसलिए कोर्ट ने इस मामले को अतिविशिष्ट मानते हुए प्रिसेंस हया को सुरक्षा मुहैया करवाने के निर्देश दिए हैं। शेख मकतूम और प्रिसेंस हया के इस विवाद से दो साल पुराना लतीफा का मामला फिर चर्चा में आ गया। tu

4 मार्च 2018 को गोवा के पास से पकड़ कर उनके पिता को सौंपा गया था। लतीफा नाास्त्रोमो नाम की एक जलपोत पर थीं, उनके साथ उनकी करीबी मित्र टीना जौहियानेन (टीजे) भी थीं। उन्होंंने लंदन कोर्ट में बताया कि किस तरह गोवा से 30 मील दूर अंतरराष्ट्रीय जल पर उनके वाहन पर भारतीय नौसैनिक अचानक आए और फिर उस पर सवार तमाम लोगों को बंधक बना लिया। वे लगातार चिल्ला रहे थे कि लतीफा कौन है। कुछ समय बाद टीजे ने देखा कि जिस तरह उनके हाथ बंधे हुए हैं, उसी तरह लतीफा को भी बांध लिया गया है। कुछ समय बाद एक अरबी नागरिक को पोत पर लाया गया और उसने लतीफा की पहचान की। लतीफा को जब भारतीय नौसैनिक ले जाने लगे तो वे लगातार अंग्रेजी में यही कह रही थीं कि मुझे शरण चाहिए। मुझे यहीं मार दो, लेकिन मुझे वापस मत भेजो। लंदन कोर्ट का मानना है कि जिस तरह से ये सारा घटनाक्रम हुआ उससे यही लगता है कि लतीफा को बचाया नहीं गया, बल्कि पकड़ा गया है। 

इस पूरे प्रकरण में मोदी सरकार की सहमति मानी जा रही है। हालांकि सरकार ने इस ओर से चुप्पी साधी हुई है।  मगर 4 मार्च 2018 के इस तथाकथित बचाव अभियान के बाद यूएई और भारत के संबंधों में और मजबूती आ गई। बेशक राजकुमारी शमसा, लतीफा और हया का मामला दुबई के शाही परिवार का अंदरूनी मामला है। लेकिन यह महिलाओं के दोयम दर्जे की भी व्यथा-कथा है। जहां उन्हें अपनी मर्जी से, खुलकर जीने की इजाज़त नहीं है। कभी सियासी लाभ के लिए, कभी झूठी इज्जत के लिए उनकी खुशियोंं को रौंदा जाता है। लतीफा का पूरा सच तो शायद ही कभी सामने आए। लेकिन मोदी सरकार पर का नाम जिस तरह इस मामले से जुड़ा है, कम से कम उसका सच जनता के सामने मोदीजी को रखना ही चाहिए। सवाल आधी आबादी के पूरे अधिकारों का है।

(देशबन्धु में आज का संपादकीय)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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