निराशा के अंधकार में जल उठे हैं आशाओ के हज़ारो दिये..

-चंद्र प्रकाश झा।।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (2019) , नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) और नेशनल रजिस्टर ऑफ पॉपुलेशन (एनआरपी) का देशव्यापी विरोध शुरू होने के बाद कुछेक आह्लादकारी बातें उभरी हैं.एक तो यह कि भारतीय संविधान की किताबों की रिकॉर्ड खरीद हो रही है.संविधान की किताब बेस्ट सेलर मान लिया गया है.भारत के संविधान की अंग्रेजी ,हिंदी ही नहीं विभिन्न भारतीय भाषाओं में छपी किताबें खूब बिक रही है. साफ है कि भारत के लोग अपने संविधान की रक्षा के लिए खड़े हो गए हैं. अवाम अब सड़कों, गलियों आदि सार्वजनिक जगह पर विरोध प्रदर्शन , धरना , मार्च , रैली आदि के दौरान भारत के राष्ट्रीय ध्वज को परचम बना लेती है. लोगबाग़, भारत के राष्ट्रगान के सामूहिक कंठ-गान के पहले अथवा बाद में भारतीय संविधान की हिफाजत के नारे लगाते नज़र आते हैं.’ न्यू इंडिया ‘ के हुक्मरानों के खिलाफ भारत भर में सर्वाधक लोकप्रिय गान, ‘ आजादी का तराना ‘ बन गया है. इसके तत्सम , तद्भव , देशज , विदेशज शब्दों के साथ अनेक रूप उभरे हैं. उन सबका मूल मुखड़ा वही है जो जेएनयू के छात्र नेता रहे कन्हैया कुमार डफली बजा कर गाते हैं. आज़ादी शब्द भारतीय समाज की हर भाषा में घुल मिल गया है. मां और कॉमरेड के बाद शायद यही वो शब्द है जो सर्वभाषिक बन चुका है.

संविधान की किताबें
संविधान की किताबों का प्रकाशक-वितरक का पुराना स्टॉक ख़तम हो गया तो नए नए संस्करण बाज़ार में आने लगे है. ऑनलाइन बिक्री करने वाली कंपनी अमेज़ोन के भारत में कारोबार में खास बात यह उभरी कि भारत का संविधान इस तरह की किताबों की केटेगरी में ‘ बेस्ट सेलर ‘ है. पहले सिर्फ वकील या कानून के छात्र इस किताब को खरीदते थे. अब हर तबके के लोग इसे पढ़ने के लिए खरीद रहे हैं.कुछ प्रकाशकों ने संविधान की संरक्षित उस मूल प्रति की तरह के संस्करण भी प्रकाशित किये हैं, जिसमें संविधान की उद्देशिका (प्रस्तावना) की कैलीग्राफी से लेकर मूल संविधान में अंकित या मुद्रित चित्र और उसपर संविधान सभा के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर भी हैं.
दिल्ली के युवा वकील ने बताया कि वकील भी संविधान के तरह तरह के संस्करण खरीद रहे है.रांची के भाषा प्रकाशन के संचालक उपेन्द्र प्रसाद सिंह ने , जिन्होंने नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की है बताया कि संविधान पर डी डी बसु और एम पी जैन की लिखी किताबें सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।

प्रस्तावना सामुहिक-पाठ
आह्लादकारी बात यह भी है कि इस बरस गणतंत्र दिवस के अवसर पर अनेक जगह संविधान की उद्देशिका का सामूहिक पाठ हुआ.बिहार के एक गांव बसनही के कुछ बेरोजगार युवकों द्वारा हाल में खोले निजी स्कूल ने इस लेखक को गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में बच्चे-बच्चियों की प्रभात फेरी का साथ देने के साथ ही राष्ट्रीय तिरंगा फहराने के उपरान्त संविधान की प्रस्तावना का अंग्रेजी और हिंदी में सामूहिक पाठ कराने के लिए आमंत्रित किया था.लेखक यह देख चौंक गया कि उन स्कूली बच्चों ने कई गांवों की कई मील की प्रभात फेरी में आज़ादी और गणतंत्रवाद के ही नहीं भारतीय प्रस्तावना में उल्लेखित सम्प्रभुता, लोकतंत्र , समाजवाद और सेकुलर जैसे हर शब्द और अवधारणा के समर्थन में नारे भी लगाए। कुछ नारे थे : वीर कुंवर सिंह जिंदाबाद- टीपू सुलतान जिंदाबाद , राम प्रसाद बिस्मिल अमर रहें-अशफाकउल्ला अमर रहे , महात्मा गांधी अमर रहें ,शहीद भगत सिंह अमर रहें। आज़ादी और सम्प्रभुता को लेकर एक छात्र का नारा गज़ब का था: मां का दूध होगा हराम ,अगर भारत बन गया फिर से गुलाम.

प्रभात फेरी में अगल बगल के स्कूलों के बच्चे-बच्चियां भी शामिल होते गए.ध्वजारोहण और संविधान प्रस्तावना के सामूहिक पाठ के बाद बच्चों के आग्रह पर जब इस लेखक ने उन्हें माइक पर राष्ट्रगान की बांसुरी धुन सुनाई तो बाद में उनसे एक छात्र ने कहा ‘ हमारे राष्ट्रगान की धुन हर वाध्ययंत्र पर बने’. लेखक ने माइक पर जब यह इंगित किया कि बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी हमारे राष्ट्रगान के रचियता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की लिखी कविता, ‘ अमार सोनार बांग्ला ‘ है और वो पूरी दुनिया में अद्वित्तीय कवि हैं जिनकी कविताएं दो देशों का राष्ट्रगण है तो बच्चों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन बच्चो में से एक ने कार्यक्रम की वीडियो भी बनाई.

पैन इंडिया रेनेसां

ये महज आंदोलन नहीं ‘ विकेंद्रित विद्रोह ‘ है जिसकी कमान मुख्य रूप से छात्रों ,युवाओं और महिलाओं ने संभाल रखी है.कामगार भी इसके साथ है. इस बार का आंदोलन 15 अगस्त 1947 से स्थगित कई विमर्श को आगे बढ़ा कर ‘ पैन इंडिया रेनेसां ‘ लाने के रास्ते पर चल पड़ा है.दिल्ली के शाहीन बाग में औरतो का बेमियादी धरना उस का प्रतीक बन चुका है.जो कुछ सामने आ रहा है वह रचनात्मक ही नहीं प्रयोगधर्मी और अभिनव है. और इसका नेतृत्व किसी भी एक राजनीतिक दल या गठबंधन के पास नहीं है.यह वाकई में अवामी है.
बुर्का , हिजाब में होने के बावजूद मुस्लिम महिलाओं और युवतियों ने जो नेतृत्वकारी भूमिका निभाई हैं और छात्रो -युवकों ने जिस तरह सांप्रदायिक फासीवादियों को नकार दिया है वह गौरतलब है.खतरा सिर्फ एक बात का है कहीं ये सब 1857 की तरह सही नेतृत्व के अभाव में बिखर ना जाए.अच्छी बात यह है कि इसका एक अलहदा नेतृत्व उभरना शुरू हो गया है जो 8 जनवरी को 25 करोड़ कामगारों के भारत बंद कार्यक्रम के बाद बढ़ा है.यह बात हालिया दिल्ली दंगों में भाईचारा कायम रखने की अनगिनत कहानियों से भी उभरी है कि नेतृत्व की नई कतारें जमीं से उभरने लगी हैं , जिसने हुक्मरानों की तमाम कोशिशों के बावजूद वैमनस्य को पनाह नहीं लेने दी है.
ये कोई धर्मयुद्ध नहीं है.ये किसी भी धर्म के पक्ष में या फिर विरोध में बढ़ता नजर आते ही उसे रोकने में नेतृत्व सफल रहा है.ये स्वतःस्फूर्त अवामी आंदोलन या विद्रोह है और उसके नारे आदि भी ‘ सबरंगी ‘ ही उभर रहे हैं. धार्मिक नारों से बचने में कामयाबी की कई कहानियां सामने आई हैं. आंदोलनकारी जानते है कि ‘ भारत माता की जय ‘ और ‘ अल्लाहु अकबर ‘ जैसे कुछ नारों के धार्मिक होने या न होने के बारे में स्पष्ट जनमत नहीं है, इसलिए उनके प्रयोग से बचा जाए. राष्ट्रगान और आज़ादी तराना सबको जोड़े रखने में सक्षम है. इसी तरह के अन्य क्रांतिकारी गान और नारे भी उभर रहे हैं.
जिन लोगों ने मास मूवमेंट में जन संगठनों की ओर से काम किया है वे सलाहकारी भूमिका में उतर चुके हैं. करीब सौ साल से झूठ फैलाने के जो कारखाने चल रहे थे उनकी एक नहीं चल रही है. असत्य के शातिर खिलाड़ी दिल्ली के सिवा कहीं कोई दंगा फसाद नहीं करा सके हैं. उन्हें नहीं सूझता कि वे करें तो करें क्या.

धार्मिक सदभाव
सन 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सभी धर्मों के लोगों के बीच जो एकता रही वो मौजूदा अवामी विद्रोह में भी बनी हुई है.इसे हर तरह से रेखांकित करने की दरकार समझी गई ताकि खुराफाती हुक्मरान इस एका को तोड़ नहीं सकें. मौजूदा हुक्मरान और उनके समर्थक लाख चाह कर भी साम्प्रदयिक विभाजन नहीं कर सके हैं, जिससे उनकी बौखलाहट स्पष्ट नजर आती है.अपनी बौखलाहट में अगर हुक्मरान नागरिक मामलों में सैन्य दखलंदाजी को शह देते हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
आजादी का तराना
न्यू इंडिया के हुक्मरानों के खिलाफ भारत भर में सर्वाधक लोकप्रिय गान, आजादी का तराना बन गया है. आज़ादी के तराना के तत्सम , तद्भव , देशज , विदेशज शब्दों के अनेक रूप उभरे हैं.सबका मूल मुखड़ा वही है जो जेएनयू के छात्र नेता रहे कन्हैया कुमार डफली बजा कर गाते हैं. आज़ादी शब्द , भारतीय समाज की हर भाषा में घुलमिल गया है.
मां और कॉमरेड के बाद आज़ादी ही वो शब्द है जो अब सर्वभाषिक बन चुका है.

टेकीज
नए जनउभार के समर्थन में तकनीकी मदद देने के लिए देश के जिले-जिले में टेकीज बड़ी संख्या में जिस तरह मैदान में उतरे हैं उनसे फासीवादियों के आईटीसेल के हाथ-पैर फूलने लगे हैं. टेकीज शब्द-सम्बोधन संचार अभियांत्रिकी में दक्ष उन अभियंताओं आदि के लिए मेटाफर की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जो सूचना प्रोधोगिकी के उपयोग से अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य , शिक्षा , संस्कृति और मनोरंजन ही नहीं राजनीति तक की गत्यात्मकता के तरह-तरह के प्रयोग लैब से जमीन पर उतार लाते हैं। वो दिन लद गए जब अधिकतर टेकीज का आधार अतिविकसित अमेरिका का सिलिकन वैली या फिर भारत जैसे विकासशील देशों में से बेंगलुरु महानगर ही होता था।टेकीज अब भारत के टायर-1 और टायर -2 नगर ही नहीं लगभग हर जिले में फ़ैल चुके हैं. इन टेकीज ने स्वैक्षिक रूप से अवामी प्रतिरोध के कार्यक्रमों की वीडियो रिकार्डिंग कर और उनमें फैज़ अहमद’ फैज़ ‘ की लोकप्रिय नज़्म हम देखेंगे के विभिन्न भाषाओं में वाचन-गायन, जेएनयू के छात्र नेता रहे कन्हैया कुमार का आज़ादी का तराना , असरारुल हक़ मज़ाज़ ‘ लखनवी का अलीगढ़ तराना (ये मेरा चमन , ये मेरा चमन , मैं इस चमन का बुलबुल हूं) और मुम्बईया हिंदी फिल्मों के गीतों के लोकप्रिय मुखड़े से लेकर रविंद्रनाथ टैगोर रचित राष्ट्रगान तक का सामूहिक कंठगान और बांसुरी आदि वाध्ययंत्रो पर उनके सुमधुर वादन तक को मिश्रित किया है. इन टेकीज का ही कमाल है कि हैदरबाद , कोटा ही नहीं केरल के एक छोर से दूसरे छोर तक के हालिया विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें ड्रोन कैमरा से पूरे देश के लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रहे. ये सब भारत के सत्ताधारी वर्ग की सबसे भयावह कल्पना के भी परे चला गया है कि मस्जिदों में नमाज पढ़ कर निकलने वाले हज़ारों लोग प्री-रेकर्डेड राष्ट्रगान को उच्च वॉल्यूम पर बजाने का सामूहिक रूप से कंठगान से साथ दें. ये टेकीज ऐसी तस्वीरों और वीडियो को उकेर देते हैं जिनमें पुलिसिया कार्रवाई की आशंका महसूस कर आंदोलनकारी राष्ट्रगान गाने लगते है. या फिर पुलिस वालों को गुलाब का फूल भेंट करते नज़र आते हैं। अपने आंदोलन के दौरान सार्वजनिक स्थलों पर गुलाब का फूल भेंट करने की भारतीय परिवेश में शुरुआत जेएनयू के 2016 के छात्र-शिक्षक आंदोलन में जी टीवी जैसे असत्य चैनल वालों से हुई थी।आंदोलनकारी मानो ये कहते हैं हर सताइश का हमने इक तबस्सुम से दिया जवाब / इस तरह गर्दिशें दौरां को रुला दिया हमने
लेकिन इन टेकीज के राज्य, क्षेत्र और राष्ट्रीय स्तर पर आपसी समन्वय की जरुरत से इंकार नहीं किया जा सकता है.उन्हें इस जन-उभार का और प्रभावी रूप में साथ देने के लिए संगठित हस्तक्षेप करने की जरूरत रेखांकित की गई है.उनके सामने ये सवाल भी उठने लगा है कि इंटरनेट का उपयोग फेसबुक और गुगल से स्वतंत्र होकर करने के लिए क्या किया जा सकता है. यह सवाल तो सामने है ही कि अगर सरकार ने पूरे देश या अधिकतर राज्यों में इंटरनेट प्रतिबंधित कर दिया तो कैसे काम चलेगा। कुछ टेकी हांगकांग के आंदोलन से सबक लेकर वे उपाय ढूंढने में लगे हैं कि उनके बनाये-वितरित वीडियो में भागीदार लोगों की शिनाख्त करने के लिए पुलिस की फेसियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी का तोड़ हाथ लगे।
आंदोलनकारियों और इन टेकीज ने हांगकांग के अलावा विगत में काहिरा (मिस्र) के तहरीर चौक पर वसंत जनउभार की शुरुआती सफलता में फेसबुक के समर्थन की वजह से भी सबक लिए हैं। इस सिलसिले में कुछेक वर्ष पूर्व बृहन्मुम्बई यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स की एक संगोष्ठी में यूरोप से आईं मध्य एशिया इतिहास की प्रोफ़ेसर लालेह खलिली के पेश अध्ययन का हवाला दिया गया कि फेसबुक ने ये साथ शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने के समय जनाधार बढ़ाने के लिए किया था और उसने अपना वाणिज्यिक मकसद पूरा हो जाने पर आंदोलन के समर्थन में दिया साथ छोड़ दिया।उस संगोष्ठी में जेएनयू के सिद्धांतकार रहे छात्र नेता और अभी इतिहास के प्रोफेसर जयरस बानाजी भी उपस्थित थे.

अलहदा मीडिया
परम्परागत मीडिया की संरचना बिल्कुल दरक गई है.गोदी मीडिया के सिद्धहस्त एंकर-एंकर्नियों ‘को भी सत्य दिखने लगा है कि उनके दिन लद गए हैं.सब नहीं पर उनमें से अधिकतर समझ गए हैं अगर उन्होने जल्दी पलटी नहीं मारी तो उनका तम्बू उखड़ जाएगा.ये सोशल मीडिया का विकास नहीं , अलहदा मीडिया का निर्माण और चमत्कार है जिसमें लाखों युवक युवतियां खुद पत्रकार और वीडियोग्राफर बन गए हैं.उनके साथ माइक्रोसॉफ्ट , गूगल , फेसबुक और ट्विटर को भी कदम ताल करना पड़ गया है.अलहदा मीडिया ‘ सीइंग इज बिलिविंग ‘ पर आधारित है , जो सत्य का विशेषण है.
ये उत्तर आधुनिक रेनेसां है जो पैन इंडियन है. इसने पारंपरिक मीडिया नकार नई मीडिया विकसित करनी शुरू की है. इस आंदोलन की ख़बरों को देने, न देने , छुपाने या फिर उनमें हिन्दू-मुस्लिम ट्विस्ट उत्पन्न करने से लेकर बेतुकी बातें जोड़ने की गोदी मीडिया की शरारत से तंग आकर अवाम ने एक अलहदा मीडिया विकसित करने की पहल की है. भारत में अवामी मीडिया विकसित करने के प्रयास बहुत पहले से आज़ादी की लड़ाई के दौरान से ही होते रहे हैं. लाहौर कॉन्सपिरेसी केस -2 में शहीद भगत सिंह के साथ सह-अभियुक्त रहे और उस ‘ ज़ुर्म ‘ में अंडमान निकोबार द्वीप समूह के सेलुलर जेल में कालापानी की सज़ा भुगत जीवित बचे अंतिम स्वतन्त्रता संग्रामी शिव वर्मा (1904-1997) ने लख़नऊ में 9 मार्च 1996 को मीडियाकर्मियों के एक सम्मलेन के लिखित उद्घाटन-सम्बोधन में खुलासा किया था कि उनके संगठन ने आज़ादी की लड़ाई के नए दौर में ‘ बुलेट के बजाय बुलेटिन ‘ का इस्तेमाल करने का निर्णय किया। इसी निर्णय के तहत भगत सिंह को 1929 में दिल्ली की सेंट्रल असेम्ब्ली की दर्शक दीर्घा से बम-पर्चे फ़ेंकने के बाद नारे लगाकर आत्म-समर्पण करने कहा गया ताकि उनके कोर्ट ट्रायल से स्वतन्त्रता संग्राम के मकसद , दुनिया को बताये जा सके.गोदी मीडिया के सिद्धहस्त एंकर-एंकर्नियों को भी सत्य दिखने लगा है कि उनके दिन लद गए हैं.सब नहीं पर उनमें से अधिकतर समझ गए हैं कि अगर उन्होने जल्दी पलटी नहीं मारी तो उनका तम्बू उखड़ जाएगा.
करीब सौ साल से झूठ फैलाने के जो कारखाने चल रहे थे उनकी एक नहीं चल रही है. असत्य के प्रयोग के शातिर खिलाड़ी दिल्ली के सिवा कहीं कोई दंगा फसाद नहीं करा सके हैं. उन्हें नहीं सूझता कि वे करें तो करें क्या.

रेडियो
‘इंडिया दैट इज़ भारत में रेडियो अभी भी सबसे ज्यादा असरकारी माध्यम है.लेकिन सभी देसी रेडियो ज्यादातर सरकारी या निजी पूंजीपतियों के ही हाथ में है.सरकार ने निजी क्षेत्र में एफएम रेडियो चलाने के लाइसेंस की नीलामी कर उसे चंद घरानों / कम्पनियों के हवाले कर दिया.सरकार ने कम्यूनिटी रेडियो का विस्तार रोक दिया.यह अवामी रेडियो की लगभग भ्रूणहत्या है.सूरज की रौशनी और हवा से लेकर स्पेक्ट्रम (ध्वनि तरंग) तक हिन्दुस्तानी अवाम के अनादि काल से नेचुरल राइट्स हैं. उसे ये प्राकृतिक सम्पदा अधिकार आज़ाद देश में सीधे भारत के संविधान से मिले है और इनके बीच कोई बिचौलिया नहीं है.सरकार क्या इसमें विधायिका और न्यायपलिका भी दखलंदाजी नहीं कर सकती है.टेकीज को सोचना होगा कि तमाम अस्पष्ट बंदिशों के बावजूद अगर ड्रोन कैमरा का इस्तेमाल किया जा सका है तो फिर इंटरनेट प्राधिक्रित या उससे इतर साधनों की बदौलत अवामी रेडियो का प्रयोग कैसे किया जा सकता है? ब्रिटिश राज में नेताजी सुभाषन्द्र बोस के ‘ आज़ाद हिन्द रेडियो ‘ के प्रयोग से क्या हमें कोई सबक नहीं मिलता है?

उच्च न्यायपालिका
एक और आह्लादकारी बात है कि उच्च न्यायपालिका के कुछ न्यायाधीशों ने हाल में कुछ ऐसे निर्णय आदि दिए हैं जो लोकतंत्र और संविधान को शक्ति प्रदान करते हैं.जैसे, बॉम्बे हाईकोर्ट के कुछ ऐसे निर्णय के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड ने मोदी सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से इंगित कर कहा कि असहमति को राष्ट्रविरोधी करार देना लोकतंत्र की जड़ों को चोट पहुंचाता है.अहमदाबाद के गुजरात हाईकोर्ट ऑडिटोरियम में पीडी मेमोरियल व्याख्यान में जस्टिस चंद्रचूड ने कहा : राज्यतंत्र को वैधानिक और शांतिपूर्ण विरोधों को खत्म करने के लिए नहीं लगाया जाए.ऐसा माहौल बने कि नागरिक अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के उन अधिकारों का आनंद ले सकें, जिनमें प्रदर्शन करने का अधिकार और मौजूदा कानूनों के खिलाफ विरोध दर्ज करने का अधिकार भी शामिल है.जस्टिस चंद्रचूड़ ने जनविरोध को लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व बताया.
साभार : जनचौक

  • सीपी नाम से ज्यादा ज्ञात पत्रकार-लेखक अपने गांव से पत्र-पत्रिकाओं, वेब पोर्टल, रेडियो,ब्लौग आदि के लिए और सोशल मीडिया पर नियमित लिखते हैं. उन्होंने हाल में न्यू इंडिया में चुनाव , आज़ादी के मायने ,सुमन के किस्से और न्यू इंडिया में मंदी जैसी ई-बुक लिखी हैं, जो http://NotNul.com पर उपलध हैं.लेखक से [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है.
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