किसकी और कैसी राज्यसभा, जब जरूरत ही खत्म हो गई हो..

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-सुनील कुमार।।
उत्तर-पूर्व की एक महिला पत्रकार ने फेसबुक पर पोस्ट किया है कि मेघालय से राज्यसभा के लिए एक ऐसे व्यक्ति को मनोनीत किया गया है जिसने मुसीबतों के इस दौर में एक शब्द भी नहीं बोला था, अब अगले छह बरस दिल्ली में वह एक मौन सांसद बने रहेगा। उत्तर-पूर्व की ऐसी निराशा देश भर में जगह-जगह दिखती है। बहुत से ऐसे राज्य रहते हैं जहां से राजनीतिक दल विजय माल्या जैसे लोगों को राज्यसभा भेजते हैं, या कम से कम एक पार्टी तो ऐसी है ही जो कि करोड़ों रूपए लेकर अरबपतियों को राज्यसभा भेजते आई है। यह पार्टी चुनाव के वक्त भी अपनी कुछ टिकटों को बेचने के लिए जानी जाती है, और बाकी सीटों पर उसी रकम से चुनाव का खर्च भी निकलता है। चूंकि राज्यसभा सदस्यों का चुनाव वोटर सीधे नहीं करते, और विधायकों के वोट से राज्यसभा सदस्य बनते हैं, इसलिए पार्टियां अपनी मर्जी के उम्मीदवार बनाती हैं, और पार्टी विधायकों पर नजर रखकर वोट भी डलवाती हैं। जब कभी भारत की संसद का ढांचा बनाया गया था, तब किसने सोचा होगा कि उच्च सदन कहलाने वाली राज्यसभा की सीटें बिकने लगेंगी, या बहुत ही नाकाबिल लोगों से उन सीटों को भरा जाएगा। कुछ पार्टियां तो बदनाम और मुकदमे-झेलते लोगों को भी राज्यसभा भेज देती हैं, उस सदन में जिसका गठन देश के उत्कृष्ट लोगों की प्रतिभा को इस्तेमाल करने के हिसाब से किया गया था।

लेकिन हकीकत को अनदेखा करके महज संविधान-सभा की बहस को निकालकर गिनाना ठीक नहीं है, आज हकीकत यही है कि पार्टी के मुखिया के चापलूस, पार्टी के लिए फंड जुटाने वाले, धर्म और जाति के आधार पर कुछ तबकों को संतुष्ट करने के हिसाब से लोगों को राज्यसभा भेजा जाता है। इनमें कुछ लोग ऐसे जरूर रहते हैं जिन्हें केन्द्र में मंत्री बनाने की नीयत से सत्तारूढ़ पार्टी राज्यसभा में लाती है, और इनमें ऐसे लोग भी रहते हैं जो लोकसभा का चुनाव हारने के तुरंत बाद ऐसा मनोनयन पा जाते हैं। अब चूंकि इसी महीने देश भर में पार्टियां अपने राज्यसभा सदस्य चुनेंगी, और जहां-जहां कुछ अतिरिक्त विधायक-वोट पार्टियों के पास होंगे, वहां-वहां मोलभाव भी चलेगा, जोड़तोड़ भी चलेगी, और क्रॉस वोटिंग से लेकर हॉर्स ट्रेडिंग तक बहुत से शब्द अखबारी सुर्खियों में तैरेंगे। लेकिन जो राज्य समझदार हैं, या ऐसा कहें कि जिन राज्यों में जो राजनीतिक दल कोई सदस्य राज्यसभा भेजने जितने विधायक रखते हैं, उनको कम से कम अपने राज्य या पूरे देश की भलाई की बात भी सोचनी चाहिए।

आज मोटेतौर पर अधिकतर पार्टियों में जाति या धर्म, या पार्टी के भीतर पकड़ के पैमाने ही काम आ रहे हैं। पूरे देश के जलते-सुलगते मुद्दों पर जमकर देशहित की बात करने की काबिलीयत को कोई पैमाना ही नहीं माना जाता। यह शायद पैमाना इसलिए भी नहीं रह गया है क्योंकि अब संसद में अभूतपूर्व-ऐतिहासिक बाहुबल के चलते सत्तारूढ़-पार्टी गठबंधन को किसी बहस की जरूरत भी नहीं है, शायद पसंद भी नहीं है। ऐसे में ये तमाम सोच, क्षमता, किसी काम की नहीं रह गई हैं कि संसद में कोई विचार-विमर्श हो, और उसमें इनकी जरूरत हो। सच तो यह है कि किसी विधेयक पर बहस और मतदान के पूरे दौर में अपनी पार्टी की घोषित नीति और रणनीति से परे जाकर कुछ बोलने वाले के लिए दल-बदल कानून का डंडा रखा हुआ है, और संसद के भीतर दोनों ही सदनों में अब लोगों की व्यक्तिगत सोच खत्म हो गई है क्योंकि पार्टियां व्हिप जारी करके अपने सदस्यों के हाथ-पैर, मुंह, सब बांध देती हैं। ऐसे में संसदीय विचार-विमर्श और बहस की उत्कृष्टता चल बसी है, और राज्यसभा में कितने ही स्तरहीन लोगों को भेजा जाए, उसका औसत स्तर आज जैसा ही रहेगा, क्योंकि बहुत से वैसे लोग वहां पहुंचे हुए हैं। लोकसभा में पहुंचने वाले कमजोर और खराब लोगों के साथ कम से कम यह बात तो रहती है कि उन्हें जनता के बीच से जनता के वोट पाकर जाना होता है, और वहां कई बार उन्हें खारिज भी कर दिया जाता है। लेकिन राज्यसभा में तो पार्टियां अपने सबसे रद्दी लोगों को भी भेज सकती हैं, और आज वैसा ही एक मौका आया हुआ है। चूंकि भारतीय संसद राजनीति में नीति-सिद्धांत, और उत्कृष्टता की जगह खत्म कर दी गई है, इसलिए अब राज्यसभा में पार्टियां कितने ही खराब, कितने ही कमजोर लोगों को भेजे, उस पर जनता का कोई बस तो चलता नहीं है। कुल मिलाकर जिस देश में पार्टियां अपने फैसलों के लिए, अपनी पसंद के लिए, अपने बर्ताव के लिए जवाबदेह न रह जाएं, उन देशों में उच्च सदन नाम की संस्था खत्म कर दी जानी चाहिए, जिसको बनाया ही उत्कृष्टता के लिए गया था। इसकी जरूरत भारतीय लोकतंत्र में अब खत्म हो गई दिखती है।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 7 मार्च 2020)

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