कोरोना वायरस एक मार्केटिंग स्ट्रेटजी तो नहीं.?

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-रचित दीक्षित।।

कोरोना वायरस एक मार्केटिंग स्ट्रेटजी है, कारपोरेट फंडा है। विश्व की डूबती अर्थव्यवथा को तिनके का सहारा है। मेड इन चाइना का सबसे सबसे नया उत्पाद है। सच्चाई यह है कि यह वायरस उतना ही खतरनाक है जितना जुकाम का वायरस। कोरोना से कितने लोग मरे यह तो खबरों में है ही आप बाकी गूगल सर्च से पता कर लीजिये इसी बीच जुकाम से कितने लोग मरे हैं आप चौंक जाएंगे।

याद रखिये सबसे सफल बिजनेस डर का होता, सबसे खतरनाक संक्रमण भय ही है क्योंकि इसे फैलने के लिए 6 फ़ीट नजदीक आने की जरूरत भी नहीं होती। सोशल मीडिया और मुख्यधारा का मीडिया पूरी मेहनत से जुटा है इस डर की मार्केटिंग में। अरबों, खरबों डॉलर के मास्क बिक जाएंगे, सेनेटाइजर जैसे उत्पाद को भारतीय बाज़ार में हमेशा के लिए एक बूम मिल जाएगा, स्थापना मिल जाएगी। अभी सिर्फ शहरी जीवन में ही लोकप्रिय यह हाथ साफ करने वाला उत्पाद अब गाँव-कस्बों तक में घुस जाएगा और हमेशा के किये स्थापित हो जाएगा भारतीय समाज में। जल्द ही टीवी पर ऐड आने शुरू हो जाएंगे, अखबारों में इसके फायदों पर लेख आने लगेंगे और आप एक स्थायी नया उत्पाद अपने राशन में बढ़ा लेंगे। एक बिना जरूरत वाली पूरी इंडस्ट्री खड़ी हो जाएगी। दुनिया के सारे देश अपने बजट का कुछ हिस्सा इस वायरस के लिए भी लगाने लगेंगे। जिसका पैसा उस देश को जाएगा जिसने इस वायरस का डिटेक्टर पेटेंट कराया है। जी हाँ कोरेना वायरस के बारे में नया कुछ नहीं है। हम में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसे कभी न कभी इस तरह के वायरस का संक्रमण न हुआ हो। फिर नया क्या है जो इतनी हायतौबा मची है, नई है वो डिवाइस हो हाल ही पेटेंट कराई गई है जिसकी मार्केटिंग लिये चीन ने अपने नागरिक मारे है कोरेना के नाम पर।कम्युनिस्ट चीन के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं हम सब जानते हैं। हालांकि यह काम अमेरिका, रुस समेत बाकी देश पहले भी करते रहे हैं लेकिन इस बार हाथ चीन ने मारा है।

एक और बात खाली बैठी किसी फिल्मी हस्ती, किसी सेलेब्रिटी को अगर कोरोना वायरस हो जाएगा तो समझ जाइयेगा वो भारत में इसके ब्रांड अम्बेसडर बने हैं मोटी डील हुई है। याद करिए 2011 वर्ड कप का मैन ऑफ सीरीज प्लेयर 15 दिन बाद किमियोथेरेपी की लाइन में था, अपना पूरा कैरियर जी चुकी अभिनेत्री किमियो के लिए केशदान करके फ़ोटो सेशन कराती है। एक बड़ा अभिनेता किमियो के लिये देश से बाहर चला जाता है जिसके मरने तक कि अफवाह उड़ती है लेकिन मज़े की बात यह कि उसकी कोई फ़िल्म नहीं अटकती उसके बिजनेस पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

इन शार्ट सब मोहमाया है। बीड़ी पिओ और स्वदेशी कैंसर से मरो वो बेहतर है। ( मजाक है)

अपना ध्यान रखें। साफ-सफाई रखें ज्यादा तनाव न लें। चीन यह चाहता भी नहीं है कि वो आपको कोरोना संक्रमण हो उसकी मासूम ख्वाहिश सिर्फ इतनी है की आप मास्क और सेनेटाइजर खरीद लें जो शायद आपने खरीद भी लिया होगा अबतक। बस बस हो गया काम।

बाकी ‘ए वेडनेसडे’ के नसिरुद्दीन शाह याद हैं न “राठौर साहब कोई मा—— ये तय नही करेगा की मेरी मौत कैसे होगी।”

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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