मप्र: कमल तो नहीं खिला पर कीचड़ फैल ही गया..

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मध्यप्रदेश का हाल का राजनैतिक घटनाक्रम बतलाता है कि भारतीय जनता पार्टी की सत्तालोलुपता का कोई अंत नहीं है। संघीय प्रणाली के अनुरूप राज्यों की जनता की पसंद का वह तभी तक सम्मान करती है जब तक कि वह उसके अनुकूल हो और अपनी सफलता वह इसी में मानती है कि अधिकाधिक राज्यों में उसका शासन हो। जनमत का आदर करने की बजाय वह राजनैतिक मर्यादाओं और लोकतांत्रिक नैतिकता को ताक पर रखने पर हर घड़ी आमादा रहती है। इसके लिए उसे किसी भी सीमा तक जाने में कोई गुरेज नहीं है।
मध्यप्रदेश की विधानसभा में सीटों की कुल संख्या 230 (और एक मनोनीत) है। वर्तमान में 228 की सदस्य संख्या वाले वर्तमान सदन में 114 कांग्रेस के तथा भारतीय जनता पार्टी के पास 107 विधायक हैं। 4 निर्दलीय, 2 बहुजन समाज पार्टी और एक समाजवादी पार्टी का सदस्य है। उन सभी का समर्थन कांग्रेस को प्राप्त है। इस तरह 120 की संख्या बल के साथ कमलनाथ पिछले लगभग सवा साल से प्रदेश में सरकार चला रहे हैं। तीन राज्यों के साथ यहां हुए चुनावों में छत्तीसगढ़ में तो बड़े मार्जिन के साथ कांग्रेस जीती है लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान में उसे वैसा बहुमत नहीं मिल सका था। सरकार बनने के समय ही भाजपा ने अपने सारे हथकंडे अपनाकर कोशिश की थी कि यहां भाजपा की सरकारें न बन सकें। नाकाम होने पर भी अपनी प्रवृत्ति और लोगों की आशंकाओं के मुताबिक भाजपा की कोशिशें रही हैं कि इन सरकारों को गिराकर वहां का संचालन अपने हाथों में ले। करीब तीन दिन पहले ही भाजपा ने एक बार फिर यह कोशिश की। पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने समय रहते इस षड़यंत्र का पर्दाफाश किया था कि भाजपा ने सरकार को समर्थन दे रहे कुछ विधायकों को कमलनाथ का साथ छोड़कर ‘कमल’ का हाथ थामने के लिए करोड़ों रुपयों का ऑफर दिया है। चूंकि उसी समय सत्तारूढ़ दल के तथा कुछ अन्य पार्टियों के 10 विधायकों के गायब होने की सूचना मिली, तो यह आशंका पक्की हो गई कि भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में फिर से कमल खिलाने की जुगत बिठा रही है। वैसे चारों निर्दलीय, दो बसपा के और एक सपा का सदस्य भाजपा को समर्थन दें तो दलबदल कानून के नियमों के अनुसार उनकी सदस्यता नहीं जाएगी लेकिन बहुमत के लिए 115 सदस्य चाहिए जिसकी कमी कांग्रेस के विधायकों को तोड़कर ही हो सकती है। तीन निर्दलीय एवं बसपा-सपा के सदस्य तो लौट आए हैं लेकिन कांग्रेस खेमे के तीन और एक निर्दलीय विधायक अभी भी लापता हैं। अगर दलबदल कानून के अनुसार इन चार विधायकों की सदस्यता चली जाती है तो सदन की कुल संख्या घटकर 224 हो जाएगी। ऐसी परिस्थिति में भाजपा को 113 सदस्यों का समर्थन सरकार बनाने के लिए चाहिए होगा जो वह प्राप्त कर लेगी।
विधायकों के लौट आने से कमलनाथ ने ऐलान तो कर दिया है कि उनकी सरकार सुरक्षित है, पर ऐसा बहुत दावे से नहीं कहा जा सकता जब तक कि अब भी गुम कांग्रेस के बिसाहूलाल सिंह, हरदीप सिंह डंग व रघुराज कंसाला और निर्दलीय सुरेन्द्र सिंह शेरा, लौटकर नहीं आ जाते। दोनों ही पार्टियों के बीच विधायकों की संख्या का अंतर काफी कम है। सत्ता की कुंजी निर्दलीय व बसपा-सपा के हाथों में होने के कारण सरकार डांवाडोल सी है। वैसे भी राजनैतिक प्रतिबद्धता को निजी स्वार्थों के चलते परिवर्तित करने के वर्तमान माहौल में कभी भी नहीं कहा जा सकता कि कौन सा विधायक या नेता किसी पार्टी के साथ कब तक बना रहेगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के शुरुआती कुछ वर्षों को छोड़ दिया जाए तो बहुमत के बावजूद सरकारें पाने का खेल प्रकारान्तर में अनेक दलों की केन्द्र सरकारें करती रही हैं लेकिन इस प्रवृत्ति और संस्कृति को जिस बड़े पैमाने पर भाजपा ने प्रचलित किया है, वह न सिर्फ शर्मनाक है बल्कि लोकतंत्र की भावना के विरूद्ध भी है। संघीय शासन प्रणाली में नागरिक केन्द्र, राज्य और स्थानीय निकायों में अलग-अलग विचारधारा के राजनैतिक दलों को शासन के लिए चुनते हैं। लोकतांत्रिक परंपरा और तकाजे की मांग होती है कि सभी दल जनता की भावना और पसंद का सम्मान करें। लोकतंत्र विपरीत विचारधारा के लोगों, दलों और उनके शासन को सहर्ष स्वीकार करने का नाम है। समन्वय और सहअस्तित्व ही जनतंत्र की मूल भावना है। इसके विपरीत भाजपा ने इस लोकतांत्रिक संस्कृति को बहुत ही आहत किया है तथा उसे बिगाड़ने की वह लगातार कोशिश करती रही है। भाजपा पूरे देश में अपने अलावा किसी भी पार्टी का शासन देखना ही नहीं चाहती। 2014 से ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ का लक्ष्य उसने येन केन प्रकारेण प्राप्त करने का मानो अभियान सा छेड़ रखा है। अल्पमत के बाद भी पिछले वर्षों में कई राज्यों में उसने विधायकों को विभिन्न तरीकों से प्रभावित कर अपनी सरकारें बनाई हैं। इसके लिए विरोधी विचारधारा की पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने के कई उदाहरण भारत देख चुका है। अखंड भारत का नारा देने वाली भाजपा ने उन दलों के साथ भी शासन चलाया है जो विभाजनकारी विचार रखते हैं। कभी सार्वजनिक जीवन में शुचिता का दावा करने वाली भाजपा ने अब राजनैतिक नैतिकता की बात करना भी छोड़ दिया है।
आज भी भाजपा कभी राजस्थान तो कभी महाराष्ट्र में सरकारें वापस पाने की अनैतिक कोशिशें करती रहती है। पिछले ढाई-तीन वर्षों में उसके हाथ से अनेक राज्य निकल गये हैं और उसका प्रभाव क्षेत्र लगातार सिमट रहा है। इसके चलते राज्यसभा में भी उसकी ताकत घट रही है। निरंकुश और एकछत्र राज करने की अदमित इच्छा भाजपा से वे सारे अनैतिक कार्य करा रही है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अवांछित और निंदनीय है। मध्यप्रदेश में ‘कमल’ की सरकार चाहे बच गई हो लेकिन ‘कमल’ खिलाने की छिपी कोशिशें जारी रहेंगी, यह तय है क्योंकि कीचड़ तो फैलाया ही जा चुका है।

(देशबंधु में आज का संपादकीय)

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