Home देश बोझ से महिलाओं के दबे हुए सिर देश का सिर ऊंचा कैसे करते हैं?

बोझ से महिलाओं के दबे हुए सिर देश का सिर ऊंचा कैसे करते हैं?

-सुनील कुमार।।
भारत सरकार के रेल मंत्रालय ने कल ट्विटर पर कुछ तस्वीरें पोस्ट की हैं जिनमें अलग-अलग रेलवे स्टेशनों पर सिर पर बोझ लेकर जाती हुई महिला कुली दिख रही हैं, और एक तस्वीर में एक महिला कुली एक लदी हुई ट्रॉली भी खींच रही है। रेलवे ने इन महिलाओं को सलाम लिखते हुए लिखा है कि भारतीय रेलवे के लिए काम करने वाली ये महिला कुली साबित करती हैं कि वे किसी से भी पीछे नहीं हैं। लोगों को याद होगा कि देश के बहुत से स्टेशनों पर काम करने वाली महिला कुली को लेकर ऐसी कहानियां स्थानीय स्तर पर छपती हैं जिनमें आमतौर पर पुरूष के किए जाने वाले इन कामों में महिलाओं की जीवट मेहनत का जिक्र होता है। इसी तरह का काम निर्माण कार्यों में सिर पर सीमेंट की 50 किलो की बोरी लेकर चलने वाली मजदूर महिलाएं करती हैं, बहुत सी ऐसी तस्वीरें भी आती हैं जिनमें अपनी पीठ पर साड़ी के आंचल में छोटे से बच्चे को टांगे हुए मजदूर महिला सिर पर 10-20 ईटें लादकर चलती हैं। कस्बाई मोहल्लों में सब्जी बेचने वाली महिलाएं भी भारी-भरकम टोकरी सिर पर लेकर इसी तरह चलती हैं, और पूरे देश में महिलाएं घर के लिए पानी लाते हुए घड़े इसी तरह सिर पर रखती हैं।

अब अगर हड्डियों के किसी डॉक्टर, या स्नायुतंत्र के किसी डॉक्टर से पूछा जाए तो वे सिर पर इस तरह के बोझ का खतरा गिनाएंगे। इससे गर्दन और रीढ़ की हड्डी किस तरह तबाह होती है, यह चिकित्सा विज्ञान में अच्छी तरह दर्ज है। रेलवे स्टेशनों पर महिलाएं बाकी तमाम मर्दों के बीच बोझ ढोने के काम में अकेले किस तरह लगी रहती हैं, यह जाहिर तौर पर उनकी पसंद का काम तो नहीं हो सकता, और बहुत से मामलों में यह हकीकत छपती है कि किसी कुली के गुजर जाने पर उसका बिल्ला उसकी पत्नी को मिल जाता है, और घर चलाना जारी रखने के लिए वह इस तरह के दिक्कत वाले, मेहनत वाले काम में लग जाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत सरकार के इस सबसे बड़े मंत्रालय को इस बात पर गर्व करना चाहिए? क्या कल के दिन अगर कोलकाता में महिलाएं रिक्शों को खींचकर दौड़ती हुई दिखें तो क्या ममता सरकार इसे अपनी एक कामयाबी बताकर उनकी तस्वीरों को पोस्ट करे?

हिन्दुस्तान में जिंदा रहने के लायक मजदूरी वाले काम मिल जाना भी किस्मत की बात मान ली जाती है। लोग यह समझते हैं कि भूखा नहीं मरना पड़ रहा है, तो वही जिंदगी बहुत अच्छी है। अब 21वीं सदी एक चौथाई होने को है, और ऐसे में कम से कम मानव श्रम के ऐसे तरीकों को हटाना चाहिए जो कि अमानवीय हैं। जिस देश के हवाई अड्डों पर महंगा सफर करने वाले मुसाफिरों के लिए आरामदेह ट्रॉली रहती हैं जिन पर सामान लादकर ले जाया जाता है। ऐसे में देश के दूसरे हिस्सों में भी, दूसरे कामों में लगी महिलाओं की हालत बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए, और यह बात महज महिला-मजदूरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि सभी मजदूरों के तन-मन का इतना तो ख्याल रखा ही जाना चाहिए कि मजदूरी के बाद भी उन्हें जिंदा रहना है, और बाकी की जिंदगी तरह-तरह की बीमारियों और तकलीफों से भरी हुई न रहें।

कुछ अरसा पहले ऐसी खबर थी कि किसी एक आईआईटी के छात्र-छात्राओं ने आसपास की गरीब बस्तियों में जाकर उनकी रोज की जिंदगी को बेहतर बनाने की कोशिशें की हैं। उन्होंने उनके रोज के काम में आने वाले औजारों और उपकरणों को बेहतर बनाकर खतरा घटाने, उत्पादकता बढ़ाने, और सहूलियत बढ़ाने का काम किया है। एक तरफ जब देश चांद पर जा रहा है, तो दूसरी तरफ धरती पर जीने वाले आम, गरीब, और बेबस लोगों की जिंदगी से तकलीफ घटाने की जरूरत भी है। देश में बहुत किस्म के मजदूर कानून है, जिनकी कहीं कोई इज्जत नहीं होती, और मजदूर-दूसरे कामगार खतरे में काम करते हैं। ऐसी तमाम नौबत को सुधारने की जरूरत है। और भारत सरकार के रेल मंत्रालय को भी यह समझना चाहिए कि महिलाओं को सिर पर इस किस्म का बोझ किसी देश का सिर ऊंचा नहीं करता, महिलाओं को बेहतर काम, बेहतर हाल मिलना चाहिए, जो कि कुली महिलाओं का तो बिल्कुल भी नहीं है।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 5 मार्च 2020)

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