/* */

जिम्मेदारी से भागती सरकार..

admin
Page Visited: 18
0 0
Read Time:6 Minute, 39 Second

दिल्ली हिंसा में पीड़ितों को न्याय कब तक मिलेगा, दोषियों को सजा कब तक होगी, इंसाफ जल्द मिलेगा, या तारीख पर तारीख मिलते-मिलते बरसों गुजर जाएंगे, ऐसे कई सवाल इस वक्त समाज के संवेदनशील लोगों के मन में हैं। इनके जवाब तो शायद अभी न मिलें, फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से एक अहम निर्देश सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने भड़काऊ भाषण देने के खिलाफ दायर याचिका पर इसी शुक्रवार को सुनवाई करने का निर्देश दिल्ली हाईकोर्ट को दिया है। दरअसल 26 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस. मुरलीधर और जस्टिस तलवंत सिंह की पीठ ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया था कि वे भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा और अभय वर्मा सहित अन्य के खिलाफ कथित तौर पर दिए गए भड़काऊ भाषणों को लेकर एक दिन के अंदर फैसला करें। हालांकि, उसी रात केंद्र सरकार ने जस्टिस मुरलीधर का पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में तबादले का आदेश जारी कर दिया था। इसके अगले ही दिन 27 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस सी. हरिशंकर की एक अन्य पीठ ने मामले की सुनवाई 13 अप्रैल तक टाल दी थी। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की इस दलील का संज्ञान लिया था कि यह एफआईआर दर्ज करने का सही समय नहीं है। लेकिन अब शीर्ष अदालत ने कहा है कि, न्याय के हित में हाईकोर्ट को निर्देश दिया जाता है कि मामले की सुनवाई शुक्रवार को करे। हेट स्पीच समेत इस हिंसा से जुड़ी सभी याचिकाओं पर शुक्रवार को सुनवाई की जानी चाहिए। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि हाईकोर्ट मामले की यथासंभव जल्द सुनवाई करे और नेता लोगों से बात करें। सीजेआई एस ए बोबड़े ने यह भी कहा कि, ‘जब हाईकोर्ट मामले की सुनवाई कर रहा है तब हम उसका अधिकार नहीं लेना चाहते हैं। लेकिन ऐसे मामलों को ज्यादा देर तक नहीं खींचना चाहिए।’ वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि भड़काऊ भाषण दोनों तरफ से दिए गए और इसलिए इस मौके पर एफआईआर दर्ज करने से शांति प्रभावित हो सकती है।
सॉलिसिटर मेहता कानून के जानकार हैं, लिहाजा वे जानते होंगे कि एफआईआर दर्ज करने से शांति भंग नहीं होती, शांति तब भंग होती है, जब पुलिस अपना दायित्व निभाने में चूकती है और राजनेता उसे ऐसा चूक करने का मौका देते हैं। दिल्ली मामले में सरकार और पुलिस दोनों की भूमिका संदिग्ध है। सरकार ने तो भाजपा के भड़काऊ बयानवीरों पर कोई नकेल नहीं कसी, लेकिन गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस ओर ध्यान दिया है। भड़काऊ भाषण चाहे कोई भी दे, उस पर त्वरित कानून कार्रवाई होनी चाहिए। मगर दिल्ली मामले में यह देखा गया कि एक के बाद एक भाजपा नेता समाज के एक तबके के लिए, सरकार के विरोधियों के लिए नफरत भरी बातें करते रहे, लोगों को हिंसा के लिए उकसााते रहे, मगर न सरकार ने उन्हें रोकने की कोई कोशिश की, न पुलिस को तब शांति भंग होने का खतरा नजर आया। सरकार का रवैया अब भी अपने लोगों को बचाने वाला नजर आ रहा है। देखना होगा कि हाईकोर्ट में भाजपा नेताओं को बचाने के लिए किस किस्म की दलीलें दी जाती हैं। फिलहाल संसद में भी सरकार दिल्ली मामले पर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस, टीएमसी समेत कई विपक्षी दल रोजाना सरकार से इस मसले पर चर्चा की मांग कर रहे हैं। लेकिन लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में होली के बाद चर्चा के लिए समय दिया जा रहा है। मानो सरकार अपने बचाव के लिए कोई शुभ मुहूर्त देख रही है। होली तो सभी बुराइयों, नफरतों को भुला कर प्रेम से मिलजुल कर रहने का त्यौहार है। क्या बेहतर नहीं होता कि सरकार होली के पहले ही दिल्ली दंगों पर विपक्ष के सवालों के जवाब दे देती, ताकि देश के सामने कोई अच्छा संदेश जाता। यूं भी दंगों जैसे संवेदनशील और गंभीर मामले पर संसद में चर्चा सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। मगर शायद सरकार की प्राथमिकताओं में सांप्रदायिक सद्भाव शामिल नहीं है।
संसद को तो देश की सबसे बड़ी पंचायत कहा जाता है। यहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही पहुंचते हैं, जिनका दायित्व है कि वे जनता के हित की बात सदन में करें। इसलिए जब विपक्ष चर्चा की मांग कर रहा है, तो सरकार को अपनी जवाबदेही निभानी चाहिए। पर उसकी जगह सरकार टालमटोल कर रही है। होली के बाद शायद वह अपने बचाव की बेहतर तैयारियों के साथ आना चाहती है। संसद में चल रही इस टालमटोल पर तो शीर्ष अदालत ने कुछ नहीं कहा है, लेकिन समय आने पर शायद जनता की अदालत में इसका फैसला होगा।

(देशबंधु में आज का संपादकीय)

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

NRC का आतंक और बच्चे..

-संजय कुमार सिंह।। नागरिकता के तीन चरणों को लेकर बच्चों में जो डर फैला है उसका प्रदर्शन एक कला शिविर […]
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram