ऐसे गौभक्त कोरोना वायरस से अधिक खतरनाक हैं..

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-सुनील कुमार।।


दुनिया के दर्जनों देशों में जिस रफ्तार से कोरोना वायरस फैल रहा है, वह भयानक नजारा है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में जिम्मेदार ओहदों पर काबिज लोग जिस तरह से अज्ञान फैलाकर लोगों को अंधविश्वासी बना रहे हैं, वह और भी भयानक है। वैज्ञानिक सोच-समझ वाले लोग इस बात का अंदाज लगा सकते हैं कि हिन्दुस्तान में अगर कोरोना फैला, तो वह अपनी पूरी ताकत से जितने लोगों को मार सकेगा, उससे अधिक लोगों को अंधविश्वास मार डालेगा कि गोबर और गोमूत्र से लोग इस वायरस से बच जाएंगे। जिन लोगों की धार्मिक आस्था के चलते उन्हें गाय एक पवित्र पशु लगती है, उन्हें अपनी इस सोच को फैलाने के पहले यह हलफनामा देना चाहिए कि वे किसी दूसरी पद्धति का कोई इलाज कभी नहीं करवाएंगे, और सिर्फ गोबर और गोमूत्र से अपनी सभी बीमारियों का इलाज करेंगे। ऐसे हलफनामे के बाद ही इन लोगों को यह नैतिक हक रहेगा कि वे अफवाह फैलाकर दूसरों को बरगला सकें, खतरे में डाल सकें।

आज चीन जैसा मजबूत सरकारी पकड़ वाला देश जिस मजबूती से कोरोना वायरस से निपट रहा है, हिन्दुस्तानी सरकार की क्षमता और समाज की जागरूकता उसका एक फीसदी भी नहीं कर सकते। यह तो गनीमत है कि चीन के पहले यह हमला हिन्दुस्तान पर नहीं हुआ, वरना यहां के अस्पतालों में ऐसी अराजकता फैली रहती, राजनीतिक दल प्रदर्शन करते रहते, अफसर दवाईयों की खरीद में भ्रष्टाचार के लिए ओवरटाईम करते रहते, और गौभक्त लोगों को बरगलाते रहते। यह तो ठीक हुआ कि कोरोना वायरस ने पहले दूसरे देशों पर हमला किया और हिन्दुस्तान के भीतर एक बहस की गुंजाइश खड़ी कर दी। एक तरफ तो प्रधानमंत्री कोरोना वायरस के चलते होली न मनाने का फैसला ले रहे हैं क्योंकि जहां भीड़ जुटेगी वहां इस वायरस के फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी की एक विधायक विधानसभा के भीतर गोबर-गोमूत्र पद्धति का इलाज कर रही है, उसका दावा कर रही है। एक हिन्दू संगठन का कोई भगवाधारी गाय की इन दो चीजों का एक स्टॉल लगाकर इलाज या बचाव करने वाला है।

कोई जिम्मेदार लोकतंत्र होता तो वहां सरकारें खुद होकर इस किस्म के फैलाए जा रहे उच्च स्तरीय अंधविश्वास का विरोध करतीं, और जनता को जागरूक करने का काम करतीं। लेकिन आज गाय के नाम पर हर किस्म का फरेब फैलाना कुछ पार्टियों को चुनावी फायदे का दिख रहा है, और बाकी अधिकतर पार्टियों को ऐसे फरेब का पर्दाफाश करना चुनावी नुकसान का दिख रहा है। नतीजा यह है कि नेहरू के वक्त की वैज्ञानिक सोच को तबाह करके आज देश को एक धार्मिक और साम्प्रदायिक अंधविश्वास में डुबाया जा रहा है, जिसके चलते कोरोना का हमला अगर हुआ, तो वह बहुत तबाही फैलाएगा। लोगों को याद रखना चाहिए कि धर्मान्धता और कट्टरता से जल रहे पाकिस्तान में आतंकियों ने बच्चों को पोलियो का टीका पिलाने वालों को गोलियां मारीं, और लोगों को कहा कि इस दवा में मुस्लिम नस्ल को खत्म करने के लिए चीजें मिली हुई हैं। नतीजा यह है कि आज दुनिया में जिन गिनी-चुनी जगहों पर पोलियो बाकी है, उनमें पाकिस्तान अव्वल हो गया है। धर्मान्धता और कट्टरता जब मिलकर विज्ञान का गला घोंटते हैं, तो उसके बचने की गुंजाइश कम हो जाती है। वह तो जवाहर लाल नेहरू थे जिन्होंने सारे धार्मिक पाखंडों को नकारते हुए देश में एक वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, बढ़ाई थी, और मजबूत की थी। उन्होंने ही इस देश में बड़े-बड़े वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना की थी, जिसकी वजह से आज दुनिया भर में हिन्दुस्तानी इंजीनियरों का बोलबाला है।

जहां कोरोना वायरस का खतरा एक बड़ी वैज्ञानिक और मेडिकल चुनौती रहनी चाहिए, जहां इससे बचने और जूझने की तैयारी में देश के बड़े-बड़े विशेषज्ञों को लगना चाहिए, वहां पर आज दुनिया के इस एक सबसे बड़े खतरे से जूझने का जिम्मा उस गाय को दे दिया जा रहा है जिसे उसके भक्तजन खाना नहीं देते, और वह घूरों पर प्लास्टिक की थैलियां खाकर जीने को मजबूर है। ऐसे अंधभक्तों से यह सवाल भी जायज होगा कि घास खाने वाली गाय के गोबर-गोमूत्र से ही कोरोना का इलाज होगा या फिर पॉलीथीन से भरे हुए पेट वाली गाय का गोबर-गोमूत्र भी हिन्दुस्तान को बचा लेगा? देश का यह सिलसिला इसलिए बहुत ही निराश करता है क्योंकि वैज्ञानिक सोच के कत्ल से निकला हुआ लहू उसकी लाश पर ही नहीं थमेगा, वह दूर तक रहेगा, और हिन्दुस्तानी आबादी को विज्ञान के पहले के जमाने में ले जाकर छोड़ेगा। कोरोना आज इस देश में छोटा खतरा है, ऐसे गौभक्त उससे अधिक खतरनाक वायरस हैं।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 4 मार्च 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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