घमण्ड तो रावण का भी टूट गया, सत्ताधीशों..

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-विष्णु नागर।।

अजीब बात है। कश्मीर का मामला हो या सीएए का,देश के लोग इसे उठाएँ तो देशद्रोही हो जाएँ। उन्हें जेल में बंद कर दिया जाए,पूरे कश्मीर को जेल बना दिया जाए।सीएए का सवाल उठाएँ तो शांतिपूर्ण धरना तक न देने दिया जाए।प्रधानमंत्री लोगों को कपड़ों के रंग से पहचानने लग जाएँ, गृहमंत्री करंट लगाने लग जाएँ, मंत्री गोली मारो सालों का नारा लगाने लग जाएँ, चुनाव में हारा हुआ नेता अलायबलाय बकने लग जाए और किसी का बाल तक बाँका न हो। दंगे कराए जाएँ, लोगों को मरने दिया जाए, घर और दुकानें जलने दी जाएँ, बच्चे तक नाटक करें सीएए के विरुद्ध तो राजद्रोह का मामला बना दिया जाए। कहीं कोई सुनवाई न हो। कुछ भी हो जाए, सरकार इसे नाक का सवाल बनाए। इससे पीछे हटने से किसी भी हालत में इनकार करे।किसी की न सुने,न सुनने दे। दमन पर दमन करे। विरोध करनेवालों के विरुद्ध जहर उगले।बउन्हें पाकिस्तान की भाषा बोलनेवाला कहे।फर्जी राष्ट्रवाद से लोगों को भरमाए।

इधर कोई देश इन मामलों को उठाए, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग भी उठाए तो यह हमारा ‘आंतरिक मामला’ है कि रट लगाई जाए। ठीक है यह हमारा आंतरिक मामला है बड़ी हद तक मगर जब मानवाधिकारों को कुचला जाए, लोगों को लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जाए तो मामले को आंतरिक-आंतरिक चीखकर दबाया भी नहीं जा सकता। आंतरिक मामले को आंतरिक भी तो तुम्हीं ने नहीं रहने दिया न! किसी और का क्या दोष?

और अगर मामला आंतरिक है तो उसे आंतरिक ढंग से सुलझाओ ( और तुम्हारा मामला आंतरिक है तो पाकिस्तान अपने नागरिकों के साथ क्या करता है, यह भी तो उसका आंतरिक मामला हुआ, फिर इसे भी मान लो।) भले ही मामला आंतरिक है मगर ‘मामला’ तो है न! उत्तर पूर्व से लेकर दक्षिण भारत तक में इससे बेचैनी है तो कहो कि चलो बातचीत से आम सहमति बनाते हैं। बहुमत के दंभ से बाहर आओ। राष्ट्रवाद की नकली खोल से बाहर आओ। लोगों को और मरने मत दो, विपक्ष और विरोध का सम्मान करो। तभी दुनिया सवाल उठाना बंद करेगी। तब सचमुच में यह मामला आंतरिक होगा। भाईबहनो सत्ता के नशे में डूबे जाने कितने आए और चूहे के किस बिल में समा गए, किसी को पता भी नहीं चला। यह भी कहावत है कि घमंड तो रावण का भी नहीं चला, इसलिए होश में आओ, हमारे लिए और अपने लिए सिर दर्द मत बनो। वैसे बेवकूफी है यह कहना आपसे मगर ऐसी बेवकूफी भी मेरे खयाल से कर लेनी चाहिए।

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