मोदीजी का नया तमाशा..

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गंभीर से गंभीर मुद्दे का तमाशा कैसे बनाया जा सकता है, यह मौजूदा सरकार और उसके मुखिया यानी मोदीजी से सीखना चाहिए। जब देश के युवा उनसे रोजगार की आस लगाए बैठे थे, तो वे टीवी स्टूडियो के नीचे पकौड़ा तलने को भी रोजगार बता रहे थे। जब किसान उनसे राहत की उम्मीद कर रहे थे, तो वे किसान सम्मान निधि का प्रहसन रच रहे थे। नोटबंदी के ऐलान के साथ उन्होंने लाखों लोगों को अपने ही पैसों के लिए लाइन में खड़ा करवा दिया और दावा किया कि देश का काला धन वापस आ जाएगा, जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। जब दिल्ली जल रही थी, तब वे डोनाल्ड ट्रंप को साबरमती में चरखा चलाना सिखा रहे थे।

पूरे तीन दिन बाद उन्होंने इन दंगों पर अपनी राय दी कि सुरक्षा की स्थिति का जायजा लिया जा रहा है और साथ ही शांति की अपील की। लेकिन दंगों में मारे गए लोगों के लिए शोक संवेदना के दो शब्द उनसे टाइप नहीं किए गए। और अब जबकि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस करीब है, उन्होंने फिर एक नया तमाशा खड़ा कर दिया। सोमवार की रात 8.56 मिनट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक ट्वीट आया, जिसमें लिखा था कि इस रविवार को वह फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया अकाउंट्स को छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। दुनिया जानती है कि मोदीजी और सोशल मीडिया का साथ कितना पक्का है। अपनी लार्जर दैन लाइफ वाली छवि गढ़ने के लिए सोशल मीडिया के तमाम प्रकारों का भरपूर उपयोग मोदीजी ने किया।

बल्कि यह कह सकते हैं कि उन्होंने सोशल मीडिया का एक नया मुहावरा ही गढ़ दिया। राजनीति में पहले भी विरोधियों पर प्रहार करने और अपनी छवि चमकाने के लिए प्रचार माध्यमों का सहारा लिया जाता था। लेकिन सोशल मीडिया सेल, ट्रोल आर्मी जैसे शब्द तो राजनीति में मोदी युग की ही देन हैं। 2014 से पहले ही सत्ता में आने की तैयारी के लिए भाजपा ने कई लोगों को सोशल मीडिया पर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए नियुक्त किया। इसके बाद कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी की छवि खराब करने के लिए बहुतों ने काम किया, जिसका लाभ भाजपा को मिला। सोशल मीडिया पर फेक न्यूज प्रसारित-प्रचारित करने का चलन भी इसी दौर में खूब बढ़ा है। 

जाहिर है भाजपा और मोदीजी दोनों जानते हैं कि सोशल मीडिया से विमुख होना अब पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।  इसलिए वे ऐसा कोई भी फैसला क्यों लेंगे, यही सवाल सोमवार रात से चर्चा का विषय बना हुआ था। सीएए, एनआरसी, बेरोजगारी, दिल्ली दंगे, सारी गंभीर चर्चाएं छोड़ इसी बात की चर्चा होने लगी कि मोदीजी ने ये फैसला क्यों लिया। टीवी के एंकर्स के लिए बहस का नया मुद्दा जुट गया। कुछ चैनलों में एंकर यह भी बताने से बाज नहींआए कि मोदीजी उन्हें भी सोशल मीडिया पर फालो करते हैं। राहुल गांधी ने मौके पर चौका मारते हुए कहा कि नफरत छोड़िए, सोशल मीडिया नहीं और अखिलेश यादव ने भी मनमर्जी की बात, सत्ता का लोभ छोड़ने की तंज भरी सलाह दे दी। बीते कुछ दिनों से मोदीजी अपने फैसलों को लेकर विरोधियों के निशाने पर थे, सो लगे हाथ उन्होंने सोशल मीडिया पर शक्ति परीक्षण भी कर लिया। उनके सोशल मीडिया छोड़ने के ट्वीट को 47 हजार से अधिक बार रिट्वीट किया गया।

96 हजार से अधिक लोगों ने कमेंट किया और एक लाख से अधिक लोगों ने लाइक किया। प्रधानमंत्री मोदी को इस समय ट्विटर पर 5 करोड़ 33 लाख लोग, फेसबुक पर 4 करोड़ 47 लाख लोग और इंस्टाग्राम पर 3 करोड़ 52 लाख लोग फॉलो करते हैं। उन्हें सोशल मीडिया पर अपनी ताकत का पता था, जिसे उन्होंने एक बार फिर पुख्ता कर लिया और लगे हाथ मुफ्त का प्रचार भी हो गया। सोमवार के इस तहलके के बाद उन्होंने मंगलवार को फिर एक ट्वीट किया कि ‘इस महिला दिवस, मैं अपना सोशल मीडिया अकाउंट उन महिलाओं को सौंपूंगा जिनके जीवन और काम ने हमें प्रेरित किया है। ये उन्हें लाखों को प्रेरित करने के लिए मोटिवेट करेगा।’ प्रधानमंत्री ने आगे लिखा, ‘क्या आप वो महिला हैं या आप ऐसी किसी महिला को जानती हैं जिन्होंने आपको प्रेरित किया हो?’

अपनी ऐसी ही कहानी को शेयर करें। इसके साथ शीइन्सपायर्सअस हैशटैग का भी इस्तेमाल किया। दरअसल शी इन्सपायर्स अस, यानी उसने हमें प्रेरित किया, एक अभियान है, जिसके तहत कुछ चुनिंदा महिलाओं को पीएम मोदी के सोशल मीडिया अकाउंट संभालने का अवसर मिलेगा। इसमें ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम अकाउंट को कोई भी महिला संभालेगी और महिला दिवस के दिन पूरा संचालन वहीं करेंगी। इस तरह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को मोदीजी ने अपने अंदाज में मनाने का फैसला कर लिया है।

राजनीति में इस तरह के नए प्रयोग में कोई नुकसान नहीं है। लेकिन इसके फायदे क्या हैं, इस पर भी गौर फरमाना चाहिए। भाजपा ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत भी बहुत जोर-शोर से की थी। लेकिन उसी के राज में कठुआ से लेकर उन्नाव तक के भयानक प्रकरण घटे और वह राजनैतिक गुणा-भाग में उलझी रही। कुलदीप सिंह सेंगर, चिन्मयानंद जैसे लोग भाजपा में शामिल रहते हुए गंभीर अपराधों के आरोपी बने। सोशल मीडिया पर मोदी सरकार का विरोध करने वाली कई महिलाओं को बेहद भद्दी टिप्पणियों और कई बार धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।

देश में महिलाओं के लिए हालात बद से बदतर हो रहे हैं और मोदीजी प्रेरित करने वाली महिलाओं को तलाश रहे हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें कोई खोजी अभियान नहीं चलाना पड़ेगा। वे अगर दिल्ली के शाहीन बाग तक जाने की जहमत उठा लें तो वहां उन्हें कई महिलाएं मिल जाएंगी, जो हमें यानी भारत को प्रेरित, प्रभावित कर रही हैं। इस तरह एक पंथ दो काज भी हो जाएंगे।

मोदीजी को प्रेरणादायी महिलाएं मिल जाएंगी और वे उनके मन की बात सुनकर अपने प्रधानमंत्री पद के दायित्व को भी निभा लेंगे। लेकिन इसमें शायद कोई तमाशा खड़ा नहीं होगा। क्या शाहीन बाग जाकर सादगी से अंतररष्ट्रीय महिला दिवस मनाने पर मोदीजी राजी होंगे? शायद नहीं।

(देशबंधु में आज का संपादकीय)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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