पांच सौ करोड़ की शादी से किसका नफा, किसका..

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-सुनील कुमार।।

कर्नाटक के एक भाजपा मंत्री की बेटी की शादी में चालीस एकड़ जमीन पर सजावट हो रही है, और पांच सौ करोड़ रुपये खर्च होने का अंदाज लगाया जा रहा है। इस जलसे की और भी बहुत सी जानकारी अलग-अलग खबरों में आ रही है, और उन सबकी लिस्ट गिनाए बिना भी हम अपनी बात सीधे आ सकते हैं।

न सिर्फ कर्नाटक, बल्कि दक्षिण भारत में दूसरे राज्यों में भी इस किस्म की महंगी शादियों का चलन है। जनता के बीच से चुनकर आने वाले लोग सरकार में रहते हुए कब अरबपति और कब खरबपति हो जाते हैं, यह पता भी नहीं चलता, और फिर वे अपनी दौलत से ऐसे बड़े निजी समारोह करते भी हैं। यह तो केंद्र सरकार के सोचने की बात है कि क्या इतना बड़ा खर्च पूरे का पूरा हिसाब-किताब में दिखाया जाता है, या फिर वह दो नंबर के पैसों से होता है? यह भी सत्तारूढ़ पार्टी के सोचने की बात है कि क्या सार्वजनिक जीवन के लोगों को इस किस्म का खर्च करना चाहिए जिसे आम लोगों की जुबान में आमतौर पर अश्लील और हिंसक भी कहा जाता है। जब हिंदुस्तान की जनता इतनी गरीब है, कुपोषण की शिकार है, गरीब बच्चे लाखों की संख्या में हर बरस बेमौत मर रहे हैं, तो क्या वैसे में ऐसा खर्च एक हिंसक फिजूलखर्ची है, या इससे कोई नुकसान नहीं है?

इस बात को समझने की जरूरत है कि इस शादी, या ऐसी और शादियां पर होने वाले सैकड़ों करोड़ के खर्च को अगर नहीं किया गया होता? तो क्या वह रकम देश के किसी बांध या पुल जैसे उत्पादक काम में लगी होती? या फिर वह रकम ऐसे ही किसी पूंजीनिवेश में चली जाती जिससे अर्थव्यवस्था में आगे और कुछ नहीं होता। जमीन, हीरे-जवाहरात, या विदेशी बैंकों में नामी-बेनामी रकम से देश की अर्थव्यवस्था का क्या भला हुआ होता? अभी जो पचास करोड़ या पांच सौ करोड़, जो कुछ भी इस शादी पर खर्च हो रहा है, उससे हजारों मजदूरों और कारीगरों का काम मिलेगा, खर्च का कम से कम एक हिस्सा तो अकाउंट में भी होगा, और उस पर सरकार को टैक्स मिलेगा। जब तक इस बात की गारंटी न हो कि ऐसा खर्च अगर न हुआ होता और वह रकम किसी उत्पादक काम में, या किसी समाजसेवा में खर्च हुई होती, तब तक तो ऐसी बचत भी किसी काम की नहीं हो सकती। जहां तक जनता के बीच से इतनी कमाई करके उसके बीच ऐसे हिंसक खर्च की बात है, तो यह समझना चाहिए कि भारत की राजनीति में अब संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है, और जनता की भावना की परवाह करना राजनीति में अब खत्म हो चुका है। इसलिए इस बात पर अधिक फिक्र करने से कुछ हासिल नहीं होना है कि जिंदगी में किफायत बरती जानी चाहिए। ऐसे किफायत तभी काम की है, जब उसका समाज के लिए कोई बेहतर इस्तेमाल किया जाना हो। फिलहाल तो यह मानना चाहिए कि अगर सचमुच ही इस शादी में पांच सौ करोड़ खर्च हो रहे हैं, तो पच्चीस-पचास करोड़ पर तो सरकार को कुछ टैक्स मिलेगा और बाकी खर्च से लोगों को मजदूरी मिलेगी, काम मिलेगा। यह देश इसी किस्म का है कि यहां संसद और विधानसभाओं के अहाते में गांधी की प्रतिमा बिठा दी जाए और उसके साथ ही सादगी और किफायत का जिम्मा उस प्रतिमा को दे दिया जाए।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 3 मार्च 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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