सेंसर के बिना हिन्दी अखबारों का ये हाल है..

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-संजय कुमार सिंह।।
द टेलीग्राफ ने आज पहले पन्ने पर सबसे ऊपर दो खबरें एक साथ अगल-बगल में छापी है। एक का शीर्षक है, “दंगे नहीं रोक सकता, इतना दबाव नहीं झेल सकता : सुप्रीम कोर्ट” और इसके साथ दूसरी खबर है, “सोशल मीडिया छोड़ने की सोच रहा हूं : प्रधानमंत्री”। इन दो खबरों को एक साथ इस तरह से छापना वह संदेश देता है जो आमतौर पर ये दोनों खबरें अलग-अलग नहीं देंतीं। आज किसी भी अखबार ने दोनों खबरों को मिलाकर नहीं रखा है। पर ये दोनों बातें एक दिन हुईं तो एक साथ देखने समझने की ही हैं। अखबार ने रही सही कसर अपनी लीड खबर से पूरी कर दी है। सात कॉलम में छपी इन दो खबरों के नीचे अखबार ने सात कॉलम में लीड खबर लगाई है जिसका शीर्षक है, “क्यों हमें एक ऐसे सुप्रीम कोर्ट की आवश्यकता है जो अनुकरणनीय कार्रवाई करे और ऐसे प्रधानमंत्री की जिसपर सोशल मीडिया का जुनून कम हो”।
इस मुख्य शीर्षक के साथ दो खबरें हैं। एक खबर में एक डॉक्टर के हवाले से यह जानकारी दी गई है कि गोली लगने से घायल एक व्यक्ति को अस्पताल ले जा रहे एम्बुलेंस को पुलिस वालों ने चार बार रोका और साथ चल रहे डॉक्टर से पट्टी हटाकर जख्म दिखाने के लिए कहा। इस तरह उसे अस्पताल पहुंचाने में देरी की। दूसरी खबर पड़ोसियों पर भरोसा खत्म होने की है। इस खबर में बताया गया है कि कैसे एक मोहल्ले में सभी मुसलमानों के घर और कारोबार नष्ट कर दिए गए तथा वहां फंसे लोगों को निकल पाने में लंबा वक्त लगा। सारा घर और कारोबार बर्बाद हो गया है सो अलग। बीच में एक तस्वीर है जिसके कैप्शन में दो लड़कियों और उनकी मां का परिचय है तथा बताया गया है कि दोनों बच्चियां स्कूल के कपड़े और परीक्षा का एडमिट कार्ड नहीं होने के कारण बोर्ड परीक्षा में नहीं बैठ पाईं। ऐसी सामान्य सी खबरें हिन्दी अखबारों में प्रमुखता क्यों नहीं पातीं समझना मुश्किल नहीं है। द टेलीग्राफ में रोज की तरह आज भी पहले पन्ने पर ऐसी खबरें दी हैं जो दूसरे अखबारों में नहीं हैं। हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने की कुछ खबरों के शीर्षक जानने लायक हैं। सबसे पहले तो प्रधानमंत्री द्वारा सोशल मीडिया छोड़ने पर विचार करने की ‘खबर’ को देखते हैं फिर देखेंगे कि हिन्दी अखबारों ने पहले पन्ने के लिए किन खबरों को चुना है और उन्हें किस शीर्षक से छापा है। उम्मीद है इसे देखना-जानना कम दिलचस्प नहीं होगा।
प्रधानमंत्री सोशल मीडिया छोड़ने पर विचार कर रहे हैं इस आशय के उनके ट्वीट पर आधारित एक खबर सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। नवोदय टाइम्स में प्रधानमंत्री की बड़ी सी फोटो के साथ तो दैनिक भास्कर में विज्ञापनों के बीच तीन कॉलम में पर छोटी सी फोटो के साथ। “सोच रहा हूं इस रविवार सोशल मीडिया छोड़ दूं : मोदी” शीर्षक खबर हिन्दुस्तान में टॉप पर है। नभाटा में यह खबर टॉप पर दो कॉलम में है। इसका शीर्षक है, “फेसबुक, ट्विटर …. संडे को अलविदा कह सकते हैं पीएम”। आज अमर उजाला अब तक का अकेला अखबार है जिसने सोशल मीडिया छोड़ने की मोदी की ‘खबर’ को पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में छापा है। दैनिक जागरण ने इसे टॉप पर सात कॉलम में छापा है। इस सूचना के साथ कि ट्रेंड करने लगा, ‘नो सर’। जगरण में इस खबर का शीर्षक है, “…. तो क्या सोशल मीडिया को ‘अनफ्रेंड’ करेंगे मोदी”।
1. दैनिक भास्कर
दरिन्दे जिन्दा, डेथ वारंट को फांसी (लीड) है। अगर शीर्षक अटपटा लगे तो इसका मतलब यह है कि इन अपराधियों को फांसी लगाने के लिए जारी डेथ ऑर्डर को ही फांसी हो गई, दरिन्दे अभी जिन्दा हैं जैसे शेर शहर में घुस आया हो बचकर रहने की सूचना है। इस अखबार की दूसरी खबर संसद के बजट सत्र की है। इसका शीर्षक है, शाह का इस्तीफा मांगा तो मंत्री बोले – 1984 के दंगे पर चुप क्यों। इस खबर का उपशीर्षक है, पूर्व उपराष्ट्रपति अंसारी बोले – सरकार सोई थी, चाहती तो दंगे रोक सकती थी। शीर्षक से समझ नहीं आता है कि हामिद अंसारी ने जो कहा वह इस बार के दिल्ली दंगे के लिए है या 1984 के दंगे के लिए। इसका विवरण पहले पन्ने पर नहीं है। टर्न के साथ अंदर पढ़ने पर पता चला कि यह आरोप दिल्ली के हाल के दंगों के संदर्भ में है (और शायद इसीलिए अंदर है)। पर उन्होंने यह बात एक टीवी इंटरव्यू में कही है और इसे संसद की कार्यवाही की रिपोर्टिंग से जोड़ने का कोई मतलब नहीं है। अखबार ने लिखा है, एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि केंद्र सरकार चाहती तो दिल्ली में दंगे रोक सकती थी पर वह सोई रही। नेताओं के इशारों पर दंगा हुआ।
2. नवोदय टाइम्स
दिल्ली में कोरोना की दस्तक – लीड है। छह कॉलम की इस लीड के साथ फांसी नहीं की खबर यहां दो कॉलम में टॉप पर है। इसका शीर्षक है, निर्भया कांड : आज फांसी नहीं, लेकिन हत्यारों के लिए कोर्ट का रास्ता नहीं। इसके साथ निर्भया की मां की फोटो है जिसमें वे सिर पर हाथ रखे हुए हैं। फोटो का कैप्शन है, यह हमारी व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है। पूरी दुनिया देख रही है कि भारत में कैसे न्याय में देरी की जा रही है। मैं हर रोज उम्मीद खोती हूं। ….. मैं न्याय के लिए संघर्ष कर रही हूं। अगर अखबारों ने फांसी देने की जल्दबाजी करके ऐसा माहौल नहीं बनाया होता तो इस खबर या शीर्षक अथवा सूचना में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे पहले पन्ने पर रखा जाए। अखबार ने लीड के नीचे दूसरी लीड पांच कॉलम में लगाई है। दंगे पर संसद में हाथापाई की नौबत।
3. हिन्दुस्तान
दिल्ली में कोरोना की दस्तक – हिन्दुस्तान में भी लीड है और पांच कॉलम में छपी है। निर्भया के दोषियों को फांसी तीसरी बार टली इसकी प्रमुख खबरों में है। दंगे पर लोकसभा में सांसदों के बीच धक्का मुक्की शीर्षक खबर यहां टॉप पर दो कॉलम में है।
4. नवभारत टाइम्स
नभाटा की लीड हिन्दी अखबारों की लीड से थोड़ी अलग है। शीर्षक है, झूठ के पैर नहीं होते, कानून के लंबे थे हाथ, अफवाह फैलाते 44 अरेस्ट। इसके अलावा कोरोना वायरस और निर्भया के दोषियों की फांसी टलने की खबर यहां भी है।
5. अमर उजला
दिल्ली पहुंचा कोरोना … देश में मिले तीन नए मरीज – टॉप की खबर है। पांच कॉलम में छपी है। इसके साथ तीन कॉलम में सुप्रीम कोर्ट की खबर है जिसे ऊपर के किसी अखबार ने इतनी प्रमुखता नहीं दी है। इसका शीर्षक है, हम भी शांति चाहते हैं, लेकिन दंगे रोकना हमारा काम नहीं। दंगे से समय मौके से गायब रही दिल्ली पुलिस ने खजूरी खास इलाके में सीबीएसई बोर्ड की परीक्षा देने के बाद छात्राओं (जी हां लड़कियों को) को गुलाब देकर शांति का संदेश दिया। अखबार ने इसकी तस्वीर सुप्रीम कोर्ट की इस खबर के साथ छापी है। लेकिन लीड यहां भी दरिन्दों को फांसी तीसरी बार टली शीर्षक से हैं। कोर्ट ने कहा, दोषी के मन में न रहे शिकायत। यह भी शीर्षक का भाग है और फांसी में देरी का यही कारण है। पर दूसरे अखबारों में यही खबर कैसे छपी है आप देख चुके हैं।
6. दैनिक जागरण
अखबार की आज की लीड है, दिल्ली दंगों पर संसद में हाथापाई की नौबत। उपशीर्षक है, मर्यादा तार-तार : लोकसभा में कांग्रेस-भाजपा सदस्यों की झड़प धक्का-मुक्की तक पहुंची और फिर इंट्रो है, दोनों सदनों में विपक्ष ने जमकर किया हंगामा, गृह मंत्री का इस्तीफा मांगा। इसके अलावा कोरोना वायरस दिल्ली पहुंचा और फांसी टली खबरें पहले पन्ने पर हैं।
तीन-चार घिसी-पिटी या रूटीन सी खबरों के अलावा आज के अखबारों में पहले पन्ने पर जो खबरें इनसे थोड़ी अलग है वो इस प्रकार हैं 1. आर्थिक सुस्ती से 10 लाख करोड़ रुपये के कर्ज दांव पर (दैनिक जागरण) 2. उमर अब्दुल्ला के व्यवहार की वजह से लगाया पीएसए, (नवोदय टाइम्स) 3. मणिपुर के आतंकी संगठन का सरगना गिरफ्तार (अमर उजाला) लेकिन कई अखबारों में लीड और सेकेंड लीड यहां 18 प्वाइंट के शीर्षक और संद की फोटो के साथ छपी है, विपक्ष ने नहीं चलने दी संसद। नवभारत टाइम्स में कोई उल्लेखनीय खब नहीं है जबकि हिन्दुस्तान ने विशेष के लोगो के साथ छापा है 5. रात में चौंक उठते हैं, लगता है कोई हमारा पीछा कर रहा। और छठी (एक्सक्लूसिव) खबर दैनिक भास्कर में है, पोर्टेबल एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल कर रहे सांसद थरूर। मुझे नहीं लगता इनमें कोई भी खबर मेहनत कर लिखी गई है, जनहित का ख्याल रखा गया है या अखबार के नाम अथवा बैनर के कारण मिली या की गई हो।
इन खबरों से ऐसा लगता है कि पहले पन्ने के लिए खबरों के चयन का एक फॉर्मूला हो और एक ही स्कूल से फॉमूला सीखे, पाठ पढ़े संपादकों ने मामूली अंतर से अलग-अलग अखबारों को एक जैसा बना दिया। निश्चित रूप से यह संपादकीय स्वतंत्रता का उपयोग नहीं है बल्कि संपादकीय विवेकहीनता का नमूना है। वरना हिन्दी के इन बड़े अखबारों ने भी तो अंग्रेजी अखबारों की तरह कुछ नया और अलग किया होता। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी भी अखबार में अपने संवाददाता की कोई अलग या एक्सक्लूसिव खबर नहीं है। भले खबर संवाददाता के हवाले से छपी हो पर खबर वही है जो एजेंसी से चली है। इस संबंध में कल मैंने लिखा था कि दिल्ली दंगे में भाजपा के मुस्लिम नेता का घर जला दिए जाने की एजेंसी की खबर को भी किसी अखबार ने पहले पन्ने पर नहीं लिया था। मीडिया से सरकार के कामों के खिलाफ सजग और सतर्क रहने की अपेक्षा की जाती है पर मीडिया की खबरें इन दिनों भले सेंसर नहीं की जा रही हों ती जाती तो इससे बुरा क्या हो सकता था?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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