दबाव में कोयले को हीरा बनते देखा था, अब हीरे को कोयला..

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-सुनील कुमार।।
दिल्ली में भाजपा की कुछ नेताओं के बयानों को नफरत की आग करार देते हुए उसके खिलाफ दायर की गई याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अभूतपूर्व और हैरान करने वाली बेबसी दिखाई है। मुख्य न्यायाधीश एस.ए.बोबड़े ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट शांति चाहता है, लेकिन हिंसा पर काबू करने के इसके अधिकार सीमित हैं। उन्होंने कहा- हम ऐसी बातों को होने से रोकने की ताकत नहीं रखते हैं, हम इनसे तभी निपट सकते हैं जब ऐसी नौबत आकर जा चुकी रहती है। यह हम पर एक किस्म का दबाव है। हम इतना दबाव बर्दाश्त नहीं कर सकते।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील का तर्क था कि दिल्ली हिंसा के शिकार लोगों की तरफ से हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी, वहां से पुलिस को नोटिस भी जारी हुआ था, लेकिन जज का तबादला हो गया, और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने केस को छह महीने आगे बढ़ा दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, और वहां मुख्य न्यायाधीश का यह रूख सामने आया।

सुप्रीम कोर्ट हर सुनवाई पर कोई फैसला नहीं देता है, कागजों पर हर बात को लिखकर दस्तखत नहीं करता है, लेकिन जजों की कही जुबानी बातों को भी देश और दुनिया गौर से देखते हैं। उनकी कही बातें फैसले से एक ही कदम पीछे रहती हैं, और उनका दिया हुआ फैसला कई मौकों पर मौजूदा कानून को खारिज करते हुए आता है, और उसके बाद यह संसद के पाले में पहुंची हुई गेंद बन जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज करने के लिए संसद संविधान संशोधन करे। हिन्दुस्तान में एक सबसे ताकतवर संस्था का मुखिया अपनी नाकतले, अपनी आंखों के सामने सत्ता की चप्पी के बीच, और सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के खुले भड़काऊ-हिंसक भाषणों, पुलिस के तमाशबीन-किरदर के देखते हुए चल रही ऐसी भयानक हिंसा पर अगर महज इतना ही कह और कर सकता है, और दबाव बर्दाश्त न कर पाने की बात कहता है, तो यह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र और जनता दोनों को पूरी तरह निराश करने वाली, और बेसहारा छोड़ देने वाली बात है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर इस देश ने ऐसे लोग देखे हैं जिन्होंने मौजूदा कानूनों को गलत मानकर उनके खिलाफ फैसले दिए थे, जिनको संसद के बाहुबल से ही पलटा जा सका था। आज यह सुप्रीम कोर्ट अपनी ही सहूलियत की बस्ती में किए जा रहे कत्लेआम पर मुंह भी न खोल पाने की बेबसी जाहिर कर रहा है, और सदमा पहुंचाने वाले उसके शब्द हैं कि वह तभी कुछ कर सकता है जब हिंसा हो चुकी रहेगी। साम्प्रदायिक हिंसा चाहने और बढ़ाने, कहने और करने वालों को इससे अधिक और चाहिए भी क्या? सुप्रीम कोर्ट जब दबाव न झेल पाने की बात कहता है, तो कोयले की खदानों के भीतर दबाव से हीरे में बदल जाने वाले कोयले की याद आती है। आज हिन्दुस्तान के सबसे बड़े अदालती हीरे एक औसत से सतही राजनीतिक-साम्प्रदायिक दबाव में कोयले में तब्दील हो रहे हैं। जाहिर है कि दिल्ली में हत्यारों और दंगाईयों के लिए आज न सिर्फ राहत का दिन है, बल्कि बड़ी खुशी का दिन भी है कि देश की सबसे बड़ी अदालत का सबसे बड़ा जज उनके दबाव को झेल नहीं पा रहा है, और लाशों के गिराए जाने के पहले तक हत्याओं को रोक पाने में अपनी बेबसी जाहिर कर रहा है।

हिन्दुस्तान दुनिया का एक बहुत बड़ा और ताकतवर लोकतंत्र माना जाता रहा है, और जाहिर है कि ऐसे देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले दुनिया के बाकी लोकतांत्रिक देशों में भी कानून पढ़ाने के दौरान चर्चा में आते होंगे, उन्हें कई जगहों पर किताबों में लिखा जाता होगा। अब हैरानी इस बात की है कि जिस कुर्सी से निकले हुए शब्द न महज हिन्दुस्तान में, बल्कि बाकी दुनिया में भी इतिहास में दर्ज होते हैं, वह कुर्सी अपनी एक ऐसी बेबसी का रोना रो रही है जो कि लोकतंत्र के भीतर कानून की एक मामूली समझ को भी गले नहीं उतरती है। कुल मिलाकर आज हिन्दुस्तान में हिंसा के मारे गए लोगों की बात सुनने के लिए, और मौतों को रोकने के लिए महज संसद-अहाते की गांधी प्रतिमा बची है जिसके सामने जाकर विपक्ष एक प्रतीकात्मक-प्रदर्शन कर सकता है, सुप्रीम कोर्ट तो एक प्रतीकात्मक बात कहने की हालत में भी नहीं दिख रहा है, क्योंकि वह और दबाव बर्दाश्त करने की हालत में अपने को नहीं पा रहा है। वैसे सुप्रीम कोर्ट से कौन यह पूछ सकता है कि यह किस दबाव की चर्चा हो रही है?

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 2 मार्च 2020)

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