ऐसे हौसलामंद अफसरों को सलाम कि उन्होंने…

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-सुनील कुमार।।

दिल्ली में साम्प्रदायिक हमलों के शिकार बीएसएफ के एक मुस्लिम सिपाही के घर को जलाकर राख कर दिया गया, और वह सिपाही ओडिशा में तैनात था। बीएसएफ के एक डीआईजी अपने विभागीय सहयोगियों के साथ खाने-पीने का सामान लेकर उसके घर पहुंचे, उसके पिता से मिलकर दिलासा दिलाया, और उनकी तकलीफ बांटी। उन्हें यह खबर इस सिपाही से नहीं मिली थी, बल्कि अखबारी खबरों से मिली थी कि सिपाही के नाम की तख्ती के साथ बीएसएफ का जिक्र भी था, लेकिन हमलावरों ने उसके बावजूद वह घर जलाकर राख कर दिया था। डीआईजी पुष्पेन्द्र सिंह राठौर वहां बीएसएफ के इंजीनियरों के साथ पहुंचे थे, और उन्होंने अपने संगठन की ओर से इस मकान को बनवाने की घोषणा की, और परिवार को बीएसएफ कल्याण कोष से दस लाख रूपए की मदद देने की भी। उन्होंने इस मुस्लिम सिपाही का ओडिशा से दिल्ली तबादला करने की बात भी कही।

बीएसएफ यानी सीमा सुरक्षा बल। मोटेतौर पर इस सशस्त्र बल के जवान देश की सरहदों पर तैनात रहते हैं, या बस्तर जैसे नक्सल मोर्चे पर भी वे जान खतरे में डालकर काम करते हैं। बीएसएफ का एक मुस्लिम जवान जब पाकिस्तान या बांग्लादेश की सरहद पर तैनात रहता है, तो उसे सरहद के पार मुस्लिम बहुतायत वाले देश दिखते हैं, और वहां से होने वाले किसी हमले, किसी घुसपैठ के खिलाफ वह खतरे झेलते खड़े रहता है। ऐसे वक्त उस सिपाही की दिमाग की बात सोचना मुश्किल है जब उसे यह खबर लगी होगी कि देश की राजधानी दिल्ली में उसके घर को आग लगा दी गई है, और मुस्लिम होने की वजह से उस इलाकों में बहुत से लोगों का कत्ल हुआ है, बहुत आगजनी हुई है, और लोगों को इलाका छोड़कर भागना पड़ा है। जिस वक्त यह सिपाही बीएसएफ में नौकरी पर पहुंचा होगा, और किसी सरहद पर तैनात हुआ होगा, या किसी दूसरे खतरनाक हथियारबंद मोर्चे पर रहा होगा, तो जाहिर है कि वह हिन्दू बहुतायत आबादी वाले इस देश की हिफाजत के लिए खतरे की एक नौकरी कर रहा था। अब अचानक इस हिन्दू बहुतायत आबादी के कुछ चुनिंदा साम्प्रदायिक-हिंसक मुजरिम मुस्लिमों को इस तरह से मार रहे थे, और केन्द्र सरकार, संसद, सर्वोच्च न्यायालय, मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग के इस मुख्यालय में तीन दिनों तक हिंसा चल रही थी जिसमें दिल्ली की पुलिस मौजूद रहते हुए भी गायब थी, तो उसके दिल पर क्या गुजरा होगा? सच तो यह है कि हिन्दुस्तानी फौज के इतिहास के सबसे बहादुर शहीद कैप्टन हमीद की आत्मा पर क्या गुजर रही होगी जब वे यह देख रहे होंगे कि देश की राजधानी में मुस्लिमों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है? उन्होंने तो एक मुस्लिम देश के खिलाफ हिन्दुस्तान की फौज की तरफ से लड़ते हुए जान गंवाने की गारंटी वाली बहादुरी दिखाई थी, और शायद ऐसे किसी दिन की कल्पना नहीं की थी।

खैर, देश में आज जो लोग हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच एक गहरी खाई खोदने में ओवरटाईम कर रहे हैं, वे आज दिल्ली जला रहे हैं, और कल कोई और शहर जलाएंगे। ऐसे में अगर केन्द्र सरकार के एक अर्धसैनिक संगठन बीएसएफ ने ऐसी एक पहल करने का हौसला दिखाया है, तो उससे भी देश के बाकी लोगों को सबक लेना चाहिए जो कि अधिकार तो रखते हैं, और केन्द्र सरकार के अधीन काम भी नहीं कर रहे हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि वे अपने आसपास के लोगों की किस तरह, क्या मदद कर सकते हैं। देश में धर्म के नाम पर दान देने वाले करोड़ों लोग हैं, आध्यात्मिक गुरूओं के नाम पर भी दान देने वाले करोड़ों लोग हैं, लेेकिन साम्प्रदायिक हिंसा में परिवार के लोगों को, घर-दुकान, कारोबार-रोजी गंवा देने वाले लोगों की मदद के लिए दान देने का एक शब्द भी अब तक हिन्दुस्तान में गूंजा नहीं है। और कोई सभ्य देश होता तो इस बात को दान भी नहीं कहा जाता, सहयोग कहा जाता, और उसके लिए कतार लग गई होती। आज महज दिल्ली की राज्य सरकार ने लोगों को मुआवजा देने की एक घोषणा की है, जिसके इश्तहार में शिनाख्त के कुछ कागज मांगे हैं। इसी धुआं उठती दिल्ली में आज भी दंगाई सोच वाले ऐसे नफरतजीवी मौजूद हैं जो कि इस इश्तहार की तस्वीर के साथ ट्वीट करके मुस्लिमों पर तंज कस रहे हैं कि उन्हें (नागरिकता) कागज नहीं दिखाने के अपने नारे, और अपने ऐलान पर कायम रहना चाहिए (ताकि वे मुआवजा न पा सकें)। सब कुछ जलाने और जान ले लेने के बाद भी जिनकी हवस पूरी नहीं हुई है, वे अब मुआवजा न लेने की चुनौती दे रहे हैं, जिससे कि उनकी खुद की सोच उजागर हो रही है।

इस देश में धर्म और जाति के आधार पर चुन-चुनकर भेदभाव, कत्ल और आगजनी का सिलसिला न किसी मुआवजे से पूरा होगा, न ही 25-50 बरस बाद अदालत से आए किसी फैसले से ही। ये जख्म पीढिय़ों तक रिसते रहेंगे जब बच्चों को मां-बाप और दादा-दादी से हिंसा की ये कहानियां सुनने मिलेंगी। साम्प्रदायिक आगजनी किसी हादसे की तरह नहीं होती हैं जो कि बीमे की रकम से उबर जाए। साम्प्रदायिक हत्या किसी सड़क-दुर्घटना मौत की तरह नहीं होती कि वह दर्द से उबर जाए। आज देश में ताकतवर तबकों ने मिलकर जो माहौल बनाया है, उसकी आग किस दिन उनके अपने घर तक, और उनके अपने घरवालों तक पहुंचेगी इसका अंदाज उन्हें नहीं लगेगा, और उन्हें वैसे किसी दिन बस उसकी खबर लगेगी। फिलहाल बीएसएफ के ऐसे हौसलामंद अफसरों को सलाम जिन्होंने अपने एक सिपाही के परिवार के साथ जाकर इस तरह की हमदर्दी दिखाई है, और दंगाईयों को नकार दिया है।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय 1 मार्च 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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