सरकार से असहमति को राजद्रोह मानने की सोच..

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-सुनील कुमार।।


दिल्ली के जेएनयू में वहां के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार ने चार बरस पहले दर्ज देशद्रोह के मामले में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाने के लिए कानूनी मंजूरी दे दी है। कई बरस से मंजूरी का यह कागज केजरीवाल सरकार के पास पड़ा हुआ था, और कई बार केजरीवाल सवालों के घेरे में भी आए कि इस पर फैसला क्यों नहीं लिया जा रहा है। कुछ लोगों का यह भी मानना था कि कल तक सामाजिक कार्यकर्ता रहे केजरीवाल इस फर्जी दिखते मामले को लेकर कन्हैया कुमार के खिलाफ इजाजत नहीं देंगे। लेकिन अब दिल्ली का चुनाव निपट जाने के बाद उन्होंने यह इजाजत दे दी है। इसके पहले लोगों को याद रहना चाहिए कि कन्हैया कुमार के बताए जाने वाले नारों के वीडियो अदालत की फोरेंसिक जांच में झूठे साबित हो चुके हैं, और कम से कम एक अदालत ने यह माना था कि कन्हैया कुमार के कहे में कोई राजद्रोह नहीं था। लेकिन ऐसा लगता है कि चुनाव जीतने के बाद अब केजरीवाल के सामने दिल्ली के नौजवानों के समर्थन की कोई जरूरत रह नहीं गई है, और उन्होंने देश के एक सबसे बड़े नौजवान नेता को कटघरे में खड़े करने का रास्ता खोल दिया है।

सिर्फ कन्हैया कुमार की वजह से नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करके कोई भी गंभीर राजनीतिक या सामाजिक बातचीत करने वाले लोगों पर जब राजद्रोह लगाया जा रहा है, तो वह देश के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है। किसी एक राज्य के हाईकोर्ट ने हाल ही में यह for भी है कि सरकार की नीतियों से असहमति जाहिर करना किसी भी तरह से राजद्रोह नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि भारत की आज की राजनीतिक हवा में सरकार से असहमति को देश से असहमति मान लिया गया है। और लोकतंत्र में तो देश से असहमति भी कोई गद्दारी नहीं होती, वह लोकतंत्र का एक अविभाज्य और अपरिहार्य हिस्सा होती है। गणतंत्र दिवस पर जब भारत सरकार ने ब्राजील के एक घोर महिला विरोधी राष्ट्रपति को अतिथि बनाकर बुलाया, तो देश के बहुत से तबकों ने खुलकर उसकी आलोचना की। अब इसे केन्द्र सरकार से असहमति भी कहा जा सकता है, और देश के फैसले से भी। लेकिन क्या इसे राजद्रोह या देश के साथ गद्दारी भी कहा जाएगा? लोगों को याद रखना चाहिए कि भारत के मुकाबले जो अधिक परिपक्व लोकतंत्र हैं, उनमें से अमरीका में वहां की सरकार के युद्ध के फैसले के खिलाफ अनगिनत प्रदर्शन होते रहते हैं, अमरीकी राष्ट्रपति के जलवायु-परिवर्तन फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन चलते ही रहते हैं। इसी तरह जब इराक पर अमरीकी हमले में ब्रिटेन ने साथ दिया था, तो ब्रिटिश जनता सड़कों पर उतर आई थी, और राजधानी लंदन ने 10 लाख लोगों का एक ऐसा प्रदर्शन देखा था जिसकी कोई मिसाल ब्रिटिश इतिहास में भी नहीं थी। इसलिए एक बात लोगों को साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि कोई नेता देश का विकल्प नहीं होता, कोई सरकार देश का विकल्प नहीं होती, और किसी सरकार का फैसला हमेशा देश के हित में ही हो, यह भी जरूरी नहीं होता। ऐसे में बात-बात पर लोगों को गद्दार और राजद्रोही करार देना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक काम है।

कन्हैया कुमार को जिन लोगों ने सुना है, वे जानते हैं कि देश के लिए इतने दर्द के साथ इतनी लोकतांत्रिक बातें कहने वाला इतना असरदार और कोई दूसरा नौजवान नेता है नहीं। ऐसे नेता के ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चलाना किसी सरकार के कानूनी अधिकार में तो आता है, लेकिन यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही शर्मनाक बात है, और हमारी कानून की सामान्य समझ यह कहती है कि इस मामले का अदालती फैसला जब होगा, मुकदमा चलाने वाली एजेंसियों और सरकारों को अदालती लताड़ ही पड़ेगी। यह असहमति को कुचलने का एक फैसला है, और पूरी तरह से बेकसूर दिख रहे एक नौजवान को बर्बाद करने की कोशिश भी है। लोकतंत्र में लोगों के कानूनी अधिकार तो रहते हैं, लेकिन उन अधिकारों के तहत बेकसूर साबित होते-होते एक पूरी जिंदगी निकल जाती है। देश के कई अल्पसंख्यकों के मामले सामने है जिन पर दस-बीस मुकदमे चलाए गए, और बीस-पच्चीस बरस के बाद वे बेकसूर साबित होकर अदालत से निकले हैं, इस बीच उनकी जिंदगी तो खत्म हो ही गई, उनके किस्म की सोच रखने वाले तमाम लोगों के लिए यह एक बड़ी धमकी भी रही। जो लोग जेएनयू के नौजवानों का मिजाज जानते हैं, उन्हें यह मिजाज शहीद भगतसिंह की याद दिलाता है, और यह तुलना इस देश की या किसी प्रदेश की सरकार के किस तरह के होने की याद दिलाता है, यह लोग खुद तय करें।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 29 फरवरी 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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