मुकदमा चलाने की अनुमति देने में देरी क्यों हुई?

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-संजय कुमार सिंह।।
देश में जब जज लोया की हत्या का आरोप है, हत्या की जांच रोकने के उपायों की जानकारी है, खास तरह के फैसले देने वाले जजों के तबादले के आरोप हैं और ऐसा ही एक फैसला तथा तबादला हाल ही हुआ है तो कन्हैया मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति देने का दिल्ली सरकार का फैसला निश्चित रूप से शर्मनाक है। घुटने टेकने जैसा लग रहा है। पहले लग रहा था कि किन्हीं कारणों से दिल्ली सरकार ने दिल्ली पुलिस को मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी। अब दिल्ली चुनाव जीतने या भाजपा को हराने के बाद दिल्ली के दंगों में जनता की रक्षा कर पाने में बुरी तरह असफल रहने वाली आम आदमी पार्टी द्वारा इस महत्वपूर्ण मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति देना निश्चित रूप से राजनीति है और बेहद शर्मनाक है। न्याय होना ही नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। आम आदमी पार्टी इसे सुनिश्चित करने के लिए क्या कर रही है? और उसे ऐसा क्यों नहीं करना चाहिए। क्या इस एक कार्रवाई के बाद आम आदमी को भी दूसरे दलों की तरह राजनीतिक दल न मान लिया जाए?
आदर्शवाद और तर्क के लिहाज से यह ठीक है कि मामला चले या नहीं – इसे तय करने का काम अदालत का है। सरकार को इसमें नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन यह तो पुरानी बात है। यह ख्याल अब आया होगा मानने लायक नहीं है। इसलिए, फैसला अदालत में ही होना था तो मुकदमा चलाने की अनुमति देने में एक साल से भी ज्यादा का समय नहीं लगना चाहिए था। यह सही है कि चार्जशीट तीन साल में दायर हुई थी। मुझे अनुमति नहीं देने के कई कारण समझ में आते हैं, अनुमति देने के कारण पार्टी ने बताए हैं पर देरी का कारण कौन बताएगा? मुकदमा चलाने की अनुमति देने या नहीं देने का काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था। मैं और मेरे जैसे बहुत लोग समझ रहे हैं कि पार्टी ने अनुमति नहीं देने का फैसला कर लिया है। लेकिन अब पता चला कि पार्टी इस मुद्दे पर राजनीति कर रही थी। आम आदमी पार्टी ने अनुमति नहीं देकर उसका राजनीतिक लाभ लिया (अमित शाह ने भी लिया पर वह नई बात नहीं है)। अब अनुमति देकर फिर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश हो रही है।
न्याय देने या होने में देरी अदालतों के कारण होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालतें ही जिम्मेदार होती हैं। दलअसल देरी का कारण व्यवस्था है और यह व्यवस्था इसलिए है कि दोषी भले छूट जाए पर निर्दोष को सजा नहीं हो। अभी स्थिति यह है कि दोषी को सजा हो या न हो कितने ही निर्दोष को मुकदमों को फंसा कर मुकदमा लड़ने और पैसे खर्च करने की सजा दे दी जाती है। प्रभावशाली लोगों के खिलाफ यौनशोषण का मामला हनीट्रैप का मामला बन जाता है। ऐसे में आम आदमी का साथ कौन देगा? वही जो चुनाव जीतकर पलट जाते हैं? कई निर्दोष वर्षों जेल भी हो आए। कइयों की बदनामी हुई है और उन्हें परेशानी उठानी पड़ी है। देश की आम राजनीति और राजनेता इस मुद्दे पर चुप है लेकिन अब लग रहा है कि अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और उनकी सरकार भी मुकदमे में देरी और मुकदमा चलाने के अधिकार का उपयोग सजा देने के मौके के रूप में कर रही है। आम आदमी पार्टी से यह अपेक्षा नहीं है कि वह भी बहती गंगा में हाथ धोने लगे। अनुमति नहीं देने का तो मतलब और कारण समझा जा सकता है पर देरी का कारण जरूर बताया जाना चाहिए।
बहुत सारे लोग आम आदमी पार्टी को भी किसी अन्य राजनीतिक दल की तरह मानने लगे हैं। इसके लिए उनके पास अपने कारण हैं। मेरा मानना है कि राजनीति करनी है तो राजनीति के नियमों से ही होगी। इसलिए कुछ छूट मिलनी चाहिए और दी जानी चाहिए। अचानक आदर्श स्थिति नहीं बहाल की जा सकती है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप भी पूरी तरह वही करने लगे। कुछ मामलों में स्टैंड साफ होना चाहिए। इस मामले में भी मुझे आप का स्टैंड साफ लग रहा था। अब उसके तर्कों से भी मैं सहमत हूं। पर दोनों को नहीं स्वीकार कर सकता। इसलिए जरूरी है कि देरी का संतोषजनक कारण बताया जाए। मौजूदा स्थिति में इस बात में कोई डर नहीं है कि राजनीति में भाजपा के खिलाफ वही टिक पाएगा जिसके हाथ साफ हों। इस स्थिति से बचने के लिए अपने हाथ भी गंदे न किए जाएं, ऐसे लोगों को लाया जाए, आगे बढ़ाया जाए जिसके हाथ साफ हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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