देश दिल्ली से बहुत किस्म के सबक भी लेता है तो भड़कावे भी..

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-सुनील कुमार।।
दिल्ली की ताजा साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर अब खबरें सामने आ रही हैं कि किस तरह जब दंगाईयों की भीड़ एक-दूसरे को गोली मार रही थीं, घर और दुकान जला रही थीं, तब कुछ इलाकों में हिन्दू और मुस्लिम मिलकर दंगाईयों को भगा रहे थे, यह जिम्मा खुद उठा रहे थे क्योंकि पुलिस कहीं नहीं थी। एक सच्ची कहानी ऐसी भी आई है कि दंगों के दिन ही एक हिन्दू लड़की की शादी तय थी, और आसपास के सारे मुस्लिमों ने मिलकर उस शादी में काम किया, उसे हिफाजत के साथ निपटाया। मुस्लिमों के बताए हुए कुछ ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जिनमें हिन्दू परिवारों ने अपने घर में उन्हें रखा, और उन्हें बचाया। यह सब ऐसे माहौल में हो रहा था जब दिल्ली के कुछ नेता लगातार भड़काने वाली बातें कर रहे थे, ट्वीट कर रहे थे, या बोलने की जगह पूरी तरह चुप भी थे। यह सब उस माहौल के बीच हुआ जब लोग अगल-बगल की कई दुकानों में से कुछ चुनिंदा दुकानों को उनके नाम देखकर, उनके धर्म के आधार पर जला रहे थे, और उनके बगल की दुकानें जिन ईश्वरों के नाम की वजह से बच गई थीं, उन ईश्वरों ने पड़ोस की बेकसूर दुकान को भी नहीं बचाया था। यह सब उस माहौल के बीच हुआ जब देश के मीडिया का एक हिस्सा इन दंगों को देश में दंगों के इतिहास के साथ जोड़कर एक तुलना भी सामने रख रहा था। कुल मिलाकर आम इंसान जगह-जगह इंसान थे, और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लोग धर्म की आबादी का अनुपात गिनाते हुए कम होने पर भी अधिक (कत्ल) की धमकियां दे रहे थे, या दूसरी तरफ से कानून अपने हाथ में लेने की बात कर रहे थे। इस बीच एक कार्टून ऐसा भी छपा जिसमें जमीन पर गिरे एक आदमी को दूसरा खड़ा हुआ आदमी मारने पर उतारू है, और गिरा हुआ आदमी अपना मोबाइल फोन दिखाकर उसे याद दिला रहा है कि वे दोनों फेसबुक-फ्रेंड हैं।

दिल्ली की साम्प्रदायिक हिंसा को कुछ लोग दंगा मानने से इंकार कर रहे हैं, और इसे अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों का हिंसक और हत्यारा हमला कह रहे हैं। दूसरी तरफ बहुसंख्यकों की ओर से कुछ तस्वीरें और कुछ वीडियो सामने रखे जा रहे हैं कि किस तरह अल्पसंख्यकों की छतों से हमले हुए हैं। इन तमाम बातों की जांच जब भी होगी, उस पर देश की आज की दिमागी हालत पता नहीं भरोसा कर पाएगी या नहीं क्योंकि आज तो हालत यह है कि कानूनी समाचारों की एक प्रतिष्ठित वेबसाईट ने यह तुलना सामने रखी है कि दंगों की रात पुलिस को फटकारने वाले एक हाईकोर्ट जज को तुरंत हटा देने के बाद अगले दिन सुनवाई करने वाले जजों का रूख कैसा बदला हुआ था। आमतौर पर ऐसी तुलना होती नहीं है, लेकिन जब एक ही मामले की सुनवाई में जज बदल जाने के बाद जब रूख जमीन-आसमान किस्म का बदल जाता है, तो आम लोगों के मन में ऐसी तुलना होती ही है, इसे एक कानूनी वेबसाईट ने बारीकी से सामने रखा है। इसलिए आज जब अदालत के रूख को भी आम जनता सोशल मीडिया पर खुलकर कोसने की दिमागी हालत में है, तो ऐसे में वहां कौन सी जांच लोगों का भरोसा जीत पाएगी, यह सोचना कुछ मुश्किल है।

लोकतंत्र में कानून और व्यवस्था लागू करने का काम शासन, प्रशासन, पुलिस का रहता है, और जुर्म के निपटारे का काम अदालत का रहता है। दिल्ली में पिछले कुछ हफ्तों में इन तमाम संस्थाओं ने अपनी विश्वसनीयता और साख को कुछ या अधिक हद तक खोया है, और यह नुकसान करीब 40 जिंदगियों के नुकसान से कम नहीं है क्योंकि लोकतंत्र अपनी संस्थाओं की साख पर चलने वाली व्यवस्था है। दिल्ली का यह हाल हिन्दुस्तान में बहुत समय बाद इस किस्म के दंगों की याद ताजा कर रहा है, देश में साम्प्रदायिकता के एक खतरे को ताजा कर रहा है, और पुलिस की पूरी तरह खोई हुई साख के खतरे सामने रख रहा है, फिर चाहे उसके पीछे पुलिस की राजनीति से अपनी खुद की दहशत हो, या कोई और वजह। यह सिलसिला मौतों की गिनती से कहीं अधिक नुकसान का है, और आग उगलने वाले कुछ हिन्दू-मुस्लिम नेताओं को कैद में भी डाल दिया जाए, तो भी अड़ोस-पड़ोस के जिन लोगों ने एक-दूसरे के घर-दुकान जलाए हैं, उनके बीच की दरार हो सकता है कि अगली एक-दो पीढ़ी तक कायम रहे। दिल्ली देश की राजधानी है, और इस नाते उसे कई मामलों में बाकी देश के सामने एक मिसाल भी बनकर रहना चाहिए। दिल्ली सत्ता का केन्द्र है, दिल्ली पुलिस जिसके मातहत है, वह केन्द्रीय गृहमंत्री भी इन दंगों से कुछ ही किलोमीटर पर थे, और प्रधानमंत्री भी। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज भी इन दंगों वाले शहर में ही थे, और दिल्ली के गैरराजनीतिक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी। ऐसे में अगर इनमें से किसी ने, इन सबने, अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काटी है, तो वह देश के सामने एक बहुत बुरी मिसाल पेश कर रही है, और उनकी साख को भी चौपट कर रही है। दिल्ली में विधानसभा के चुनाव जरूर निपट गए हैं, लेकिन उस वजह से किसी की जिम्मेदारी नहीं निपट गई है। देश दिल्ली की ओर न सिर्फ देख रहा है, बल्कि वह दिल्ली से बहुत किस्म के सबक भी लेता है, और भड़कावे भी।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 28 फरवरी 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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