शेयर बाजार हो या अर्थव्यवस्था, दोनों धूल में..

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जयशंकर गुप्त।।

शेयर बाजार धड़ाम। सेंसेक्स 1150 और निफ्टी 350 प्वाइंट से अधिक नीचे लुढ़क गया। अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। लेकिन हमें- आपको चिंतित होने की खास वजह नहीं! हमने अपनी सरकार इन कामों के लिए तो चुनी नहीं थी। और उन लोगों ने वोट भी तो कुछ और कामों के लिए मांगा था। वह काम तो बखूबी हो रहे हैं न!

हिन्दू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान के नाम पर खड़ी नफरत की दीवार चौड़ी हो रही है न! तो इसकी राजनीतिक फसल भी उन्हें काट लेने दीजिए। धर्म और जाति के आधार पर हो रहे ध्रुवीकरण का लाभ अगले किसी चुनाव में लिया जा सकेगा! आज इतना तो हो ही गया है न कि मुसलमान दंगों के लिए भाजपा के कट्टरपंथी हिंदू नेताओं के जहरीले नारों और भाषणों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं तो हिन्दू मुस्लिम समाज के कट्टरपंथियों के जहरीले नारों और बयानों को उत्तर पूर्वी दिल्ली के बड़े हिस्सों को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने का जिम्मेदार मान रहे हैं।

सोशल मीडिया और ह्वाट्सैप यूनिवर्सिटी दोनों पक्षों को तुष्ट और उत्तेजित करनेवाले बयान, वीडियोज और फोटो, बिना प्रामाणिकता सुनिश्चित किए अबाध गति से परोसने और हिन्दू मुसलमान के बीच नफरत और अविश्वास की खाई को चौड़ी और गहरी करने में लगे हैं। सच बोलने, लिखने और फैसला करने की सजा पत्रकारों और अदालतों को भी दी जाने लगी है।
उत्तर पूर्वी दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों में मरनेवालों का अधिकृत आंकड़ा 38 का हो गया है। तमाम लोग गंभीर हालत में जख्मी हैं। अरबों रुपये की संपत्ति और दशकों का भाईचारा सांप्रदायिक दंगों की आग में जल कर राख हो गया है। इन दंगों-उपद्रवों के शांत होने के बाद कभी फुरसत मिले तो इन दंगों के असली कारणों और इनका शिकार हुए लोगों की सामाजिक और आर्थिक हालत पर भी विचार करिएगा। खोजिएगा कि उनमें दंगा भड़काने वाले किसी बड़े नेता, नौकरशाह, सेठ, बड़े बाप के बेटे, भाई, भतीजे और बहन का नाम है क्या!

दिल्ली के दंगों में नफरत की राजनीति और माहौल को चुनौती देनेवाले भाई चारे के छिटपुट उदाहरण भी देखने को मिले हैं जहां समझदार हिंदुओं ने अपने इलाके में असुरक्षित मुसलमानों को अपनी जान जोखिम में डालकर भी संरक्षण दिया। उनका बचाव किया। इसी तरह से मुस्लिम बस्तियों में भी समझदार मुसलमानों ने आसपास के हिन्दू परिवारों और उनके धर्मस्थलों की हिफाजत की। इन उदाहरणों को हमारी, आपकी और खासतौर से नफरत की राजनीति करनेवालों की नजर न लगे।

इस तरह के उदाहरणों पर ही लोकतांत्रिक भारत की नींव खड़ी है। इसे कमजोर करने के कुत्सित प्रयास लगातार हो रहे हैं। हो सके तो इन प्रयासों को नाकाम करिए अन्यथा सांप्रदायिकता की आग की लपटें हमारे आपके घर, परिवार, गांव, जवार और शहर से बहुत दूर नहीं हैं।
और हां,’ हिन्दू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान’ के राजनीतिक खेल से मन ऊब जाए तो कृपा कर बढ़ रही महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के साथ ही हमारी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था का खयाल भी जरूर करिएगा। क्या पता जन मानस, जन दबाव बनकर हमारे राजनीतिकों को सही रास्ते पर लाने में कोई भूमिका निभा सके।

(जयशंकर गुप्त वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ साथ प्रेस काँसिल ऑफ इंडिया के सदस्य हैं)

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