एक बेहतर हिस्सेदारी वाला सीएम दिल्ली में बेहतर होता..

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-सुनील कुमार।।

हाल ही के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को विलुप्त और भाजपा को रौंद देने वाली आम आदमी पार्टी के सामने दिल्ली की ताजा साम्प्रदायिक हिंसा एक नए किस्म की चुनौती खड़ी कर चुकी है। कहने के लिए तो कानूनी व्यवस्था यह है कि दिल्ली की पुलिस केन्द्र सरकार के मातहत काम करती है, और राज्य सरकार किसी दूसरे राज्य की सरकार जैसी नहीं है, वह लेफ्टिनेंट गवर्नर के मातहत काम करने वाली, सीमित अधिकारों वाली एक व्यवस्था है। लेकिन इस सीमित-सरकार को चुनते तो वोटर ही हैं, और यह चुनाव एक राजनीतिक व्यवस्था भी है। इसलिए जब दिल्ली एक साम्प्रदायिक हिंसा से गुजर रहा है, तो पुलिस के लिए तो केन्द्र सरकार जवाबदेह है, लेकिन दिल्ली की जनता के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी से केजरीवाल सरकार भी बच नहीं सकती है।

पिछले पांच बरस तक दिल्ली में सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, और उनकी आम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति में एक नए किस्म का मॉडल सामने रखने की कोशिश की जो कि अपने आपको राजनीति से परे, एनडीए और यूपीए से परे, नागरिकता, धर्म, जाति जैसे मुद्दों से परे, आरक्षण और खानपान की लड़ाई से परे की पार्टी साबित करती रही। नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी के राजनीतिक विरोधी कोई नहीं रह गए, और उसने जो अच्छे सरकारी काम किए थे, उनका फायदा पाकर वह चुनाव फिर जीत गई। हमने पहले भी इसी जगह लिखा था कि केजरीवाल ने अपने आपको एक काबिल और कल्पनाशील म्युनिसिपल-कमिश्नर साबित किया, और दिल्ली पर राज करते हुए भी शाहीन बाग जैसे एक सबसे चर्चित मुद्दे पर मुंह भी नहीं खोला, और चुनाव लड़ लिया। यह चुनाव इस कदर गैरराजनीतिक रहा कि जिस शाहीन बाग पर गद्दारी की तोहमतें लगाकर भाजपा ने चुनाव लड़ा, और जिस तरह बाकी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने आंदोलनकारियों का साथ दिया, उन सबसे आम आदमी पार्टी ने अपने को अलग रखा। और तो और जेएनयू, कन्हैया कुमार, जामिया जैसे बाकी जलते मुद्दों पर भी आम आदमी पार्टी ऐसी तटस्थ बनी रही जैसी कोई पार्टी हिन्दुस्तान में कभी नहीं रही।

अब दिल्ली की इस साम्प्रदायिक हिंसा के बीच की बात देखें, तो दंगा हो जाने के बाद, हमलों में मौतों के बाद केजरीवाल ने महज दिल्ली पुलिस के बेअसर होने की बात कही, और फौज को बुलाने की बात कही। लेकिन जलती-सुलगती दिल्ली को बचाने के लिए केजरीवाल की पार्टी और उनकी सरकार की कोई पहल जमीन पर नहीं दिखी। अब सवाल यह उठता है कि क्या दिल्ली में राजनीति, सामाजिक सुरक्षा, अल्पसंख्यकों के मुद्दे, ये सब महज केन्द्र सरकार और बाकी विपक्ष के बीच के रहेंगे, और केजरीवाल एक अफसर की तरह काम करते हुए स्कूल-अस्पताल, मैट्रो जैसी जनसुविधाओं तक अपने को सीमित रखेंगे? यह बहुत अजीब किस्म का मॉडल है, और विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद हमने इसी जगह लिखा भी था कि यह एक शहर वाले, सीमित अधिकारों वाले राज्य दिल्ली तक तो कामयाब हो सकता है, लेकिन जटिल आर्थिक-सामाजिक, धार्मिक और जातीय व्यवस्था वाले, विविधता से भरे हुए हिन्दुस्तान में यह कामयाब नहीं हो सकता। तनाव के इस दौर में केजरीवाल ने अगर कुछ साबित किया है, तो वह यही साबित किया है कि वे एक अफसर की तरह काम करने वाले, भारत की व्यापक राजनीतिक व्यवस्था से परे जीने वाले नेता हैं, और उनकी पार्टी भी उसी किस्म से चलने वाली है। दिल्ली को एक बेहतर हिस्सेदारी करने वाला मुख्यमंत्री ऐसे मौके पर अधिक काम का होता।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय
27 फरवरी 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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