दिल्ली-हिंसा का सबसे बड़ा नुकसान आखिर हुआ किसे..

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-सुनील कुमार।।

दिल्ली में कल नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक प्रदर्शन एक संघर्ष में बदल गया, और अभी यह अटकलें लगाना ठीक नहीं होगा कि इस भारी हिंसा के लिए कौन कुसूरवार हैं। फिर भी एक मुस्लिम नौजवान एक पिस्तौल से गोलियां चलाते कैमरों पर कैद हुआ है, एक पुलिस जवान पथराव में मारा गया है, और बहुत से रिपोर्टरों का यह कहना है कि उनकी आंखों के सामने पुलिस और नागरिकता-विरोधी मिलकर हमला करते रहे, इसके वीडियो भी कल से तैर रहे हैं। मीडिया के एक हिस्से का यह भी कहना है कि दिल्ली के भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने दो दिन पहले यह सार्वजनिक भाषण दिया था कि पुलिस कुछ जगहों पर शुरू हुआ नागरिकता-विरोधी धरना खत्म करवाए, वरना तीन दिन बाद वे पुलिस की भी नहीं सुनेंगे। कुछ लोगों का कहना है कि इस भाषण के जरा देर बाद ही हिंसा शुरू हो गई थी। लेकिन हम दिल्ली से दूर बैठे हैं, और अलग-अलग समाचार माध्यमों से आ रही खबरों को देखकर ही इस पर लिख रहे हैं, आंखों देखी नहीं।

दो महीने से अधिक से दिल्ली के शाहीन बाग में एक पूरी तरह शांतिपूर्ण आंदोलन नागरिकता-संशोधन के खिलाफ चल रहा था, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही थी, और बाकी दुनिया में भी जिनको हिंदुस्तान मेंं दिलचस्पी है वे इसे गौर से देख रहे थे। इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसका शांतिपूर्ण होना था, यह एक अलग बात है कि कुछ लोगों ने उसके बीच बुर्का पहनकर घुसकर बवाल खड़ा करने की कोशिश की भी थी। महीनों तक चले इस आंदोलन का इतना शांत रहना देश में एक अलग किस्म की मिसाल बन चुका था। ऐसे में उसी मुद्दे पर दिल्ली के कुछ और इलाकों में शुरू हुए आंदोलन, और उसके खिलाफ खड़े हुए आंदोलन के बीच हुए संघर्ष में एक पुलिस जवान सहित कई मौतों की खबर है। इस बीच अधिकतर समाचार स्रोतों का यह कहना है कि दिल्ली की पुलिस तनाव पर काबू के मुताबिक तैनात नहीं थी, बहुत से लोगों का कहना है कि उसने समय रहते कार्रवाई नहीं की, और बहुत से लोगों का यह भी कहना है कि नागरिकता संशोधन-विरोधियों के साथ मिलकर, उन्हें साथ लेकर दिल्ली पुलिस ने नागरिकता-विरोधियों पर पथराव किया, हमला बोला। यह किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच से भी साबित हो सकता है कि देश की राजधानी में इस अचानक हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार हैं, और आज के वक्त में ऐसी जांच कुछ मुश्किल भी दिख रही है। जिन लोगों को दिल्ली की व्यवस्था मालूम नहीं है, उन्हें यह बताना जरूरी है कि देश की राजधानी की पुलिस केंद्र सरकार की मातहत है, केजरीवाल सरकार की नहीं। अभी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यह बयान दिया है कि दिल्ली पुलिस दंगाईयों पर कार्रवाई करने के बजाय ऊपर से निर्देश आने का इंतजार करती रहती है, और जाहिर है कि यह ऊपर केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय ही है।

जो भी हो, यह समझने की जरूरत है कि इस ताजा हिंसा से एक बहादुर पुलिसकर्मी की मौत हुई है, और कुछ नागरिकों की भी। बहुत से इलाकों में हिंसा फैली है जो कि एक बड़ा नुकसान है। लेकिन इन सबके मुकाबले एक अधिक बड़ा नुकसान नागरिकता संशोधन-विरोधी आंदोलन का हुआ है जो कि अब तक सौ फीसदी शांतिपूर्ण चल रहा था, और अब कम से कम एक तबके के हाथ यह तोहमत तो लग ही गई है कि ये आंदोलनकारी हिंसा कर रहे हैं। तोहमतों से परे दिल्ली और बाकी देश को भड़काऊ भाषणों से बचाने की जरूरत है, और हिंसा से भी। यह बात बहुत मायने नहीं रखती कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिल्ली में रहते हुए ऐसी हिंसा हुई है। प्रधानमंत्री की पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने पुलिस अफसर की मौजूदगी में, उनके रोकते-रोकते भी सार्वजनिक रूप से यह भाषण दिया था कि वे अभी ट्रंप के प्रवास की वजह से चुप हैं, और तीन दिन के बाद वे पुलिस की भी नहीं सुनेंगे। दिल्ली की ताजा घटनाओं में यह अच्छी तरह दर्ज है कि इसके पहले भी कपिल मिश्रा और उनके जैसे एक-दो और नेताओं के हिंसक बयानों के बाद तनाव भड़का था, दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त चुनाव आयोग को इन पर रोक भी लगानी पड़ी थी। ऐसे नेताओं की पार्टियों को तनाव के ऐसे दौर में इनकी बदजुबानी के बारे में सोचना चाहिए, और फैसला लेना चाहिए।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 25 फरवरी 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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