पुस्तक अंश : न्यु इंडिया में मंदी : लेखकीय वक्तव्य..

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-चंद्र प्रकाश झा (सुमन) ।।

कुछ बातें:
हमने मुंबई में बरसों तक आर्थिक-वित्तीय पत्रकारिता करने से बहुत पहले इन विषयों पर लिखने की शुरुआत इस पुस्तक में कालाधन पर शामिल आलेख से ही की थी.वो पहली बार 16 मई 1985 को पाक्षिक अखबार पींग (रोहतक , हरियाणा ) में छपा था.इसके संस्थापक-सम्पादक डी.आर.चौधरी दयाल सिंह कॉलेज (दिल्ली) में अँग्रेजी के प्राध्यापक रहे थे. हमने आलेख फ्री-लांस पत्रकारिता के दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के ओल्ड कैम्पस की लायब्रेरी में तैयार किया था. बहरहाल जब पींग के अगले अंक में आलेख की सराहना में हिंदी-उर्दू के साहित्यकार हंसराज रहबर (1913-1994) का सम्पादक के नाम लिखा पत्र छपा तो हमारा हौसला बढ़ना स्वाभाविक था.
यही आलेख हाल में कुछ नवीकरण के साथ नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक नेशनल दुनिया और मासिक पत्रिका समयांतर के अलावा न्यूज पोर्टल, दसिटिज़न-हिंदी में भी छपा. हम खुद अचरज में पड़ गये कि कालाधन पर तीन दशक से पहले के आलेख और उसकी मौजूदा स्थिति में मोदीराज की नोटबंदी की कष्टकारी बातों को छोड़ मूल प्रस्थापना में कोई ख़ास फर्क नहीं आया है. जाहिर है आर्थिक विषय जल्दी ठंढे नहीं पड़ते हैं. उनका असर बरसों तक गहराता रहता है.
तीन-चार दशक पहले आर्थिक विषयों पर हिंदी में लिखने वाले गिने-चुने पत्रकार थे.अब हर अखबार में आर्थिक विषयों के लिए कम से कम एक पेज होता है. आर्थिक अखबार भी हिंदी में छपने लगे है. लेकिन अभी भी आर्थिक विषयों पर मूलतः हिंदी में लिखने वाले स्तरीय पत्रकार बहुत नहीं हैं.यह भी गौरतलब है कि हिंदी के आर्थिक अखबारों में ज्यादातर खबर और लेख अंग्रेजी में लिखे आलेखों के अनुवाद ही होते हैं.
अनुवाद की भाषा, कथ्य और रवानी में भी कुछ न कुछ खामी रह जाती हैं, जिसे मित्र टी के अरुण ने पुस्तक के फॉरवर्ड में विस्तार से सही बताया है. ये बात ध्यान में रख कर ही हमने उनके ही नहीं जेएनयू जमाने से मित्र अहमद शाह फिरोज के अंग्रेजी में लिखे फॉरवर्ड का भी हिंदी अनुवाद करने की जरुरत नहीं समझी. अगर यह खामी है तो इसके लिए हम इन दोनों मित्रों और अपने पाठकों के प्रति भी क्षमाप्रार्थी हैं.

विज्ञान आदि विषयों की तरह आर्थिक विषयो पर भी भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता की बड़ी समस्या यह है कि उनके मूल लेखन से लेकर अनुवाद तक में जो टर्म इस्तेमाल किये जाते हैं वे आसानी से पाठकों के पल्ले नहीं पड़ते.क्योंकि जरुरी नहीं है कि ये पाठक सुशिक्षित हों. भारतीय भाषाओं के पाठकों में ट्रक, टैक्सी और रिक्शा चालक भी होते हैं. इसलिए हर ऐसे टर्म का आलेख में प्रथम प्रयोग के साथ ही सरल शब्दों में समझाने की जरुरत पड़ती है.
जैसे, इस पुस्तक के पहले ही आलेख ‘ न्यू इंडिया में मंदी ‘ में मुझे अपने पाठकों के लिए जटिल आर्थिक-वित्तिय प्रक्रियाओं को सरल भाषा में लिखना जरुरी लगा.ये पाठक मंहगाई और मंदी समझ जाते हैं.लेकिन जरुरी नहीं है कि वे सब के सब इन्फ्लेशन,रेशेसन, डिप्रेशन, ग्रेट डिप्रेशन, स्टेग्नेशन, स्टैगफ्लेशन आदि आसानी से समझ जाएं.स्टैगफ्लेशन को हिंदी में जिह्वा मरोड कर मुद्रास्फीति-जनित मंदी कहने के बजाय यह इंगित कर जटिल महामंदी कहा जा सकता है कि यह वो आर्थिक प्रक्रिया है जिसमें मंदी, मंहगाई आदि भी समाहित हैं. इसके पहले कि भारत में मौजूदा मंदी और उससे जुड़ी प्रक्रियाएं और भी जटिल हो जाये कुछ सरल शब्द गढ़ने में कोई हर्ज नहीं है.

पुस्तक में शामिल लगभग सभी आलेख तीन दशक से अधिक की हमारी पत्रकारिता में विभिन्न समाचारपत्र-पत्रिका में प्रकाशित सामग्री का चयनित संकलन है.इनमें 1986 में ‘ यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया ‘ की हिंदी सेवा यूनीवार्ता में नियमित नौकरी शुरू करने से ऐन पहले मई दिवस की शताब्दि के अवसर पर रविवारी जनसत्ता में ‘ हमारी मांगे पूरी करो के बाद क्या ‘ शीर्षक से प्रकाशित हमारा आर्थिक-राजनीतिक अग्रलेख भी शामिल है.

हम जानते हैं कि आर्थिक उत्पादन के साधनों में श्रम भी है. इसलिए उसकी अनदेखी नही की जानी चाहिए.जब मुंबई में कपड़ा मिलों की बहुतायत थी तब वहाँ के अखबारों के पत्रकारों के लिए अलग से ‘ लेबर बीट ‘ होता था.कोई भी अखबार इन कपड़ा मिलों के लाखों कामगार के पाठक वर्ग की अनदेखी नहीं कर सकता था.दुर्भाग्यवस वो कपड़ा मिलें जब एक-एक कर बंद हो गईं तो अखबारों में पत्रकारों का लेबर बीट भी बंद हो गया.
लेबर बीट की जगह बहुत हद तक विभिन्न कंपनियों के शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध होने के लिए निकाले जाने वाले प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) ने ले ली.ये आइपीओ देश की अर्थव्यवस्था के औद्योगिक-पूंजीकरण में वृद्धि का सूचक है. इन निर्गम के सिलसिले में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में वितरित पाठ्य सामग्री में बहुत जानकारी होती है. लेकिन भारतीय भाषाओं के कम ही पत्रकार इन पाठ्य सामग्री को खंगाल कर वो जानकारी अपने पाठकों को देते हैं.
पहले हम ज्यादातर राजनीतिक पत्रकारिता करते रहे. लेकिन 2003 में चंडीगढ़ से मुम्बई स्थानांतरित होने के बाद हमें 2017 में इसी त्रिभाषी न्यूज एजेंसी के विशेष संवाददाता पद से से सेवानिवृत्त होने तक आर्थिक-वित्तीय पत्रकारिता भी करनी पड़ी जिसके तब हज़ारों ग्राहक अखबार होते थे. इस विशाल
पाठक वर्ग के लिए जिम्मेवारी से लिखने हमें बहुत सीखने का अवसर मिला जिसके लिये हम यूएनआई के प्रति कृतज्ञ हैं.
मुंबई में ही संयोग से मुझे ‘ इंडियन बिजनेस जर्नलिस्ट असोसिएशन ‘ (इब्जा) का संस्थापक महासचिव चुना गया. इब्जा ने आईपीओ आदि के मौके पर आयोजित प्रेस कांफ्रेंस के नियमन के लिए अनौपचारिक भूमिका निभाने के अलावा आर्थिक-वित्तीय विषयों के पत्रकारों के लिए कुछेक कार्यक्रम भी आयोजित किये. अफसोस कि एक ट्रस्ट और सोसायटी के भी रूप में स्थापित यह संगठन कुछ अपरिहार्य कारण से निष्क्रीय पड़ गया. लेकिन उसकी स्थापना से इस विचार को बल मिला कि अंग्रेजी ही नहीं भारतीय भाषाओं के पाठकों को भी पत्रकारों के माध्यम से सरल तरीके से पूंजी बाज़ार आदि की गतिविधियों की जानकारी पहुंचाने में सहायता के लिए सांस्थानिक हस्तक्षेप की जरुरत है.

हमारा उद्देश्य रहेगा कि अर्थान्तर पुस्तक श्रंखला के आगामी भागों में आर्थिक-वित्तीय विषयों की ऐसी और चर्चा की जाये जिसे समझ कर हम पत्रकार ही नहीं आम पाठक भी अर्थव्यवस्था की गतिविधियों पर पैनी निगाह रख सकें.
पुस्तक में शामिल आलेखों में संदर्भित जानकारी के प्राथमिक स्रोत अथवा द्वितीयक स्रोत के रूप में विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं का साभार यथासंभव उल्लेख किया गया है.हम सिलसिले में समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट, जनचौक के सम्पादक महेंद्र मिश्र, मीडिया विजिल के सम्पादक पंकज श्रीवास्तव, दसिटीज़न-हिंदी की सम्पादक सीमा मुस्तफा, नेशनल दुनिया के पूर्व सम्पादक प्रदीप सौरभ और जन मीडिया के सम्पादक अनिल चमडिया के प्रति कृतज्ञ है, जिनके लिए लिखे कई आलेख इस पुस्तक में शामिल हैं.हम अपने लेखक साथियों- असीम मुकेश और गिरीश मालवीय के प्रति विशेष आभार व्यक्त करना चाहते है जिन्होंने उनके लेखन को उद्धृत करने की छूट दे रखी है.हम प्रकाशक नॉटनल के मुख्य कार्याधिकारी नीलाभ श्रीवास्तव के तत्पर सहयोग के लिए भी आभारी हैं.
इस श्रंखला के पहले भाग के लिये आवरण चित्र का चुनाव हमने जर्मन साहित्यकार ग्युंटर ग्रास (16 अक्टूबर 1927-13 अप्रैल 2015 ) की घोंघा (स्नेल) शीर्षक कविता से प्रेरित होकर किया. उन्हें 1959 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘ द टिन ड्रम’ ‘ के लिए 1999 में नोबेल साहित्य पुरस्कार मिला था. इसमें उन्होंने नाजीवाद के उदय पर जर्मनी वासियों की प्रतिक्रिया, विश्वयुद्ध का खौफ और इसमें हार से उपजे अपराध बोध को दर्शाया है. बाद में इस किताब पर बनी फ़िल्म को ऑस्कर पुरस्कार मिला.
उनकी उक्त कविता में जो भाव उभरते है उनका भारत के मौजूदा हालात से कुछ हद तक साम्य नज़र आ सकता है.
हमने 1985 में पींग के लिए इस कविता का जेएनयू में जर्मन पढे कश्मीरी मित्र इम्तियाज़ बख्शी (मोंटी) के सहयोग से हिंदी भावानुवाद किया था. कविता में इस जल-जीव की अति संवेदनशीलता और उसके अस्तित्व की रक्षा के लिए उपलब्ध प्राकृतिक कवच पर ध्यान केंद्रित किया किया गया है. हमें लगता है कि मौजूदा जटिल मंदी की शिकार हो चुकी भारत की संवेदनशील अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिये सहज कवच उपलब्ध कराने की जरुरत है.
मोंटी उनका प्यार का नाम था.वह हमारे बीच नहीं रहे. हम यह पुस्तक मोंटी की अमेरिका में बसी बड़ी बहन तसनीम बक्शी-रोजनर के माध्यम से मोंटी की स्मृति को समर्पित करते हैं, जिनसे हमें जर्मन अर्थव्यवस्था के नाज़ी राज में तबाही और लोकतांत्रिक जर्मनी में पुनर्निर्माण को समझने का मौक़ा मिला था.


(इस बरस भारत के गणतंत्र दिवस के अवसर पर लोकार्पित इस पुस्तक की बिक्री से मिलने वाली लेखकीय रॉयल्टी गांव के दो स्कूली बच्चे-बच्ची को मासिक छात्रवृत्ति के रूप में देने का संकल्प है. ई-पुस्तक के प्रिव्यू,रिव्यु और खरीद का लिंक है:
http://NotNul.com/Pages/ViewPort.aspx?ShortCode=q62o4Q8y)

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