दंगों की राजनीति का शिकार मत बनो, अवामी एकजुटता कायम करो!

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दिल्ली की जनता के नाम एक ज़रूरी अपील!

बहनो, भाइयो और साथियो!
दिल्ली के कई इलाकों में इस वक़्त अफरातफरी फैली हुई है और रह-रहकर पत्थरबाज़ी व दंगे हो रहे हैं। भाजपाइयों और संघियों की अगुआई में गुण्डा तत्त्वों ने शान्ति-व्यवस्था को पलीता लगा दिया है। कपिल मिश्रा इलाके के सद्भाव में आग लगवाकर अब शान्ति की बेशर्मी भरी अपील डाल रहा है। हिन्दू हों या मुस्लिम हर जगह आम आबादी भय के साये में है, असामाजिक तत्त्वों को खुलकर खेलने का मौका मिल गया है।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार पुलिस मूकदर्शक बनकर देख रही है, अपराधियों पर उचित कार्रवाई नहीं कर रही है। लोगों की वेशभूषा देखकर हमले किये जा रहे हैं, घरों पर पथराव हो रहा है और इन्हें आग लगायी जा रही है, कई धरनास्थलों को भी आग के हवाले कर दिया गया है। चाँदबाग़, मुस्तफाबाद, नूर-ए-इलाही, करदमपुरी सहित कई इलाकों में स्थिति बेहद तनावपूर्ण है। इस पूरे दंगे-फ़साद में सैकड़ों लोग घायल हुए हैं एक पुलिसकर्मी की भी जान जाने की और कइयों के घायल होने की ख़बरें हैं। सत्ता पक्ष यही चाहता था कि माहौल तनावपूर्ण बने और इन्हें पूरे विरोध प्रदर्शन को मुद्दे से भटकाने का मौका मिले। देश में आज जनता की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में सरकार नाकाम साबित हो रही है। हिन्दू-मुसलमान के बीच तनाव भड़काकर साम्प्रदायिक तत्त्व असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाना चाहते हैं।

सबसे पहले हम दिल्ली के तमाम जाति-मज़हब के लोगों से अपील करेंगे कि अफ़वाहों से बचें, शान्ति बनाये रखें और आपसी भाईचारे की मिसाल कायम करें। साम्प्रदायिक माहौल में चुनावी नेता और साम्प्रदायिक तत्त्व अपना उल्लू सीधा करके निकल जायेंगे और जान-माल का नुकसान होगा तो हमारा होगा, भाईचारे में दरार पड़ेगी तो हमारे में पड़ेगी। अपने बुनियादी हक़ों से हम पहले ही दूर हैं यदि जनता का भाईचारा बिगड़ता है तो और भी दूर हो जायेंगे। इसलिए हम आप सभी से अपील करते हैं कि किसी भी क़ीमत पर शान्ति और भाईचारा कायम करें।

दूसरी बात हम सीएए-एनआरसी के विरुद्ध प्रदर्शनरत बहनों-भाइयों से करना चाहेंगे। हमें ऐसा कोई भी काम नहीं करना है जिसकी वजह से पुलिस-प्रशासन और सरकार को हमारे आन्दोलनों को कमज़ोर करने का मौका मिले। जोश में होश न खो बैठें जिसकी वजह से हमारा मुख्य मुद्दा पीछे छूट जाये और न्याय का हमारा संघर्ष दंगों की भेंट चढ़ जाये। यदि तमाम धर्मों की मेहनतकश आबादी का एक विचारणीय हिस्सा सीएए-एनआरसी की जनविरोधी नीतियों के विरोध में सड़कों पर उतरेगा तभी यह सम्भावना बनेगी की हम लोग सरकार को झुका सकते हैं और एक अप्रैल तक एनपीआर लागू करने से पहले ही इसके ख़िलाफ़ एक ज़बरदस्त सविनय अवज्ञा आन्दोलन खड़ा कर पायेंगे।”जन सत्याग्रह पदयात्रा” का हमारा अनुभव कहता है कि लोगों के जीवन का सच उनके सामने जाता है तो लोग बात सुनते हैं। 16 फ़रवरी से लेकर आज 24 तारीख़ तक 9 दिनों में हम लोग क़रीब 200 किलोमीटर की यात्रा तय करके हज़ारों लोगों तक अपनी बात पहुँचा चुके हैं, एकाध को छोड़कर हर जगह लोगों ने हमारी बातों पर गौर किया है और हमें उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिली है।

हमें लोगों तक यह सच लेकर जाना पड़ेगा कि सीएए-एनआरसी केवल मुस्लिमों का मुद्दा नहीं है बल्कि ये क़ानून-नीतियाँ देश की हर जाति-मज़हब की बहुसंख्यक मेहनतकश जनता के ख़िलाफ़ हैं। हमें आम जनता ख़ासकर मेहनतकशों के बीच भाजपा-संघ परिवार की कुत्सित बँटवारे की राजनीति का पर्दाफ़ाश करना होगा। निशुल्क शिक्षा, पक्के रोज़गार, बेहतर चिकित्सा, आवास आदि जैसे मुद्दों को उठाते हुए जनता की एकजुटता कायम करनी होगी। तमाम जनविरोधी नीति-क़ानूनों की असलियत बताकर हर जाति-मज़हब के इंसान को अपने साथ जोड़ना होगा। इसलिए हम गरीब-मेहनतकश आवाम को साथ लें चाहे वो किसी भी जाति-मजहब की हो! सभी धर्मों के मेहनतकश लोगों की एकजुटता आज वक़्त की ज़रूरत है।

(“जन सत्याग्रह पदयात्रा” की ओर से जारी)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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