हिंसा से बचना होगा सीएए विरोधी आंदोलन को..

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पिछले करीब दो महीनों से दिल्ली एवं आसपास नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ चल रहा आंदोलन रविवार को हिंसक हो गया जो उचित नहीं है। उत्तर पश्चिमी दिल्ली के जाफराबाद में शनिवार से प्रारंभ हुआ प्रदर्शन रविवार को भी जारी रहा। पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, एक प्रदर्शनकारी युवक को गोली लगी तथा एक कॉन्सटेबल घायल हो गया। यहां मेट्रो बंद करनी पड़ी। अलीगढ़ के ऊपरकोट, शाहजमाल तथा दिल्ली गेट इलाके में भी प्रदर्शन किए गए। यहां सीएए के विरोधियों और समर्थकों में झड़प हो गई तथा उन्होंने एक-दूसरे पर पथराव किया। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए वार्ताकारों से बातचीत विफल होने के बाद शाहीन बाग में भी उग्रता देखी गई, हालांकि वहां कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। 

शाहीन बाग का आंदोलन अब तक शांतिपूर्ण रहा है। बगैर किसी राजनैतिक दल के हस्तक्षेप और विभिन्न लोगों व संगठनों के द्वारा उकसाये जाने के बाद भी शाहीन बाग की प्रदर्शनकारी महिलाओं ने साहस के साथ अद्भुत संयम का परिचय देते हुए इसे जारी रखा है। इस साल की उत्तर भारत की अतिरिक्त ठंड को भी सहन करते हुए हजारों प्रदर्शनकारी महिलाएं चौबीसों घंटे डटी हुई हैं। यहां सभी धर्मों, संप्रदायों और वर्गों ने एकता का परिचय देते हुए इस कानून के खिलाफ एकजुटता और देशभक्ति का परिचय दिया है। इसके अनुसरण में देश भर में सैकड़ों जगहों पर 24 ङ्ग 7 आंदोलन चल रहे हैं। महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की तर्ज पर चल रहा शाहीन बाग का प्रदर्शन दुनिया भर के लोगों का ध्यान आकृष्ट कर चुका है।

शासन की निरंकुशता और उसके अहंकारपूर्ण रवैये के खिलाफ विनम्रतापूर्वक चल रहा नागरिकों का यह आंदोलन भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार की आंखों की किरकिरी बन गया है। केन्द्र ने इस विषय पर आंदोलनकारियों के साथ संवादहीनता का रुख अपनाया हुआ है। कुछ लोग यातायात अवरूद्ध होने का आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट चले गए। इसकी सुनवाई करते हुए शीर्ष कोर्ट द्वारा वार्ताकार नियुक्त किये गये।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी भूमिका सीमित है और वह केवल यातायात जाम होने के परिप्रेक्ष्य में ही इस मामले को सुन रहा है। इस कानून को हटाने या रखने के बाबत कोई विचार उसकी परिधि में फिलहाल नहीं आता। इस बीच केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह तो कह दिया कि उनसे इस विषय पर चर्चा करने कोई भी आ सकता है पर  जब उनसे मिलने शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों का एक जत्था जाने लगा तो उसे रोक दिया गया। 

इस समय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत की यात्रा पर हैं। इस बहाने से भी सत्ता दल से जुड़े लोग शाहीन बाग को खाली कराने व सभी जगह आंदोलनों को खत्म करने के उपाय ढूंढ़ रहे हैं।  मौन समर्थन के साथ दिल्ली पर हुकूमत करने वाली आम आदमी पार्टी ने इस आंदोलन से दूरी बना रखी है। दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के अधीन आती है इसलिए आप सरकार की इसमें कोई बड़ी प्रशासकीय भूमिका नहीं रह जाती। देश भर में विभिन्न स्थानों पर विरोध का जवाब देने के लिए सीएए के समर्थन में रैलियां निकल रही हैं और इसे तोड़ने के लिए कभी आंदोलन या प्रदर्शनकारियों का उपहास उड़ाया जाता है, उन्हें बदनाम करने या इसमें शामिल महिलाओं के चरित्र पर हमला किया जाता है। कभी उन्हें पैसे लेकर या बिरयानी के लिए धरने में बैठने वाले लोग करार दिया जाता रहा। अकसर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लोगों को उकसाया जाता है।  पिछले लगभग दो महीनों में दिल्ली सहित कई स्थानों में विरोध प्रदर्शनों पर हमले हो चुके हैं लेकिन शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को ऐसे प्रयास डिगा नहीं सके हैं। 

आंदोलनकारियों के दृढ़ निश्चय से कपिल मिश्रा जैसे दिल्ली के नेता बौखलाए हुए हैं जो आप पार्टी छोड़कर भाजपा में गए व उसकी टिकट पर चुनाव तो लड़े लेकिन हार गए। अब वे धमकी दे रहे हैं कि ट्रम्प की यात्रा के कारण वे शांत हैं। इशारा यह है कि ट्रम्प के जाने के बाद वे अपनी वाली पर आ जाएंगे। संकेत साफ है कि तीन दिनों के बाद यहां हिंसा और भड़की या भड़काई जा सकती है। नेतृत्वविहीन होने के बाद भी 2011 में हुए राष्ट्रीय जन लोकपाल आंदोलन के बाद यह देश का सबसे बड़ा और सबसे लंबे समय तक चलने वाला जन आंदोलन बन गया है। वह भी ऐसी सरकार के खिलाफ जो बहुमत लेकर केन्द्र में आई है तथा जिसने निरंकुश प्रवृत्ति के चलते अपने खिलाफ होने वाले लगभग सभी आंदोलनों, उनसे जुड़े लोगों व संस्थानों को बुलडो•ा कर रखा है। शाहीन बाग का आंदोलन बेहद सामान्य और साधनहीन नागरिकों द्वारा किया जा रहा है जिसके पीछे महात्मा गांधी प्रणीत प्रतिरोध का साहस और उनकी प्रदत्त नैतिक शक्ति है। 

कल की हिंसा उन सबके लिए चिंताजनक है, जो इस आंदोलन को अपना प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन दे रहे हैं क्योंकि यह प्रदर्शन देश में संविधान का राज कायम करने की जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर रहा है। देश की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बुनावट को बनाए रखने की मंशा लिए हुए इस आंदोलन की सफलता इसलिए आवश्यक है क्योंकि जिस कानून के खिलाफ यह आंदोलन उठ खड़ा हुआ है वह राज्य और नागरिक शक्ति के बीच का मुकाबला है। इस कानून का उद्देश्य जहां सांम्प्रदायिक ध्रुवीकरण है और वह देश की आत्मा के खिलाफ है, वहीं दिन-रात सड़कों पर बैठे आंदोलनकारियों की जद्दोजहद देश के सामाजिक ताने-बाने को अक्षुण्ण बनाए रखना है।

अगर यह आंदोलन अब तक जारी है, तो इसलिए कि वह महात्मा गांधी के बताए अहिंसा के सूत्र पर चल रहा है। इसमें शामिल लोगों को स्वयं हिंसा से हर हाल में बचना होगा। उनके खिलाफ होने वाली हिंसा का प्रत्युत्तर न देकर अहिंसक बने रहना होगा। विरोधी और सत्तादल से जुड़े लोग व संगठन इसे हिंसक बनाने की पूरी कोशिश करेंगे ताकि यह आंदोलन पहले बदनाम हो, फिर कानून की मदद से इसे कुचला जा सके और अंतत: आंदोलन को ही निपटा दिया जाए। ऐसा होना लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की हार होगी।

(देशबंधु में आज का सम्पादकीय)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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