मिस्टर ट्रम्प : आइए मेहरबां., लीजिए इश्क के इम्तिहां..

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भारत और अमेरिका दो अलग प्रकृति और बनावट के देश हैं। भारत दुनिया की सबसे पुरानी संस्कृति की भूमि है जबकि अमेरिका अभी भी नया देश माना जाता है। भारत के मूल में आध्यात्म है तो अमेरिका का आधार आधुनिकता है। भारत मूलत: कृषि प्रधान देश है तो अमेरिका की धमक वहां की उद्यमीयता और सेवा सेक्टर के कारण हैं (हालांकि उसकी समृद्धि में वहां की उन्नत और मशीनीकृत खेती भी है जिसमें बामुश्किल 4-5 फीसदी लोग ही शामिल है परंतु उसके जीडीपी में भारत के मुकाबले बड़ा योगदान है।) इसके बावजूद कम से कम दो तत्व तो ऐसे हैं जिनके कारण इन दोनों देशों के बीच समानताएं भी हैं। एक, दोनों लोकतांत्रिक देश हैं (अमेरिका में राष्ट्रपति प्रणाली है तो हमारे यहां संसदीय लोकतंत्र) और दूसरे, दोनों में मानवीय विविधता है। भारत में दुनिया भर से अनादिकाल से मानवीय समूह आकर रच-बस गये हैं तो कोलम्बस के देश में भी विश्व की अनेक मानव प्रजातियों और रक्त समूहों ने हाल की सदियों में खुद को समाविष्ट किया है। 

पिछले कुछ वर्षों के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को देखें तो कुछ और मुद्दे उभरकर आते हैं जिन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सोमवार से प्रारंभ हो रही बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित भारत यात्रा को देखने के लिए विचार में रखना चाहिए। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख प्रवर्तक देश होने के नाते भारत का लगभग 5 दशक इस मायने में गौरवशाली रहा है कि दो ध्रुवों में बंटी दुनिया और अमेरिका-सोवियत संघ के बीच महायुद्धों से भी भयानक कहे जाने वाले शीतयुद्ध के बीच अपने विकास का रास्ता उसने बनाया रखा था।

सोवियत संघ की ओर रूझान होने के बावजूद उसे किसी खेमे का सदस्य नहीं माना गया और उसने अमेरिका और कम्युनिस्ट मुल्क से बराबरी की आवश्यकतानुसार नजदीकी या दूरी बनाये रखी। इस नीति के निर्माता मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर और यूगोस्लाविया के जोसिप बरोज टीटो के साथ भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू रहे लेकिन बाद की सरकारों ने भी यह राह नहीं छोड़ी थी, चाहे वे कांग्रेसी हों या गैर कांग्रेसी।

90 के दशक में सोवियत संघ के बिखरने के बाद दुनिया एक ध्रुवीय हो चली। अमेरिका के मुकाबले संतुलन कायम करने वाली शक्ति के अभाव में सारे देशों के सामने अमेरिका की शरण में जाने के अलावा कोई रास्ता न बचा। यूरोपीय व अन्य विकसित देशों के समक्ष तो कोई बड़ी समस्या नहीं रही लेकिन दक्षिणी गोलार्द्ध में फैले एशियाई, अफ्रीकी और लातिन अमेरिकी लगभग सवा सौ देश, जिन्हें तीसरी दुनिया कहा जाता है, एक तरह से नेतृत्वविहीन हो गए। गुटनिरपेक्ष आंदोलन खत्म तो नहीं हुआ लेकिन उसके पास पर्याप्त आर्थिक, बौद्धिक और सामरिक शक्तियां न होने के कारण उससे जुड़े देश इससे अपनी सदस्यता बनाए रखने के बावजूद अमेरिका पर कमोबेश आश्रित हो गए। 

भारत में 1991 में आई नई आर्थिक नीति के बाद एक तरह से भारत को भी अपनी आर्थिक संप्रभुता बनाए रखना कठिन हो गया। गैट व विश्व व्यापार संगठन पर आधारित अमेरिका प्रणीत नई जगतव्यापी आर्थिक प्रणाली (जो अंतत: अमीर देशों के ही फायदे में साबित हुई है) के अंतर्गत विदेशी पूंजी और तकनीकों का भारत में प्रवेश बढ़ता चला गया। इस नवाचार ने हमारी कृषि, उद्योग, व्यवसाय आदि को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया। वैश्वीकरण की अवधारणा हमारे यहां सांस्कृतिक दृष्टिकोण से तो थी परंतु आर्थिक प्रणाली के परिप्रेक्ष्य में भारत इससे अनजान रहा था। फिर भी, 1997 से 2003 तक चली अटल बिहारी वाजपेयी की लगभग 6 साल की सरकार हो या डॉ. मनमोहन सिंह की दस वर्षीय कांग्रेस सरकार, दोनों ने समझ लिया था कि अब यह एक ग्लोबल फिनॉमिना है, जिसके साथ चलना अपरिहार्य है। दोनों ने उस व्यवस्था का फायदा उठाते हुए देश की तरक्की को गिरने नहीं दिया और पीवी नरसिंह राव की निगरानी में आयातित पाश्चात्य अर्थव्यवस्था को भारत में समाहित करने की ही कोशिशें कीं। चूंकि वह दुनिया भर में व्यापार-व्यवसाय बढ़ने का काल था, हम भी बढ़ते चले गये। 

इधर पिछले करीब 6 वर्षों में नरेन्द्र मोदी सरकार की कार्यप्रणाली ने न तो भारत की उस नवपरिभाषित व पुनर्गठित अर्थव्यवस्था को बचाए रखा है और न ही वैश्विक नवाचार का कोई फायदा वह ले सकी। नई पूंजी आधारित उदारवादी अर्थव्यवस्था में वैसे ही देशों के साथ नागरिकों के बीच आर्थिक व सामाजिक गैरबराबरी बढ़ाए जाने के उपकरण अंतर्निहीत हैं, उसमें बड़ी वृद्धि इस दौरान हुई है। महाशक्ति बनने के खोखले सपनों के बीच देश में सांप्रदायिक धु्रवीकरण और पूंजीवाद को बेतरह बढ़ावा देने के चक्कर में हमारी सारी लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्तियां कुछ ही हाथों में सिमट गईं। यहां भारत और अमेरिका की मैत्री के नये आयाम खुलते हैं। निजी महत्वाकांक्षाओं, दिखावे और अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली की पहचान बन चुके मोदी अगर अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा और धुर विरोधी रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रम्प दोनों के ही एक जैसे परम मित्र बनते हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

आने के ऐन पहले ट्रम्प जहां ट्रेड वॉर के नाम पर भारत द्वारा अमेरिका के साथ अच्छा व्यवहार न करने की तोहमत लगा चुके हैं और भारत में धार्मिक आजादी, कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानूनों जैसे आंतरिक मामलों को मोदी के साथ बातचीत में उठाने का इरादा रखते हैं, वहीं मोदी सरकार और पूरा देश भीषण गरीबी, बेरोजगारी, चौपट अर्थव्यवस्था के बीच गरीबों को छुपाने के लिए दीवारें खड़ी कर रही है, ट्रम्प परिवार को सोने के बर्तनों में खाना खिलाने, चांदी के कप में चाय पिलाने और स्वागत में 1 करोड़ लोगों को रास्ते पर खड़ा करने का गौरव प्राप्त करना चाहती है।

राष्ट्रप्रमुखों को अपने हाथों चाय बनाकर पिलाने, झूला झुलाने, आरती दिखाने जैसे कृत्यों को विदेश नीति में समाहित करने वाले 21वीं सदी के नये स्टेट्समेन मोदी का इसलिए मेजबान बनकर ट्रम्प को खुशी होगी क्योंकि वे अमेरिकी हितों के रास्ते में कोई अवरोध नहीं हैं।

अमेरिकी पूंजी और हथियार के लिए लालायित मोदी भी इसलिए ताम-झामपूर्ण मेहमाननवाजी के लिए आतुर हैं क्योंकि पूंजी और शक्ति संचयन में अमेरिका उनका मददगार ही साबित होगा। वैसे भी हर घटनाक्रम को इवेंट बना देने में माहिर मोदी को विश्व नेता बनना है तो दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्राध्यक्ष के साथ हाथ तो मिलाना ही पड़ेगा फिर आप उनके आतिथ्य के तरीके को भौंडा कहें या विद्रूप! यह भारत की विदेशनीति में अमेरिका के प्रति प्रेम का परीक्षाकाल है, देश का भी।
… तो आइए, ट्रम्प मेहरबां, बैठिए जाने-जां, शौक से लीजिए जी, इश्क के इम्तिहां!

(देशबंधु में आज का संपादकीय)

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