एक नए अराजक औजार ने किस तरह बदलकर रख दिया पुराने अहंकारी मीडिया को..

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-सुनील कुमार।।

सोशल मीडिया को लोग देश और दुनिया के अमन-चैन को खत्म करने वाला मान लेते हैं, और बहुत से लोगों को यह गलतफहमी भी रहती है कि वॉट्सऐप मैसेंजर भी एक सोशल मीडिया है। मैसेंजर तो एक के संदेश को दूसरे तक पहुंचाता है, और वॉट्सऐप जैसे ग्रुप में भी बस उसी ग्रुप के सदस्य एक-दूसरे से बात कर सकते हैं। लेकिन फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया जो कि तकरीबन सभी के लिए खुले रहते हैं, वहां अधिकतर लोग अधिकतर लोगों का लिखा देख सकते हैं, उस पर बात आगे बढ़ा सकते हैं, वह सचमुच ही सोशल मीडिया है जो कि दस-बीस बरस पहले तक प्रचलन में नहीं था। अब इसकी मेहरबानी से आम लोगों को भी खास लोगों की लिखी हुई बातों पर प्रतिक्रिया जाहिर करने का मौका मिलता है, और अगर खास लोग कुछ चुनिंदा आम लोगों को ब्लॉक भी कर देते हैं, तो भी बाकी लोग उनकी लिखी बातों को देख ही लेते हैं, और उस पर अपनी राय रख भी देते हैं। सोशल मीडिया एक अजीब किस्म का लोकतांत्रिक औजार है जो कि अराजकता की हद तक छूट देता है, और भारत जैसे देश में जहां केन्द्र या राज्य सरकारों का आईटी एक्ट का इस्तेमाल अपनी पसंद-नापसंद पर टिका होता है, वहां पर तो यह लोकतांत्रिक हथियार एक जुर्म की हद तक आगे बढ़ जाता है, खुलेआम बलात्कार की धमकियां भी देखने मिलती हैं, और उन पर सरकारी चुप्पी भी दर्ज होते चलती है। अब तो कई बरस से ये सवाल भी उठ रहे हैं कि बलात्कार की धमकियां देने वाले लोगों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्यों फॉलो करते हैं?

लेकिन सोशल मीडिया से एक और बहुत बड़ा काम हो रहा है जो कि असल लोकतंत्र का एक विस्तार है। आज मीडिया में गंभीर विचार लिखने वाले, ताजा समाचार का संपादन करने वाले वरिष्ठ लोगों में से शायद ही कोई ऐसे हों जो कि सोशल मीडिया न देखते हों उस पर मुद्दे न देखते हों, उस पर लोगों का रूख न देखते हों। सोशल मीडिया के पहले तक मीडिया के दिग्गजों का रूख एकतरफा होता था, और वे अपनी सोच से लिखते और छापते जाते थे, बाद में टीवी पर बोलते और दिखाते जाते थे। लेकिन अब वे दिन लद गए, अब छोटी-छोटी बातों के लिए लोगों को सोशल मीडिया पर जानकारी भी देखनी होती है, और लोगों का रूख भी देखना होता है। अब जैसे आज ही की बात लें, तो ट्रंप के गुजरात प्रवास को लेकर बहुत से लोगों ने तंज कसा है कि वहां भाजपा सरकार पचास बरस के अपने कामकाज को दीवार उठाकर उसके पीछे छुपा रही है, और ट्रंप की बेटी दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार की बनाई स्कूलों को देखने खुद होकर जा रही है। हो सकता है कि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता, या पूर्वाग्रह के चलते मीडिया के बहुत से दिग्गज इस तरह की तुलना से बचे रहते, लेकिन अब जब ऐसी बातें खुलकर लिखी जा रही हैं, आम लोगों द्वारा लिखी जा रही हैं, खास लोगों की नजरों के सामने भी आ रही है, तब उन्हें एक हद से अधिक अनदेखा करना हद से अधिक की बेशर्मी होगी, और मीडिया के कम से कम कुछ लोग तो आम लोगों की बातों को अपने पन्नों और अपने बुलेटिनों की खास जगह पर कुछ तो जगह देंगे ही।

हम पहले भी इसी जगह लिख चुके हैं कि एक वक्त टीवी की खबरों ने अखबारों को प्रभावित करना शुरू किया था, और अखबारों ने इस नए माध्यम के साथ जीना सीखने के लिए अपने में कुछ तब्दीली की थी क्योंकि बहुत सी सुर्खियां टीवी पर घंटों पहले आ चुकी रहती थीं। अब उसके बाद सोशल मीडिया ने टीवी और अखबारों को, दोनों को ही बहुत बुरी तरह बदलकर रख दिया, और अब किसी अखबार, किसी टीवी चैनल के लिए यह मुमकिन नहीं है कि ट्विटर और फेसबुक पर नजर रखने के लिए कुछ लोगों को तैनात किए बिना अपनी दुकान चला लें। आज सोशल मीडिया अपनी असीमित ताकत, और अपने लोकतांत्रिक या अराजक मिजाज से मुख्यधारा के कहे जाने वाले मीडिया को बहुत बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। यह बात अगर जुर्म की धमकियों वाली नहीं है, तो यह लोकतंत्र के हित में है, उसकी अधिक वकालत करने वाली है। सोशल मीडिया ने मुख्यधारा के मीडिया के पूर्वाग्रह का भांडाफोड़ करने का काम भी किया है, जिसके चलते बड़े-बड़े पत्रकारों को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है, और लोग कुछ या कई बरस पहले अपनी कही या लिखी बातों को छुपा भी नहीं पा रहे हैं, लोग उनके कामों की कब्र खोदकर हड्डियां निकालकर नुमाइश कर रहे हैं कि इस मुद्दे पर इस पत्रकार ने दूसरी पार्टी की सरकार के रहते क्या-क्या नहीं कहा था। सोशल मीडिया का जिस तरह का संक्रामक असर मूलधारा की मीडिया पर हो रहा है, वह एक बहुत ही दिलचस्प दौर है, और मीडिया-सोशल मीडिया का इस दौर का इतिहास अध्ययनकर्ताओं और शोधकर्ताओं के लिए बड़ी दिलचस्प चुनौती पेश कर रहा है।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 22 फरवरी 2020 )

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