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-प्रमोद पाहवा।।

पाकिस्तान जिंदाबाद की आवाज़ सुनाई देती हैं और ओवैसी साहब नमाज़ के लिए जाते जाते दौड़ कर वापिस आ जाते है बच्ची के हाथ से माइक छीनने।

चित्र को गौर से देखें तो सबके चेहरे पर एक अनजाना सा खौफ दिखाई दे रहा है।

वैसे तो हम आर्यन सभ्यता के हमले के बाद से ही गुलाम बना लिए गए थे लेकिन साक्ष्य आधारित इतिहास के अनुसार हमारी गुलामी की वास्तविक स्थिति अंग्रेज़ो के काल से ही कहीं जा सकती है ( मुगल काल को गुलामी कहना गलत होगा )

उसमे भी 1857 और बंगाल का अकाल सबसे बुरा दौर था जिसमें हजारों उलेमाओं को फांसी पर लटका दिया गया और श्यामाप्रशाद मुखर्जी ने भूखी बंगाली जनता का भोजन छीनकर अपने अंग्रेज़ मालिकों को दे दिया।

सत्ता के इन भूखे भेड़ियों ने हमारे दिलो दिमाग में हमारे गुलाम होने का अहसास पक्का किए रखा जिसे गांधीजी ने बाहर करने की कोशिश की और हम विजयी हुए।

आज फिर हमे कायर होने का अहसास हो रहा है क्योंकि सिर्फ पाकिस्तान जिंदाबाद सुनते ही हमारे काटो तो खून नहीं रहता।

एक छोटा सा मुल्क जो कल तक हमारा हिस्सा था और गत 72 सालो में ज्यादातर समय भारतीयों द्वारा शासित रहा उसे काल्पनिक शत्रु बनाकर हमे कायर बनाया जा रहा है।

कभी इस्लाम खतरे में आता है तो कभी हिन्दुत्व खतरे में आता है क्योंकि इन्हीं दोनों समुदायों की सोचने की ताकत समाप्त कर दी गई है।

क्या कभी सुना है कि यहूदी खतरे में है या बाइबिल फाड़ दी गई और ईसाइयत खतरे में आ गई ?

क्या कभी किसी सिख को कहते सुना है कि सिखिजम खतरे में है ?

पाकिस्तान मुर्दाबाद कहलवाना ही कायरता की सबसे बड़ी निशानी है। प्रत्येक प्रार्थना में गुरुद्वारा साहिब या कभी भी, निर्बाध पाकिस्तान जाने की प्रार्थना की जाती है और जिस पवन भूमि को हमारे गुरुओं के चरण रज से पवित्र किया हो उसके बरबाद होने की कामना कैसे की जा सकती हैं।

जिस देश की हवा पानी में हमारे बुजुर्गो की पवित्र रूहे परवाज़ करती हो वो तो जिंदाबाद रहेगा ही और रहना भी चाहिए।

गोबर पट्टी के धर्मांध मूर्खो के मन में नफ़रत पैदा करने की साज़िश का पर्दाफाश करने की भी जरूरत है नहीं तो यह नफरत एक देश से एक समाज और समाज से समुदाय तथा फिर जाति तक आते आते देर नहीं लगेगी।

दो चार दिन बाद जब भक्त फूफा श्रीमान बत्तख ट्रंप भारत की जमीन पर गोबरश्रेष्ठ के सामने पाकिस्तान जिंदाबाद करेगा तो देखते हैं कि उसका क्या उखाड़ लेंगे?

आज यूएस अधिकारियों ने कश्मीर पर ट्रंप की बातचीत की घोषणा कर दी है कोई पूछे कि मोदी जी क्या अब कश्मीर हमारा आंतरिक मामला नहीं रहा।

और कितना जलील होंगे हम और इनके बहकावे में आकर बर्बाद होते रहेंगे ?

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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