यूपी सरकार काशी जल संचय मॉडल को प्रदेश में लागू करेगी..

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-आशीष सागर दीक्षित||
सरकार की मंशा है कि इसके अंतर्गत सरकारी हैंडपंप के पास ड्रम बेस्ड मॉडल पर सोकपिट बनाएं जाएंगे। मनरेगा योजना से व्यक्तिगत लाभार्थियों को तालाबों के निर्माण, नदियों की सफाई-पुनरुद्धार के साथ कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन, घरों की छत पर जल एकत्रीकरण को भूजल बढ़ाने जैसे कार्य किये जायेंगे।

गौरतलब है वाराणसी के तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह अब विशेष सचिव सीएम योगी का दावा है उन्होंने आराजीलाइन व हरहुआ ब्लाक में वरूणा नदी की जद में 16 ग्रामपंचायत और नद नदी की 14 ग्रामपंचायत में नदी के पुनरुद्धार का काम किया है। इससे करीब 12.5 किलोमीटर वरूणा नदी और 18.5 किलोमीटर नद नदी निर्मल-सुंदर होकर प्राकृतिक स्वरूप में लौट आई है। उन्होनें अपने कार्यकाल में ‘ संचय जल बेहतर कल’ अभियान चलाया था। इस अभियान के तहत लोगों को जनांदोलन से जोड़ा गया। वे कहते है सरकारी फ़ाइलों में शासकीय भवनों पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग के आदेश बहुत पुराने है लेकिन उनका अमल नाममात्र ही नजर आता है। वहीं वाराणसी में अभियान के परिणाम स्वरूप शहरी क्षेत्र के 130 सरकारी भवनों, ज़िले के 1338 प्राथमिक स्कूलों, आठ ब्लाक, तीन तहसील, 30 पुलिस स्टेशन पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संग्रहण) की व्यवस्था की गई है। हैंडपंप,बोरवेल,ट्यूबवेल, घरों के पास ‘ ड्रम बेस्ड मॉडल ‘ पर सोकपिट का निर्माण कराया गया है। यह प्रयोग जल संचय का बड़ा माध्यम बना है। वाराणसी के तत्कालीन डीएम व अब विशेष सचिव सीएम योगी सुरेंद्र सिंह की माने तो जल स्तर ऊपर लाने के लिए सरकारी स्कूलों में आरओ बेस्ड वाटर ट्रीटमेंट यूनिट की स्थापना की गई है। इस पानी का दुबारा उपयोग शुरू हुआ है। पौधरोपण व उसका संरक्षण भी मॉडल का हिस्सा है। उधर बीते 2 फरवरी को फेसबुक में वाराणसी की वरूणा नदी की पोस्ट में दी फ़ोटो शेयर करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री अमरीश कुमार ने इसकी नदी की दुर्दशा पर चिंता व्यक्त की थी। वरिष्ठ पत्रकार और काशी के जानकार बतलाते है कि काशी के मध्य बहने वाली वरूणा नदी के बीचोंबीच बसा शहर ही मूल काशी है गंगा तो वाराणसी के बाहरी हिस्से से बहती थी जो अब आध्यात्मिक शहरीकरण के चलते काशी की पहचान बन गई है। कमोवेश गंगा आज दुनिया की प्लास्टिक कचरा ढोने वाली सबसे बड़ी नदी है।अध्ययन के मुताबिक प्लास्टिक ( पॉलीथिन अपशिष्ट) कचरे को खत्म होने में करीब 500 वर्ष लगते है। वरूणा आज पूरी तरह गटर बन चुकी है। दिल्ली और मथुरा की यमुना सरीखे इसमें बहता हुआ झाग नदी की अविरलता,निर्मलता,सुंदरता,नैसर्गिक स्वरूप की बदहाली को बयाँ करता है। उल्लेखनीय है बुंदेलखंड के बाँदा में भी लगभग दो वर्ष से जल संरक्षण के अभियान चलाए गए। यहां भी डीएम बाँदा ने स्थानीय संस्था एबीएसएस की अनुदानित फंडिंग एजेंसी वाटर एड के सहयोग से लगातार ‘ कुआँ तालाब जियाओ अभियान संचालित किया है। अभियान में गांव-गांव तालाबों के जल संरक्षण, कुआँ को रिवाइवल करने हेतु गांव चौपाल, दीपदान, कुआँ पूजन, हैंडपंप के किनारे खंती खोदना, खेत तालाब योजना को बढ़ावा देना, जल आरती, बाँदा के महुआ ब्लाक में जलग्राम जखनी को देश का समुदाय आधारित मॉडल बतलाने जैसे दावे किए गए है।

बीते गर्मी से फरवरी माह तक गाहे-बगाहे जब भी जलशक्ति मंत्रालय के सचिव,विजिट टीम ने बाँदा में दस्तक दी तो अभियान में तैयार किये गए जलग्राम को ही आदर्श कार्ययोजना स्वरूप में प्रस्तुत किया गया। अलबत्ता वे कुएं,तालाब ( शहर के 6 बड़े तालाब जलमार्च वाले ),खेत तालाब,मनरेगा से बने सैकड़ों तालाब आदर्श मॉडल का हिस्सा नहीं बन सके क्योंकि उनमें पानी नहीं था और न है। सरकारी ट्यूबवेल से भरने वाले तालाबों की मदद से अस्तित्व में आये जलग्राम को भी बिना सरकारी मदद लेकर स्टैंड होना बतलाया जाना ठीक वैसा है जब गांव का प्रधान ग्रामपंचायत के बजट से मेड़बन्दी करवाये दावा किया जाए कि ये सरकारी मदद नहीं है। गांव के कुछ समृद्ध किसानों ने अभिप्रेरित होकर स्वतः मेड़बंदी करवाई तो गांव आधारित जल संचय का कार्य बाँदा डीएम के कथित जल संरक्षण अभियान का आइकन बनकर उभरा। अभियान की सफलता की परिणीति में केंद्र-राज्य सरकार,जलशक्ति मंत्रालय के समक्ष और आला अधिकारियों के बीच डीएम बाँदा की कार्यक्षमता सूखे बाँदा को पानीदार बनाने के लिए सोशल मीडिया, कुछ तयशुदा प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक चैनल में ग़दर काटने लगी है। हाल ये हुआ कि डीएम को खुश करने के लिए निजी तौर पर बाँदा के एक युवा ने प्रोडक्शन हाउस के बैनर से चाटुकारिता की पराकाष्ठा तक गानों की रिकार्डिंग कर डाली। जाहिर है इन अभियान के जरिये जिन वेब पोर्टल,अखबार,सरकारी -गैर सरकारी लोगो को प्रत्यक्ष, परोक्ष लाभ व सम्मान मिले उन्होंने बाँदा डीएम के महिमामंडन में कोई कोर-कसर बांकी नहीं रखी और न आज भी कमी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि वाराणसी के तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह का ‘ संचय जल बेहतर कल ‘ अभियान यूपी का मॉडल बन रहा है तो खबरिया कैनवास में बाँदा डीएम को दुनिया मे जल संरक्षण का पुरोधा बतलाने वाले प्रतिस्पर्धा जीतने के लिए अब कौन सी रणनीति अपनाएंगे ? सवाल यह भी की वाराणसी के इस मॉडल को यूपी समेत बाँदा में भी मुख्यमंत्री लागू करते है तो बाँदा मॉडल,जलग्राम जखनी मॉडल का भविष्य स्थाई जल संरक्षण के कालखंड में कितनी मजबूती से खड़ा हो सकेगा ? जाहिर है वाराणसी की वरूणा सी स्थिति बाँदा में बहने वाली केन की भी है जिसमें शहर के सीवर ढोने वाले दो नाले करिया नाला,निम्नी नाला डाला गया है तो वहीं ग्रामीण नाला भूरागढ़ भी प्रवाहित होकर नदी युमना की सहायक नदी केन को दूषित करते है। केन में चौतरफा हर दस किलोमीटर में बालू खदानों के रसूखदार रोजगार ने जहां हैवी मशीनों के उत्खनन का डंका बजाया वहीं कम बहाव वाली नदी के प्रवाह,जलधारा को कटघरे में खड़ा करने का काम किया है। बड़ी बात है दुनिया मे कथित रूप से जल संरक्षण मॉडल वाले जनपद में यह कार्य खनिज नियमावली,एनजीटी, सुप्रीम कोर्ट के दिये दिशा निर्देश की बखिया उधेड़ कर किया जाता है। केन को ओवरलोडिंग वाहन का ट्रांसपोर्ट हब बनाकर जहां जल आरती के कर्मकांड किये जा रहे है वहीं खेत तालाब बनवाने वाले कृषि विभाग के अधिकारी और जेई ठेकेदार के माध्यम से जेसीबी के जरिये तालाब निर्माण करवाकर किसान,जेई,अधिकारी, ठेकेदार की आय का स्रोत बन चुके है। विभाग में कार्य करने वाले एक ठेकेदार ने नाम न लिखने की शर्त पर बताया कि किसान के खेत मे तालाब बनवाने में हमारा जेसीबी मशीन वाले से शेयर तय होता है। एक लाख बीस हजार का तालाब बमुश्किल 25 हजार में ख़ुद जाता है। शेष रकम किसान के खाते में जाती है लेकिन इस शर्त पर कि शेष बचा रुपया सभी में पद के हिसाब से बंटेगा। यूपी में मायावती सरकार में आई खेत तालाब योजना भी असल मे मनरेगा से बने आदर्श तालाब,साधारण तालाब को अनुउपयोगी बोझ लादने वाले साबित हुए है। मनरेगा योजना आने से लेकर अब तक हजारों तालाब बाँदा और बुंदेलखंड में बने लेकिन अतिक्रमण की गिरफ्त में प्राचीन तालाबों के बनिस्बत यह तालाब भी खेत तालाब की तर्ज पर जेसीबी से खुदे गड्ढों की शक्ल में जल संरक्षण का प्रायोजित मॉडल बनकर रह गए है। तालाब का मतलब थाल-तसले की आकृति न कि मशीनों से खुदे बड़े पाट वाले गहरे गड्ढे निर्माण कर देना है।…..जल संचयन की पुरातन विधि खेत मे मेड़, मेड़ पर पेड़,मानव श्रम से निर्मित रोजगार परक तालाब मसलन चंदेल कालीन तालाब संरचना पद्धति का बुंदेलखंड में प्रामाणिक होना और कुआँ में पुराने जल संचय के सोकपिट जो किसानों ने कभी बनाये थे उनका खत्म होना आधुनिक जल संरक्षण तकनीकी को थोथा साबित करता है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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