लोग सुबूत रिकॉर्ड करके कोर्ट जाएं, और कोई इलाज नहीं है..

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-सुनील कुमार।।

आमतौर पर किसी देश-प्रदेश की राजधानी में कानून जिस हद तक लागू होते हैं, वे उस देश-प्रदेश की बेहतर हालत बताते हैं। राजधानियों के बाहर कानूनों की और बदहाली होती है, और हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज अपने दिए हुए बड़े-बड़े फैसलों को लेकर अगर बिना पुलिस हिफाजत अकेले निकल जाएं, तो उन फैसलों के लिए उनकी इतनी खिल्ली उड़ाई जाएगी कि वे आईने में अपना मुंह नहीं देख पाएंगे। और हिन्दुस्तान का आज का हाल जैसा दिख रहा है, उसमें तो कोई हैरानी नहीं होगी कि अलोकप्रिय फैसले देने वाले जजों के किसी भीड़ में अकेले फंस जाने पर उनकी कम्बल-कुटाई भी हो जाए।

खैर, हिंसा की ऐसी आशंकाओं और ऐसे खतरों के बीच यह देखने की जरूरत है कि अपने आपको अपने ओहदे और अपनी वर्दी से भी बड़ा अफसर मानने वाले लोग जनता के जिंदा रहने के लिए जरूरी कानून लागू करने के वक्त किस तरह दुबककर अपने सुरक्षित कमरों में छुप जाते हैं, और अपने इलाकों में भीड़ का राज करने देते हैं। और यह भीड़ किसी बारात की एक दिन की अराजक भीड़ हो यह भी जरूरी नहीं है, यह भीड़ किसी धार्मिक त्यौहार की हफ्ते-दस दिन की हिंसक भीड़ हो, यह भी जरूरी नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की राजधानी में तो चाहे किसी को शोरगुल का कानून तोडऩा हो, या फिर शादियों के मौकों पर पार्किंग का कानून तोडऩा हो, पुलिस और प्रशासन उनकी हिफाजत करते चलते हैं। अभी नई राजधानी में खुली प्रदेश की सबसे बड़ी या सबसे महंगी होटल की दावतों में बजते लाऊडस्पीकर से देर रात तक नींद हराम होने की शिकायत एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बार-बार की, पुलिस के खूब मशहूर किए गए फोन नंबर पर भी शिकायत की, कोई कार्रवाई नहीं की गई। अब इसमें न तो धार्मिक तनाव का खतरा था, न राजनीतिक तनाव का, लेकिन एक महंगी होटल की गुंडागर्दी को छूने की हिम्मत भी पुलिस और प्रशासन में नहीं थी। और शादियों के हर महूरत पर इन कारोबारियों की ऐसी ही गुंडागर्दी से दसियों लाख रूपए एक रात में कमाने का मुकाबला चलता है, और पुलिस वहां पर इंतजामअली बनकर काम करती है, जहां होटल मालिकों को गिरफ्तार करके जेल भेजना चाहिए, वहां पुलिस पार्किंग ठेकेदार की तरह काम करती है।

शोरगुल को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक के इतने कड़े आदेश हैं कि कोई सामाजिक कार्यकर्ता अगर शोर नापने के उपकरण से नापकर, वीडियो रिकॉर्डिंग करके, और अनसुनी रह गई शिकायतों के सुबूत के साथ अदालत जाए, तो पुलिस और प्रशासन के साथ-साथ राज्य सचिवालय के अफसर भी कटघरे में होंगे। दिक्कत यह है कि सरकार के पास, अफसरों के पास अदालती मामलों में मुफ्त के वकील रहते हैं, सुबूत अपने हिसाब से मोडऩे-तोडऩे की सहूलियत रहती है, और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सत्ता की ताकत के बहाव के खिलाफ जाकर खर्च करना पड़ता है, जूझना पड़ता है। छत्तीसगढ़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं का तजुर्बा बहुत खराब है, और अदालतों से व्यापक जनहित के मुद्दों पर भी कोई राहत नहीं मिलती है।

एक-एक शादी कई-कई दिनों तक अपने इलाके के लोगों का जीना हराम कर देती है। एक-एक धर्मस्थल पूरे इलाके को जहन्नुम और नर्क बनाकर छोड़ता है, लेकिन सरकारी अमला अपने और सत्ता के रिहायशी इलाकों में शोरगुल रोककर चैन से सोता है, बाकी जनता का जीना हराम रहता है, नींद हराम रहती है। शायद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के इलाकों में भी लाऊडस्पीकर बंद करवा दिए जाते हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि पूरे मुल्क में उनका हुक्म मजबूती से लागू है। हकीकत यह है कि जनता की सेहत, उनकी नींद, उनका सुख-चैन, उनका कामकाज, सब कुछ बुरी तरह बर्बाद होता है, और पुलिस को शिकायत करने वालों का तजुर्बा यह है कि कानून तोड़कर शोरगुल करने वाले लोगों को शिकायतकर्ता का नाम-नंबर, पता बता दिया जाता है कि जाकर कहां झगड़ा करना है। फिर भी प्रदेश में एक आखिरी उम्मीद सिर्फ अदालत से बची है, और उसके लायक सुबूत रिकॉर्ड करके लोगों को वहां जाना चाहिए ताकि अफसर अपने घरौंदों के बाहर भी देखने को मजबूर हों।
(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 21 फरवरी 2020)

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