पहले विश्वास करें, फिर इस्तेमाल करें..

-सुनील कुमार।।
दुनिया में जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा, तो एक लतीफा चल निकला कि अमरीकी सरकार ने सीआईए का बजट छोटा काट दिया है कि अब लोग खुद होकर अपने बारे में इतना कुछ लिखने लगे हैं कि अधिक जासूसी की तो जरूरत ही नहीं रह गई। मानो इतना ही काफी नहीं था, तो अब ट्विटर और फेसबुक जैसी जगहों पर कोई भी व्यक्ति तरह-तरह के सर्वे कर रहे हैं कि लोग किस पार्टी को, किस उम्मीदवार को, किस मुद्दे को चाहते हैं और किसके खिलाफ हैं। लोगों को लगता है कि यह एक मासूम सर्वे है, लेकिन कल्पना करें कि किसी पार्टी या संगठन के आईटी सेल के लोग बैठकर ऐसे सर्वे कर रहे हों, और लोगों के सामाजिक-राजनीतिक रूझान, उनकी पसंद और उनकी नफरत का घर बैठे हिसाब लगा रहे हों।

अभी-अभी एक किसी संस्था की तरफ से फेसबुक पर एक सर्वे किया जा रहा है जिसमें लोगों से तरह-तरह के सवाल करके उन्हें बताया जाता है कि उनकी सोच कितने फीसदी कम्युनिस्ट है। जिस दिन सोच के आधार पर समाज में हिंसा की जरूरत पड़ेगी, ऐसे सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोगों का रिकॉर्ड इस संस्था के पास, या जो भी इससे आंकड़े हासिल कर सके, खरीद सके, या हैक कर सके, उसके पास रहेगा कि कौन से इंसान की सोच कितने फीसदी कम्युनिस्ट है। दुनिया का इतिहास बताता है कि अलग-अलग दौर में अलग-अलग देशों में लोगों को उनकी कम्युनिस्ट सोच की वजह से मारा गया है। हिन्दुस्तान में भी आज विचारधाराओं से नफरत करने वाले लोग कम नहीं हैं, किसी विचारधारा से नफरत कम, किसी से अधिक। ऐसे में लोग ऐसे हर एप्लीकेशन, या ऐसी हर वेबसाईट को मासूम मानकर उसके सर्वे में हिस्सा लेने लगते हैं, ट्विटर पर सवालों के जवाब देने लगते हैं, और चतुर या चालबाज लोग उन्हें उनकी सोच के हिसाब से अलग-अलग लिस्टों में दर्ज करते चल रहे हैं। जिस दिन सोच के आधार पर लोगों को मारने का सिलसिला शुरू होगा, उस दिन सौ फीसदी कम्युनिस्ट पहले मारे जाएंगे, फिर नब्बे फीसदी वाले, और फिर आखिर में जाकर कमजोर कम्युनिस्ट-सोच वालों की बारी आएगी। हत्यारों की ताकत बेकार न जाए इसलिए खालिस वामपंथियों की लिस्ट तैयार रहेगी, और प्राथमिकता के आधार पर लोगों को खत्म किया जाएगा।

जिन लोगों को भी यह बात कल्पना की एक उड़ान लग रही है, उन्हें इतिहास को भी पढऩा चाहिए, वर्तमान में अपने आसपास का माहौल देखना चाहिए, और भविष्य के खतरों के प्रति सावधान रहना चाहिए। आज किसी एक वेबसाईट पर आप छाता ढूंढ लीजिए, तो बाद में आप इंटरनेट पर चाहे कोई भी पेज खोलें, उस पर छातों का इश्तहार दिखने लगेगा। इंटरनेट ने लोगों को नंगा करके रख दिया है, और ऐसे में जब लोग अपनी जरूरत की सर्च से परे लोगों के किए जा रहे सर्वे में शामिल हो रहे हैं, तो फिर वे अपने दिल-दिमाग पर से, अपने बदन पर से खुद ही तौलिया हटाकर फेंक दे रहे हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि लोगों की सोच, और उनके रूझान के हिसाब से हो सकता है कि सरकारी और निजी नौकरियां तय होने लगें। कल के दिन देश-प्रदेश की सरकारों के हाथ ऐसा डेटा लगे, और वे अपने काबू की कंपनियों को कहें कि इन लोगों को नौकरी पर नहीं रखना है, तो किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। अपने खुद के उजागर किए बिना भी लोग अपनी डिजिटल जिंदगी में बहुत हद तक उजागर हैं ही, ऐसे में हर किसी को सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि आने वाले कल नहीं, आज ही हर कोई खतरे में भी है। इसलिए लोगों को बिना जरूरत अपनी सोच को ऐसे एप्लीकेशन, सर्वे, या अध्ययन में झोंक नहीं देना चाहिए। डिजिटल खतरों का एक फीसदी एहसास भी लोगों को है नहीं, एक मामूली सा गूगल लोकेशन आपके पिछले कई हफ्तों-महीनों की जानकारी आपके फोन पर पल भर में दिखा देता है कि किस दिन, किस वक्त आप कितनी देर कहां गए, कहां रहे। यह पूरा सिलसिला लोगों की कल्पना से बहुत ही अधिक खतरनाक है, इसलिए बाजारू इश्तहार के इस नारे पर भरोसा नहीं करना चाहिए- पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। होना तो यह चाहिए कि पहले विश्वास करें, फिर इस्तेमाल करें…।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 20 फरवरी 2020)

Facebook Comments
CATEGORIES
Share This

COMMENTS

Wordpress (0)
Disqus ( )