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पुलवामा हमले की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए..

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-संजय कुमार सिंह।।


कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पुलवामा हमले की पहली बरसी पर तीन सवाल पूछे। सवाल राष्ट्रवादी सरकार को परेशान करने वाले हैं इसलिए मामूली चर्चा के बाद मीडिया से गायब हो गए। जवाब नहीं आना था, नहीं आया पर सवाल यह है कि ऐसे कैसे चलेगा राष्ट्रवाद या चला ले जाएंगे? पुलवामा अटैक का सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ था? ‘इस हमले की जांच में क्या सामने आया? और सुरक्षा में हुई चूक के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया गया है?’ ये सवाल साधारण नहीं हैं। इसपर कपिल मिश्रा ने कथित पलटवार कहते हुए घटिया राजनीति करने का आरोप लगाया है पर मैं उस विवाद में नहीं जाना चाहता। राजनीति से यह सवाल खत्म नहीं हो सकता कि 40 से ज्यादा जवानों की मौत के लिए कोई जिम्मेदार है कि नहीं उसकी जांच हुई कि नहीं और नहीं हुई तो क्यों?
हमलोगों ने महसूस किया है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ गया है और बहुप्रचारित सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर बालाकोट और पुलवामा के कारण भी तनाव बढ़ा हो सकता है। इसे कम करने की कोशिश दिखाई नहीं दी है। युद्ध के लिहाज से पाकिस्तान से मजबूत होना प्रधानमंत्री की निजी शक्ति नहीं है पर राजनीतिक कारणों से इसे ऐसे ही पेश किया जाता रहा है। प्रधानमंत्री भी, चुनाव जीतने के लिए ही सही, घुसकर मारने जैसी बात कर चुके हैं। एक तरफ उनका कहना है कि पाकिस्तान भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देता है दूसरी ओर वे और उनकी पार्टी यह भी दावा करती है कि वहां हिन्दू धार्मिक रूप से सताए जाते हैं। आतंकवादियों के सीमा पार कर आने में रोक है और धार्मिक आधार पर आने वालों के प्रति सहानुभूति। अवैध रूप से सीमा पार करने वाले दोनों तरह के लोगों को पहचानने का कोई पक्का तरीका है इसलिए सीमा को पूरी तरह सील नहीं किया जा रहा है। भले ही यह कार्य व्यावहारिक तौर पर मुश्किल हो पर इसका फायदा दोनों तरह के लोग उठाते हैं। फिर भी, एक से सहानुभूति और एक से नाराजगी – बहुत मुश्किल स्थिति है। इसलिए, पाकिस्तान से ना लड़ाई होती है और ना संबंध ठीक होते हैं। यह स्थिति राजनीतिक दलों के अनुकूल है। इसलिए इसे ठीक करने पर जोर नहीं दिया गया। इस सरकार ने अपने भिन्न कदमों से स्थिति और खराब कर दी है पर वह अलग विषय है।
अभी मुद्दा यह है कि देश को सैनिकों की आवश्यकता है तो उन्हें सुविधाएं पूरी मिलनी चाहिए। पर अक्सर शिकायत आती रहती है कि उन्हें जरूरी सामान और भोजन तक ठीक नहीं मिलता है। एक सैनिक ने खाने की शिकायत की तो उसकी नौकरी ही चली गई। सेना की सख्ती अपनी जगह सही है पर उन्हें शिकायत का मौका नहीं मिले यह सुनिश्चत करना भी सरकार का ही काम है। पुलवामा के समय मारे गए सैनिकों को मुआवजा से लेकर शहीद का दर्जा दिए जाने तक तमाम मामले उठे थे। उनमें कुछ सही थे, कुछ गलत भी। पर सरकार की ओर से स्थिति साफ करने की कोई अच्छी और बड़ी कोशिश नहीं दिखी। और तो और हमले की जांच जैसी बुनियादी जरूरत का क्या हुआ और उसमें क्या मिला यह सार्वजनिक तौर पर नहीं बताया गया है।
ऐसे में स्थिति यह है कि एक तरफ जो देश के लिए जान देने को तैयार हैं उसे देश से यह आश्वासन भी नहीं है कि उसकी जान वाजिब कारणों से ही जाएगी या जिसकी गई है उससे हमने कोई सीख ली है या उसे कम करने की कोशिश की है। राजनीतिक कारणों से युद्ध की स्थिति बनती है तो सेना दुश्मन का मुकाबला करती है और राजनीतिक कारणों से ही जनता सरकार का विरोध करने के लिए सड़क पर उतरती है तो पुलिस उसका सामना करती है। भले ही पुलिस जनता को पीट-पाट कर मुकदमों में फंसा कर जीत जाती है पर जो पुलिस वाले मारे जाते हैं उनके मामले में कार्रवाई संतोषजनक नहीं होती है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में मारे गए पुलिस वालों के शव पर चढ़ाने के लिए फूल माला तक नहीं थी। और उन्हें अंतिम विदाई न्यूनतम सुविधाओं के साथ दी गई।
कहने की जरूरत नहीं है कि वेतन, भत्तों, सुविधाओं के साथ ऐसे काम के लिए भी पर्याप्त धन होने चाहिए। पर हम शव पेटी खरीदने में घोटाले से लेकर बुलेट प्रूफ जैकेट की कमी की खबरें पढ़ते रहते हैं। ऐसे में यह तय करने की जरूरत है कि हमें क्या करना है और यह राजनीतिक कारणों से तय न हो, इस तथ्य के दम पर हो कि हम क्या कर सकते हैं। अगर हम जवानों को सुविधा नहीं दे सकते हैं तो क्या हमें सियाचिन जैसे निर्जन क्षेत्र को बचाने के लिए करोड़ों खर्चने की जरूरत है। तथ्य तो यह है कि नाक की लड़ाई न हो तो विपक्ष यानी पाकिस्तान भी वहां क्यों रहेगा? यहां किसी को रहना ही नहीं है उस जगह का नियंत्रण युद्ध खत्म होने के बाद (इसे समान्य स्थिति बहाल होने पर पढ़ा जाए) सांकेतिक ही होगा। और इस सांकेतिक युद्ध के लिए क्या सियाचिन में तैनात करके हर साल सैकड़ों सैनिकों को मौत के मुंह में ढेलने की जरूरत है ? अभी इसका जवाब कुछ लोग ‘हां’ कह सकते हैं पर कल्पना कीजिए कि देश में नौकरी का संकट नहीं हो तो कोई सियाचिन में नेताओं की बनाई स्थिति से निपटने के लिए जान देने जाएगा?
मुझे लगता है बिल्कुल नहीं। इसलिए सरकार की दिलचस्पी उस विवाद को खत्म करने में है ही नहीं। ना ही सरकार चाहेगी है कि पर्याप्त नौकरियां हों ताकि लोग सेना में न जाएं या सेना की नौकरी में जाने से हिचकें। यही सरकार के लिए आदर्श स्थिति है और इसीलिए बनी हुई है। अभी सरकार ना सेना की नौकरी का आकर्षण बनाए रखने में दिलचस्पी लेती है और ना ही युद्ध की स्थिति खत्म करने में दिलचस्पी रखती है। सबको पता है कि परमाणुशक्ति से संपन्न दो देश युद्ध करेंगे तो क्या होगा और अधिकतम शक्ति का उपयोग नहीं किया जाना है। खुद पर इतना नियंत्रण रखना है। इसलिए युद्ध आर-पार का नहीं होगा। फिर भी युद्ध का हौव्वा बनाए रखना है ताकि चुनाव जीतने में आसानी हो। और यह इतना आसान है कि सैनिकों की सुविधाओं का ख्याल रखने की भी आवश्यकता नहीं है। ना ही बच्चों के पढ़ने-लिखने, इलाज की व्यवस्था करने की जरूरत है। अगर आप ध्यान से देंखे तो पाएंगे कि वोट देने वाली आबादी हिन्दी पट्टी में ज्यादा है, सुविधाएं हिन्दी पट्टी में ही कम हैं और सेना में मरने वाले भी हिन्दी पट्टी के ही हैं। इसमें सबसे दिलचस्प यह है कि काम करने वाली जगह पर नेता भी हिन्दी पट्टी के ही ज्यादा हैं।
सीधा सा कारण है कि आप अपनी सुविधाओं की मांग नहीं करते और नेताओं ने चुनाव जीतने का तरीका ढूंढ़ लिया है। वे झूठ-सच बोलकर चुनाव जीत जाते हैं आप उन्हें जुमला समझ कर भूल जाते हैं और फिर उन्हें दूसरे देशों में सताए जाने वाले हिन्दुओं की याद आती है। वे गांधी जी की उस इच्छा की याद दिलाते हैं जो उन्होंने 72 साल पहले मार दिए जाने से पहले किए थे। अगर उनकी इच्छा पूरी करना इतना ही जरूरी था तो उनकी हत्या क्यों हुई, हत्यारे के समर्थक कहां से आ गए और वही समर्थक अब गांधी जी की उस इच्छा की पूर्ति करने में क्यों लगे हुए हैं? समझिए, सोचिए। मुझे लगता है कि चुनाव जीतने के लिए और वह इसलिए कि चुनाव में किसे वोट दें यह तय करने का आपका तरीका गड़बड़ है। उसे ठीक कीजिए। अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीखिए। कोई मतलब नहीं है कि आप अमानवीय स्थितियों में रहें, जान देने को भी तैयार रहें और अपने हक की सुविधा ना जीते जी प्राप्त करें ना मरने के बाद।
इसके बावजूद युद्ध सीमा पार से आतंकवादी भेजने के लिए हो तो एक बात है। पर सच यह भी है कि दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन में भारत व पाकिस्तान को बेमतलब युद्ध लड़ते 35 साल हो चुके हैं। यह सबसे अधिक ऊंचाई पर ही स्थित नहीं है सबसे खर्चीला युद्ध मैदान भी है। इसके बावजूद यहां दो देश लड़ रहे हैं यह जानते हुए कि इस युद्ध का विजेता कोई नहीं हो सकता। इसका कारण चाहे जो हो, दोषी चाहे जो हो, मानवीय आधार पर इसे खत्म किया जाना चाहिए। भारत ने अपने भू भाग की रक्षा के लिए 13 अप्रैल 1984 को ऑपरेशन मेघदूत शुरू कर पाक सेना को इस हिमखंड से पीछे धकेलने का अभियान शुरु किया था। तबसे हमारे 846 जवानों ने प्राणों की आहुति दी है। बेहद खतरनाक मौसम के बावजूद देश के 10 हजार जवान इस बर्फीली चोटी पर दिन रात डेरा जमाए रहते हैं। सियाचिन ग्लेशियर व अन्य ऊंचाई वाली जगहों पर तापमान शून्य से नीचे 400 तक गिर जाता है और वहां देश के सैनिकों को जान की बाजी लगाकर डटे रहना पड़ता है क्योंकि इस विवाद का राजनीतिक हल नहीं निकल रहा है। और वह एकतरफा अनुच्छेद हटाने, कश्मीर में कर्फ्यू जैसी स्थिति बनाने या इंटरनेट बंद करने से नहीं होगा। बात करनी पड़ेगी।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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