शाहीन बाग : कड़ी परीक्षा के संकेत..

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देशबंधु में आज का संपादकीय

नागरिकता संशोधन कानूनों के खिलाफ पिछले लगभग दो महीनों से दिल्ली के शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन को हटाने संबंधी दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े को वार्ताकार नियुक्त करने का आदेश तो दिया है, लेकिन उससे इसलिए मूलभूत मुद्दे पर कोई फैसला होने की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि शीर्ष कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में उसकी भूमिका सीमित है। इस परिप्रेक्ष्य में लगता है कि शाहीन बाग का आंदोलन प्रशासन के साथ नए टकराव के लिए प्रस्तुत होने जा रहा है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया है कि मध्यस्थता करने वालों को सफलता नहीं मिली तो वह प्रशासन को स्थिति से निपटने के लिए खुली छूट दे देगा। जस्टिस संजय किशन कौल के नेतृत्व वाली पीठ ने अगली सुनवाई 24 फरवरी को तय की है।

हेगड़े ने प्रदर्शनकारियों से वार्तालाप करने के लिए जिन दो लोगों को चुना है उनमें वरिष्ठ अधिवक्ता साधना रामचंद्रन और पूर्व आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह शामिल हैं। साधना रामचंद्रन पिछले करीब 40 वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रही हैं। 2006 से वे मध्यस्थता विशेषज्ञ मानी जाती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट की मध्यस्थता व सुलह केन्द्र की वे वर्षों आयोजन सचिव रह चुकी हैं। हबीबुल्लाह पहले मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं तथा कश्मीर की हजरत बाल दरगाह पर कब्जा करने वाले आतंकवादियों के साथ वार्ता करने वाली टीम के वे अहम सदस्य रहे।

वार्ताकारों से इतनी ही आशा की जानी चाहिए कि उनकी मध्यस्थता से कोई ऐसी राह निकाली जाएगी जिससे यातायात तो व्यवस्थित हो जाए, लेकिन प्रदर्शनकारियों का विरोध का अधिकार भी बना रहे। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को आंशिक तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति उसके सम्मान, सुलह का वातावरण बनाने की इच्छा और प्रदर्शनकारियों के प्रति लोकतांत्रिक नजरिया अपनाए जाने के रूप में भी देखा जाना चाहिए। हालांकि इस निर्णय से सीएए संबंधी बुनियादी मुद्दों पर कोई फैसला नहीं होने जा रहा है और यह याचिका शुद्ध रूप से प्रदर्शन के कारण बाधित हो रहे यातायात से संबंधित समस्या को हल करने के उद्देश्य से ही लगाई गई है। हालांकि उसके पीछे सरकार और इन कानूनों के समर्थन का नजरिया ही काम कर रहा है।  

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा असम में लाए गए राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी-नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स) से ही नागरिकों में इस बात को लेकर रोष था कि स्वतंत्र देश में इस तरह से नागरिकों को संप्रदाय के आधार पर चिन्हित किया जा रहा है। इसके पीछे केन्द्र सरकार का संचालन करने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसके पीछे खड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिन्दूवादी सोच की आशंका के कारण लोग इस कानून से नाराज थे। यह स्पष्ट हो गया था कि केन्द्र सरकार के निशाने पर मुसलमान समुदाय है जिसके सदस्यों को घुसपैठियों के तौर पर परिभाषित कर उनकी नागरिकता समाप्त करने अथवा उन्हें देश से निकाल बाहर करने का कुचक्र रचा गया था।

चूंकि असम में ऐसे नागरिकों की गिनती में मुस्लिमों से कहीं ज्यादा हिन्दुओं की संख्या निकल आई तो वह योजना ठंडे बस्ते में चली गई लेकिन इस बीच केन्द्र सरकार उसी षड़यंत्र को राष्ट्रव्यापी विस्तार देते हुए नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लेकर आई जिसका देश भर में अनेक राज्यों, संगठनों और व्यक्तियों ने तीखा विरोध किया है। नई दिल्ली के शाहीन बाग में स्वत:स्फूर्त प्रदर्शन प्रारंभ हो गया जो खिलाफत का सबसे बड़ा प्रतीक स्थल बन गया है। इसी तर्ज पर पूरे देश में अनेक शहरों में नागरिकों के चौबीसों घंटे चलने वाले या कुछ अवधि के लिए नियमित आंदोलन-धरना-प्रदर्शन होने लगे हैं।

शाहीन बाग की लोकप्रियता का आलम यह है कि देश भर में जिन स्थानों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, उन्हें उस शहर का ‘शाहीन बाग’ कहा जाने लगा है। प्रशासन और लोगों को लगता था कि कुछ दिनों में शाहीन बाग का आंदोलन सिमट जाएगा या खत्म हो जाएगा परंतु उत्तर भारत की कड़कड़ाती ठंड, प्रशासन के दबाव तथा सीएए के समर्थकों द्वारा उनके खिलाफ की जाने वाली कड़ी और कई बार तो अभद्र व अश्लील टिप्पणियां भी उन्हें डिगा नहीं सकीं।

शाहीन बाग के विरोधियों ने इस बिना पर उनका विरोध करना शुरू किया कि इससे नोएडा और दिल्ली को जोड़ने वाली सड़क के जाम होने से यातायात बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है तथा लोगों को कामकाज और दैनंदिन कार्यों के लिए आने-जाने में बहुत समस्या हो रही है। इस आशय की कुछ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गईं। 

कोर्ट ने सोमवार को इस मामले पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट कर दिया कि उसकी चिंता सीमित है। पीठ ने कहा कि अगर अपनी मांगों को लेकर हर व्यक्ति रास्ते पर उतरने लगेगा तो काफी मुश्किल होगी। लोगों के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच समन्वय आवश्यक है। लोगों के विरोध करने के मौलिक अधिकार को मान्यता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोकतंत्र विचार व्यक्त करने का अधिकार देता है लेकिन उसकी रेखाएं व सीमाएं हैं।  सुप्रीम कोर्ट के इस संकेत के परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को अभी और भी कड़ी परीक्षा से गुजरना है।

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