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राकेश मारिया की कहानी में झोल ही झोल..

By   /  February 19, 2020  /  No Comments

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-संजय कुमार सिंह।।


मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर, राकेश मारिया ने अपनी किताब, ‘लेट मी से इट नाउ’ (मुझे अब यह सब कह लेने दीजिए) में दावा किया है कि मुंबई हमले में जिन्दा पकड़े गए आतंकवादी – अजमल कसाब को लश्कर हिन्दू आतंकवादी, बेंगलुरु के समीर चौधरी के तौर पर मारना चाहता था। किताब के अनुसार, आईएसआई और लश्कर आतंकी कसाब को जेल में ही खत्म करना चाहते थे और इसकी जिम्मेदारी दाउद इब्राहिम गैंग को दी थी। लश्कर के मुंबई हमले के बारे में बताते हुए मारिया ने किताब में लिखा है, ‘अगर सबकुछ योजना के अनुसार चलता तो कसाब चौधरी के तौर पर मरता और हमले के पीछे ‘हिंदू आतंकवादियों’ को माना जाता।’ मारिया ने लिखा है, ‘तब अखबारों में हेडिंग होती कि कैसे हिंदू आतंकवादी ने मुंबई पर हमला किया।’ मैं नहीं समझता कि यह खबर सही होती, और अखबार वालों को दी जाती तब भी ऐसा शीर्षक सही होता। पर जो नहीं हुआ वही सही है और अब उस पर अफसोस करने या चर्चा करने का क्या मतलब? अगर पाकिस्तान वाकई ऐसा करना चाहता था और कसाब जिन्दा नहीं पकड़ा जाता तो राकेश मारिया के अनुसार यह साबित हो जाता और मान लिया जाता कि मुंबई हमला हिन्दू आतंकवादी ने किया था तो क्या पाकिस्तान उस समय की कांग्रेस सरकार के पक्ष में काम कर रहा था जिसने 1971 में पाकिस्तान की ऐसी तैसी कर दी थी। मेरा मानना है कि ऐसे मामलों में इस तरह की अटकलों या आरोपों का कोई मतलब नहीं है। पाकिस्तान का उद्देश्य हमला ही था हिन्दू-मुसलिम करना नहीं।
क्या मारिया के कहने का यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि अगर हाथ में कलावा बंधे होने और हिन्दू नाम का आईकार्ड जेब में होने से अजमल कसाब को हिन्दू मान लिया जाता (हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता) तो धार्मिक कारणों से सताए जाने वाले जिन पाकिस्तानी हिन्दुओं को भारतीय नागरिकता देने के लिए नया नागरिकता संशोधन कानून लाया गया है उसमें गड़बड़ हो सकती है और कोई मुसलिम आतंकवादी भी हिन्दू नाम से भारत में नागरिकता ले सकता है। कायदे से धर्म के आधार पर इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए पर जब कानून ही ऐसा है तो मुझे इस बात का पूरा शक है कि सरकार आतंकवादियों को कैसे पहचानेगी। अगर सरकार का मानना है कि हिन्दू आतंकवादी हो ही नहीं सकते तो पाकिस्तान के लिए यह कितना मुश्किल है कि वह किसी हिन्दू या मुस्लिम को हिन्दू बनाकर नागरिकता दिलवाए और फिर उससे अपना काम कराए। वैसे भी आईएसआई के लिए जासूसी करने वाले तो कई हिन्दू पकड़े गए हैं। और संयोग से कल ही इस आशय की खबर सोशल मीडिया पर घूम रही थी। क्या इस खबर को आज इतनी प्रमुखता मिलने का कारण कल की वह खबर है?
इंटरनेट पर हिन्दुस्तान की खबर का शीर्षक है, पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर का दावा- कसाब को समीर चौधरी, मुंबई अटैक को हिंदू आतंकवाद के तौर पर दिखाना चाहता था लश्कर। नवभारत टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, मुंबई हमले पर पूर्व पुलिस कमिश्नर के दावे की पड़ताल करेगी सरकार। कायदे से खबर का शीर्षक यही होना चाहिए था। किताब का अंश तो वही है जो बताया गया है और बाद में सोच-समझ कर लिखा गया है। और यह किताब के नाम से ही स्पष्ट है। मेरा मानना है कि अगर वाकई ऐसा था, जो अब कहा जा रहा है तो उसे उसी समय कहा जाना चाहिए था। बचाव में अब कहा जा सकता है कि तब की सरकार ऐसा नहीं चाहती थी या कहने नहीं दिया गया या हिम्मत नहीं हुई। इस पर मैं यही कहूंगा कि अब की सरकार यही चाहती है इसलिए अभी ऐसा कहा गया है। इसका संबंध वास्तविकता से कम और खुश करने से ज्यादा लगता है। इसके अलावा, यह तथ्यों को देखने का राकेश मारिया का अपना तरीका हो सकता है, पाकिस्तान या लश्कर या आईएसआई यही चाहता था – कहने का क्या आधार है। यही नहीं, इस आशय की खबर पहले भी (2012 में) छप चुकी है।
यह सूचना इस समय सरकार को खुश करने के अलावा और किस काम की है। भारतीय रेल चाहे जितनी लेट चलती हो, रेल मंत्री पीयूष गोयल ने मौका पूरी तेजी से लपक लिया और कांग्रेस पर हिंदू आतंकवाद के नाम पर देश को गुमराह करने का आरोप लगा दिया है। अखबार यह नहीं बताएंगे कि ऐसे आतंकवादी कैसे बचाए जा रहे हैं पर यह खबर तो प्रमुखता से है ही। गोयल ने यह भी कहा कि मारिया को ये बातें तब बोलनी चाहिए थी, जब वे पुलिस कमिश्नर थे। कहने की जरूरत नहीं है कि आज यह खबर इतनी बड़ी नहीं है जितनी बनाई या बनाने की कोशिश की गई है। कायदे से इसपर किताब लिखने की बजाय उसी समय काम करना चाहिए था। नहीं कर पाए तो जांच का आग्रह करना चाहिए था और अखबारों को अगर-मगर किए बगैर खबर छापने की बजाय जांच का इंतजार करना चाहिए था या उनसे ही सवाल करना चाहिए था कि इतने दिनों बाद इस सूचना का क्या मतलब? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि जेब में मिला आईकार्ड उसी का मान लिया जाता है या कलावा बंधे होने से किसी का हिन्दू होना पक्का हो जाता है। यह सवाल अपनी जगह है कि हिन्दू होने से क्या फर्क पड़ना था। तब नहीं पड़ा तो अब क्या चाहते हैं?
हिन्दुस्तान के अनुसार, हमले के बाद सामने आई कसाब की फोटो पर मारिया ने लिखा है कि यह केंद्रीय एजेंसियों की वजह से हुआ था। मुंबई पुलिस ने पूरी कोशिश की थी कि मीडिया के पास कोई भी जानकारी न लीक हो सके। मैंने अभी किताब नहीं पढ़ी है और मुझे नहीं पता कि पूरी किताब मेरे कितने सवालों के जवाब मिल जाएंगे पर एक सवाल जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि पाकिस्तान की योजना तो संसद पर हमले के समय भी नाकाम हुई थी। कश्मीर के डीएसपी देविन्दर सिंह की गिरफ्तारी के बाद लगा कि उस मामले में दोषी करार देकर फांसी चढ़ा दिए गए सख्स के साथ भी धोखा हुआ हो सकता है। क्या पाकिस्तान को यह सब पता नहीं होगा और उसने बचने या उलझाने की चाल नहीं चली होगी। किताब की जानकारी से लग रहा है कि अजमल कसाब जिन्दा पकड़ लिया गया इसीलिए उसका सही नाम मालूम हो पाया। तो क्या यह मान लिया जाए कि वह झूठ नहीं बोल सकता था। उसे पता नहीं था कि उसके पास समीर चौधरी का कार्ड मिला है और उसे अपना यही नाम कहना चाहिए खासकर इसलिए भी कि उसके हाथों पर कलावा बंधा हुआ था और शायद ऐसा करके वह बच भी सकता था। राकेश मारिया की कहानी में झोल ही झोल है। काश उसने तब हिन्दू होना बताया होता तो न जाने आज किस पद पर बैठा होता।

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About the author

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।

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