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मां को कुतिया कहने वाले भगवों से भरा हिंदुस्तान..

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-सुनील कुमार।।


पहले गाय को बचाने के नाम पर मरे जानवरों की खाल निकालने वाले दलितों को निशाना बनाया गया, और गुजरात के उना की वे तस्वीरें भूलती नहीं हैं जिनमें दलितों की नंगी पीठ पर दिनदहाड़े खुली सड़क पर बेल्ट से कोड़े लगाए गए। इसके बाद देश के आदिवासियों के खानपान पर हमला हुआ, दलितों और अल्पसंख्यकों के खानपान पर हमला हुआ, मांसाहारियों पर हमले हुए, और हिंदू धर्म के अलावा बाकी किसी भी धर्म को मानने वाले पर जुबान से और हथियारों से हमले हुए। इस हद तक हुए कि जब आरएसएस ने सिखों को हिंदू करार दिया, तो अकाली दल से लेकर अकालतख्त तक ने इसका विरोध किया। हिंदू धर्म के भीतर एक सनातनी व्यवस्था को न मानने वाले तमाम लोगों को गद्दार कहा गया, जो जय श्रीराम न कहे उसे पाकिस्तान जाने कहा गया, और जो मोदी की जरा भी आलोचना करे उसे देशद्रोही कहकर देशनिकाले के फतवे दिए गए। लेकिन नफरत और हिंसा के मुंह खून लग जाता है, और वे रूकने से मना कर देते हैं। जंगल के जानवरों के बारे में मानवभक्षी हो जाने की बात कही जाती है कि उनके मुंह इंसानों का खून लग जाए तो वे इंसानों को मारने लग जाते हैं, जानवरों का तो पता नहीं, लेकिन धर्म के नाम पर, एक आक्रामक राष्ट्रीयता के नाम पर हिंसा करने वाले लोगों के मिजाज में हिंसा घर कर जाती है, और वे हिंसा करने के लिए नए निशाने ढूंढने लगते हैं। पिछले तीन दिनों में एक ऐसा निशाना सामने आया हैै जिसने पूरे के पूरे हिंदू-समुदाय को जन्म दिया है, हिंदू महिला।

गुजरात में वहां के एक प्रमुख हिंदू समुदाय, स्वामीनारायण सम्प्रदाय के चलाए जाने वाले एक कन्या कॉलेज से खबर आई कि वहां माहवारी की किसी लड़की का एक पैड खुले में पड़े मिला तो पूरे कॉलेज की लड़कियों के कपड़े उतरवाकर जांच की गई कि किस-किस की माहवारी चल रही है। अब उस धार्मिक कॉलेज की बाकी खबरें भी आ रही हैं कि किस तरह वहां लड़कियों को माहवारी के दिनों में तलघर में अलग रखा जाता था। फिर मानो यह भी काफी नहीं था, तो इस कॉलेज ट्रस्ट के एक भगवा स्वामी, स्वामी कृष्णस्वरूप दासजी का यह बयान आया कि अगर कोई महिला माहवारी के दिनों में खाना पकाती है, तो वह अगले जन्म में कुतिया बनती है। जिन लोगों को न मालूम हो वे यह जान लें कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी को महिलाओं से इस हद तक परहेज रहता है कि वे जिस सभा भवन में बैठते हैं, उसके बाहरी दरवाजों के सामने से भी किसी महिला के गुजरने पर रोक रहती है ताकि स्वामी की नजरें किसी महिला पर न पड़ें।

दूसरी तरफ आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने अपनी घिसीपिटी दकियानूसी बातों को फिर दुहराया है कि शिक्षित घरों में तलाक के अधिक मामले होते हैं। वे एक किस्म से शिक्षा को खतरनाक बता रहे हैं, और इसके पहले वे कई बार यह बात कह चुके हैं कि महिला को घर संभालना चाहिए, और परिवार चलाने के लिए कमाई का जिम्मा आदमी पर छोडऩा चाहिए। अलग-अलग समय पर दिए गए उनके इन बयानों को देखें तो यह समझ आता है कि उन्हें पढ़े-लिखे परिवारों में महिला की पढ़ाई-लिखाई ही खतरनाक दिख रही है। महिलाओं के खिलाफ दकियानूसी बातें कहते हुए उनके भाषण आते ही रहते हैं, और पिछले चार दिनों में आई इन दोनों बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि हिंदू समाज के दो अलग-अलग किस्म के स्वघोषित नेता अब अपना निशाना अल्पसंख्यकों के बाद हिंदू महिलाओं की तरफ मोड़ चुके हैं।

यह नौबत एक दिन आनी ही थी क्योंकि हिंसा करने और धार्मिक भेदभाव करने के आदी लोग हमेशा से महिलाओं को एक पसंदीदा-निशाना मानते आए हैं, और अब फिर थोड़े समय तक गाय, गोबर, गोमूत्र, हिंदुत्व, मंदिर के मुद्दे इस्तेमाल कर लेने के बाद अब वे फिर महिलाओं को कुतिया बनाने के अपने पसंदीदा शगल में लग गए हैं। ऐसी बकवास करते हुए लोगों को यह भी नहीं दिख रहा कि वे एक औरत की माहवारी की वजह से, उसके माहवारी के खून के बीच नौ महीने गुजारने के बाद ही पैदा हुए थे। लेकिन हिंदुस्तान जिस तरह बलात्कारी आसाराम के भक्तों से भरपूर है, मां को कुतिया कहने वाले के भक्तों की भी यहां कमी नहीं रहेगी, इनके खिलाफ अदालत तक जाने की जरूरत है।

(दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय, 18 फरवरी 2020)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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