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केजरीवाल के दायित्व, आकांक्षाएं और जनअपेक्षा..

देशबन्धु में आज का संपादकीय..

विधानसभा चुनावों में बम्पर सीटें बटोरकर अरविंद केजरीवाल ने रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने के बाद जो भाषण दिया है वह आने वाले समय में जहां उनकी सरकार की भावी कार्यप्रणाली के संकेत देता है वहीं भविष्य में देश की बदलने वाली राजनैतिक करवटों का पूर्वानुमान भी है।

पिछले कुछ समय में हुए विधानसभा चुनावों में हमारी राजनीति के केंद्र में स्थापित भारतीय जनता पार्टी को कई राज्यों में पराजय मिली है। उसके ख़िलाफ़ सबसे चमकदार जीत आम आदमी पार्टी (आप) की इस मामले में कही जा सकती है क्योंकि दिल्ली में भाजपा का जैसा सफ़ाया हुआ है, वैसा अन्य किसी भी राज्य में नहीं। हालांकि पिछले यानि 2015 के चुनावों में भाजपा को तीन ही सीटें मिली थीं, जो इस बार बढ़कर आठ हो गई हैं। फिर भी, इसे भाजपा की इसलिए शर्मनाक पराजय कहा जा रहा है क्योंकि आप को हराने के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ लगभग पूरे मंत्रिमंडल और करीब 3सौ सांसदों ने पार्टी का प्रचार किया था लेकिन केजरीवाल के नेतृत्व में लड़ रही आप पार्टी उन सब पर भारी पड़ी।

मुख्य मुद्दे पर आने के पहले पिछले कार्यकाल की बात करें तो कहा जा सकता है कि शुरुआत के कुछ साल केजरीवाल और उनकी पार्टी ने कुछ मामलों पर अपना समय और ऊर्जा अनावश्यक रूप से गंवाए । उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी कई तरह की समस्याएं उठ खड़ी हुई थीं। केंद्र के इशारे पर दिल्ली के प्रशासकीय प्रमुख यानि उपराज्यपाल के साथ तनातनी ने भी उनके काम को दूभर बनाया था। कुछ विधायकों की गिरफ़्तारी और अनेक को अयोग्य घोषित कराने के जरिये केजरीवाल सरकार गिराने की भरपूर कोशिशें भी हुई थीं। इन सबके चलते शुरुआत का अच्छा-खासा वक़्त ज़ाया करने के बाद आख़िर पिछले ढाई-तीन सालों में आम आदमी पार्टी और उसकी सरकार ने सही लाइन पकड़ी।

केंद्र से टकराव व मतभेदों को परे रखकर सरकार ने अपने कामकाज पर ध्यान देना शुरू किया। भावनात्मक मुद्दों में उलझने की बजाय पार्टी-सरकार ने नागरिकों के मूलभूत मुद्दों पर खुद को फोकस किया। जनसुविधाओं को बढ़ाने वाले कामों के अंतर्गत सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, सफाई में दिल्ली सरकार ने नए मानदंड स्थापित किये। उसके द्वारा भाजपा की ओर से उठाए व भुनाए जाने वाले भावनात्मक मुद्दों की राजनीति को माकूल जवाब दिया गया जिसके कारण लाख सर पटकने के बाद भी दिल्ली के मतदाताओं ने आप का साथ नहीं छोड़ा।

‘आप’ सरकार के पिछले कार्यकाल के अंतिम चरण में उसे लेकर कुछ भ्रम भी उत्पन्न हुए। ‘आप’ द्वारा दिल्ली के शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन विरोधी कानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन को समर्थन देने के लिए उसके नुमाईंदों के न जाने, दिल्ली के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर में जाकर आशीर्वाद मांगने, किसी की चुनौती पर हनुमान चालीसा पढ़ने, हनुमान की कृपा से चुनाव जीतने का बतलाने या रामलीला मैदान पर तीसरी बार शपथ लेते वक़्त प्रधानमंत्री से आशीर्वाद मांगने जैसे कारणों ने कुछ लोगों को थोड़ा निराश भी किया होगा और शायद यह भी धारणा बनी होगी कि वे अन्य परम्परागत राजनेताओं की तरह लाइन बदल रहे हैं। उनमें सॉफ्ट हिंदुत्व का चेहरा भी कुछ लोग तलाशने लगे थे। इसके बावज़ूद रामलीला के उनके भाषण के अगले हिस्सों को सुनें तो राहत की बात यह दीखती है कि उनका मोदी व भाजपा विरोधी चेहरा और तेवर बरकरार है। मोदी से आशीर्वाद मांगना शायद इस बात का सूचक है कि जनहित के मुद्दों पर वे केंद्र से संघीय प्रणाली का सम्मान करते हुए सहयोग लेंगे। इससे उन्हें अपनी सफल हुई पूर्ववत लाइन पर चलते रहना आसान रहेगा। यानि उन्होंने अपना फ़ोकस बुनियादी मसलों पर बनाए रखने का तय किया है।

केजरीवाल के भाषण के कुछ निहितार्थ और भी हैं। उनका यह कहना कि ‘दिल्ली से नई राजनीति की शुरुआत हुई है और राजनीति का दिल्ली मॉडल देश भर में दिखाई दे रहा है’ महत्वपूर्ण है। इन दो छोटे वाक्यों में जहां एक ओर केजरीवाल का विश्वास झलकता है, वहीं दूसरी तरफ उनके विस्तार की महत्वाकांक्षा का भी हौले से दिया गया परंतु साफ़ संदेश सुनाई देता है। पहले भी वे और उनकी पार्टी के नेता यह दावा करते आए हैं कि वे देश की राजनीति को बदलने आए हैं। दिल्ली की सफलता पार्टी को उसकी विस्तार परियोजना के लिए निश्चित ही हौसला प्रदान करेगी।

विपक्षी एकता से पहले ही केजरीवाल एंड कंपनी ने दूरियां बना ली हैं। अब यह कहना कि ‘देश में आप की राजनीति का मॉडल चलेगा’, उसके अन्य दलों से गठबंधन नहीं करने के संकेत हैं। यानि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अकेली ही बढ़ेगी। दिल्ली फ़तह से आप की देश भर में नए सिरे से ज़मीन तैयार हुई है जो करीब तीन-चार साल पहले बनती दिखी तो थी परंतु वह चुनावी असफलताओं, भीतरी उठापटक, बाहरी टूट-फूट तथा अन्य कारणों से जाती रही। ऐसे समय में जब विपक्ष धारहीन हो चला है, केजरीवाल भाजपा विरोधी राजनीति के लिए जनता की फिर से उम्मीद बनकर उभरे हैं। आज पूरा देश, ख़ासकर युवा व छात्र वर्ग सत्ता से सीधी लड़ाई तो लड़ रहा है लेकिन वहां नेतृत्व का अभाव है जिसकी ज़रूरत आज नहीं, लेकिन कल या परसों जरूर पड़ेगी।

2012 के लोकपाल आंदोलन में अन्ना हजारे के बाद केजरीवाल ही सबसे बड़े नेता बनकर उभरे थे। वे युवा और उच्च शिक्षित हैं। यंगिस्तान की अगुवाई करने के बेहद काबिल। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी को घुटनों पर लाकर उन्होंने खुद को साबित कर दिखाया है। ऐसे वक्त में जब अन्य विरोधी नेतागण व पार्टियां अप्रासंगिक साबित हो रही हैं तब वे देश की नई राजनीति के नेतृत्व का अवसर जनता की इच्छा के अनुसार पाने की कोशिश ज़रूर करना चाहेंगे। नागरिकों के मूल मुद्दों पर कायम रहते हुए भाजपा का विरोध करते रहना और रूढ़िगत राजनीति को स्थानापन्न करते हुए नई राजनीति को स्थापित करना केजरीवाल और उनकी पार्टी के नए दायित्व बन गये हैं। देखना होगा कि इस सफलता का लाभ लेकर और समय की ज़रूरत के लिहाज से ‘आप’ और उसके सिरमौर केजरीवाल अवाम की इस अपेक्षा पर खरे उतरते हैं या नहीं।

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