उत्तर आधुनिक महाभारत के मायने:01 सुप्रीम कोर्ट..

-चंद्र प्रकाश झा ||

” इंडिया दैट इज़ भारत ” गणराज्य की बरस 2020 की राजसत्ता और उसके पीछे के सत्ताधारी वर्ग के सामने संकट चौतरफा है, प्रधानमंत्री मोदी जी का ‘सब चंगा सी ‘का आलाप बेसुरा हैं. उसे गाने की कोशिश शायद बैसाखनंदन (गदहे) भी नहीं कर सकते हैं. सत्य यह है कि संकट एक नहीं अनेक हैं.

वे आपस में इस कदर गुत्थमगुत्था हो गए हैं कि अब सारे संकट कोहराम में बदलने की कगार पर पहुंच गये लगते हैं. इन संकट के अर्थनीतिक, वित्तीय , मौद्रिक , वाणिज्यिक, सामाजिक और राजनीतिक ही नहीं न्यायिक और संवैधानिक रूप भी गहराने लगे हैं. इनकी अनदेखी ब्रिटिश हुक्मरानी से 15 अगस्त 1947 को देश को मिली आजादी के बने रहने के लिए शुभ लक्षण नहीं माने जा सकते हैं.हम जानते हैं कि ‘ हम भारत के लोग ‘ ने 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू कर अपने देश को जो सम्प्रभुतासंपन्न,समाजवादी , धर्मनिरपेक्ष,लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया . उसका समाजवाद,धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और सम्प्रभुता भी खतरे में है। 

मीडिया दरबार के नए साप्ताहिक स्तम्भ” गौरतलब ” में हम इन सभी संकट का एक-एक कर चीर-फाड़ करने की कोशिश करेंगे ताकि संकटों की तह में जाकर उनकी जड़ों की पहचान की जा सके और निदान के गंभीर उपाय  ढूढ़े जा सकें।

हम सबसे पहले हम भारत के संविधान के लिए पिछले छह बरस में उत्पन्न खतरों की चर्चा करेंगे, जो अब वास्तविक संकट बन चुका है. हमारे संविधान के लिए पैदा खतरों की अगर कोई प्रभावी रोक-थाम नहीं की गई तो कोहराम काल्पनिक परिदृश्य नहीं होगा। 

कुछेक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरुण मिश्रा ने अपनी इजलास में टेलीकॉम मामले में उनके पूर्व के एक निर्णय को लेकर टेलीकॉम विभाग के एक निदेशक से मिले पत्र को संदर्भित कर कहा वो गौरतलब है. उनके शब्द थे: ” हमें नहीं मालूम कि कौन ये बेतुकी हरकतें कर रहा है, क्या देश में कोई कानून नहीं बचा है. बेहतर है कि इस देश में न रहा जाए और देश छोड़ दिया जाए.एक अधिकारी आदेश पर रोक लगाने की धृष्टता करता है तो फिर सुप्रीम कोर्ट को ताला लगाकर बंद कर देना चाहिए. देश में जिस तरह से चीजें हो रही हैं, इससे हमारी अंतरआत्मा हिल गयी है.” 

मामले की सतह से तह में जाने पर जो नज़र आता है उसे समझ कर इंदौर के एक्टिविस्ट गिरीश मालवीय कहते हैं : ” मीलोर्ड को यह अच्छी तरह से मालूम है कि टेलिकॉम विभाग के अदने से ‘ डेस्क ऑफिसर ‘ की इतनी हिम्मत नही हो सकती कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कुंडली मार कर बैठ जाए। लेकिन सारा ठीकरा उस अदने से ऑफिसर पर फोड़ कर मीलोर्ड खुश है. वैसे ये जानकर अच्छा लगा कि न्यायपालिका के पास अंतरात्मा नाम की कोई चीज बची हुई है ! ” 

जस्टिस अरुण मिश्रा ने अपनी इजलास में कोर्ट को मिले एक पत्र का जिक्र किया जिसके बारे में बाद में खबर मिली कि उस पर डेस्क ऑफिसर के रूप में टेलीकॉम विभाग के निदेशक मंदार देशपांडे ने पिछले माह दस्तखत किये थे. कोर्ट ने यह पत्र एक घंटे में वापस लेने का निर्देश दिया जिसकी तामील कर दी गई. पत्र में लिखा गया था कि एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू के बकाया 92 हजार करोड़ रूपये का टेलीकॉम कंपनियों द्वारा निर्धारित अवधि में सरकार के खज़ाना में भरने के अदालती आर्डर की तामील नहीं करने वाली टेलीकॉम कंपनियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए. सवाल है कि मोदी सरकार के ही इशारे पर उसके एक गौरवान्वित बाबू का सुप्रीम कोर्ट को निर्देश देना सुप्रीम कोर्ट की ही नहीं हमारे संविधान की भी हुकुम अदूली है, जिसमें साफ है कि न्यायपालिका  कार्यपालिका के अधीनस्थ नहीं है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस हुक्मअदूली का ठीकरा एक अफसर पर फोड़ देना , सच में हमारी न्यायिक व्यवस्था के संकट को दर्शाता है. यह एक बानगी भर है संवैधानिक संकट के खतरे की.  

बहरहाल, बहुत दिन नहीं हुए जब 1918 में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस दीपक मिश्रा के कामकाज के तौर-तरीके को लेकर अपनी आपत्तियों को अभूतपूर्व कदम के तहत सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने उच्चत्तम न्यायालय के तब के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों, जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर आवाज बुलंद की थी. यह न्यायिक-संवैधानिक संकट का परिचायक था. यह स्वतंत्र भारत में ही नहीं न्यायपालिका के वैश्विक इतिहास में इस तरह की सम्भवतः पहली परिघटना थी. तब जस्टिस चेलमेश्वर, सुप्रीम कोर्ट में वरीयता क्रम में जस्टिस मिश्रा के बाद दूसरे क्रमांक पर थे. उन्होंने अपने आवास पर बुलाई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था: “ हम चारों इस बात  पर सहमत हैं कि इस संस्थान को नहीं बचाया गया तो देश में लोकतन्त्र जिन्दा नहीं रह पाएगा. हम चारों आज सुबह भी चीफ जस्टिस से मिले. लेकिन हम अपनी बातों पर उन्हें सहमत नहीं करा सके. इसके बाद हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा कि हम देश को बताएं कि वह न्यायपालिका की देखभाल करे. हम नहीं चाहते कि कोई कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी.”

जस्टिस मिश्रा के विरुद्ध राज्य सभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की कवायद शुरु हुई थी और उसमें कांग्रेस भी शुरुआती दौर में शामिल हो गई थी. लेकिन बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कहने पर कांग्रेस ने अपने कदम पीछे खींच लिये. जस्टिस चेलमेश्वर ने दो टूक कहा था कि यह देश को तय करना है जस्टिस मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग पेश किया जाये या नहीं. जस्टिस मिश्रा अक्टूबर 2018 में सेवानिवृत्त हो गये. उनकी जगह तब जस्टिस गोगोई ने ली जब मोदी सरकार ने उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया पर हरी झंडी दिखा दी. मोदी सरकार चाहती  तो उन्हें मुख्य न्यायाधीश नहीं भी बना सकती थी.क्योंकि इस पद पर नियुक्ति में अंतिम प्रभावी निर्णय कई आधार पर कार्यपालिका का ही होता है.

पूर्व में कार्यपालिका ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के वरीयता क्रम की अनदेखी कर चीफ जस्टिस पद पर नियुक्ति की भी है. इसका एक उदाहरण इंदिरा गांधी शासन काल का है जब मई 1973 में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की वरीयता दरकिनार कर जस्टिस ए एन राय को चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया। जस्टिस गोगोई के सेवामुक्त होने के बाद से जस्टिस शरद अरविन्द बोबडे भारत के मुख्य न्यायाधीश है जिनके कई कथन से हमारा संवैधानिक संकट और भी गहरा होता नज़र आ रहा है, जिसकी चर्चा हम नागरिकता संशोधन अधिनियम के विशिष्ट सन्दर्भ में मीडिया दरबार के अगले अंकों में इसी स्तम्भ के तहत करेंगे।  

फिलवक्त यह उल्लेख करना बेहतर होगा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत के न्यायाधीश बी ड़ी लोया की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यृ के मामला ने चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की उस अभूतपूर्व संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के होने तक तूल पकड़ लिया था.इसके बारे में उपरोक्त चार न्यायाधीशों की प्रेस कांफ्रेंस में पूछे जाने पर जवाब मिला था कि न्यायाधीश लोया की मौत का मामला भी उनकी बेचैनी और विरोध की वजह है.

न्यायाधीश लोया, सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के उस मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें मोदी के दाहिना हाथ माने जाने वाले अमित शाह संदेह के कठघरे में हैं. न्यायाधीश लोया , दिसम्बर 2014 में एक समारोह में भाग लेने नागपुर गए थे जहाँ अचानक उनकी तबियत बिगड़ जाने पर अस्पताल ले जाने के बाद उनका देहांत हो गया. वह बिल्कुल निरोग और स्वस्थ्य थे. इसलिए भी उनकी मौत की वजह से लेकर पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और अंत्येष्टि के तौर-तरीके तक पर सवाल उठते रहे हैं. इस मामले की सुनवाई करने वाली सीबीआई की विशेष अदालत का श्री शाह के गृह-राज्य गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में गठन, उसके न्यायाधीश की पद स्थापना, तबादले ही नहीं अदालत की कार्यवाही में भाग लेने से श्री शाह के कतराने आदि की बातें भी सवाल खड़ी करती रहीं हैं. सवाल तो इस पर भी उठे कि अमित शाह की ओर से न्यायाधीश लोया की मौत को संदेह से परे बताने के लिए उनके नाबालिग पुत्र की प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करवाने की जरुरत क्यों आन पड़ी जबकि न्यायाधीश लोया की बहन ने इस मौत को संदेहास्पद मानने के कुछेक तार्किक कारण गिनाएं हैं.

जस्टिस अरुण मिश्रा   

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने न्यायाधीश लोया की मौत की स्वतंत्र जांच कराने के लिए दाखिल दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई का काम रोस्टर प्रणाली के आधार पर प्राप्त अपने विवेकाधार के तहत , जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एम एम शान्तनगौंडार की पीठ को सुपुर्द कर दिया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट  के वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने कुछ सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि जस्टिस अरुण मिश्रा को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनके बीजेपी के आला नेताओं के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रहे हैं.एडवोकेट दवे ‘बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएसन ‘ के प्रतिनिधि भी हैं.इस मामले में 16 जनवरी को सुनवाई होने पर उक्त पीठ ने महाराष्ट्र सरकार को न्यायाधीश लोया की मौत से सम्बंधित सभी दस्तावेज याचिकाकर्ताओं को सौंपने को कहा तो महाराष्ट्र सरकार ने ये सभी दस्तावेज मुहरबंद लिफाफ में उक्त पीठ को सौंप भी दिए.

खबर मिली कि जस्टिस अरुण मिश्रा अपनी किरकिरी से आहत होकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की अनौपचारिक मुलाक़ात में लगभग रो पड़े और उन्होंने इस मामले की आगे की सुनवाई से खुद को अलग करने की पेशकश की थी. अगर यह खबर सत्य न भी हो तो इतना कोई भी मान सकता है कि तब सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों के बीच एक तरह से महाभारत छिड़ गया था. आधुनिक महाभारत के कुछेक ‘ पर्व ‘ आगे भी सुप्रीम कोर्ट में नज़र आएं तो आश्चर्य  नहीं होगा.

(पत्रकार, लेखक जो अपने गांव के आधार केंद्र से हाल में कुछेक किताब लिख चुके हैं. उनसे <[email protected]> पर सम्पर्क किया जा सकता है.) 

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