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-संजय कुमार सिंह।।

अमित शाह, आप न सिर्फ एक बर्बर और असंवेदनशील सरकार चलाते हैं बल्कि वह बहुत ही अक्षम भी है – येचुरी

राजनेताओं को जम्मू कश्मीर जाने की अनुमति देने की पेशकश कर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह फंस गए हैं। विपक्ष उनपर सवाल उठा रहा है और उनपर तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत करने के आरोप हैं। द टेलीग्राफ ने आज इस खबर को पहले पन्ने पर छापा है। शीर्षक है, “श्रीमान परमिट शाह, यह आपका काम नहीं है”। ताजा मामला ऐसे समय पर हुआ है जब अमेरिकी सिनेटर ने कश्मीर में लगी पाबंदियों पर सूचना चाही है। जानकारों को इससे आश्चर्य हुआ है क्योंकि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनलड ट्रम्प की भारत यात्रा के बहुत करीब है। यूरोपीय यूनियन ने कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए उठाए गए कदमों को स्वीकार करते हुए शुक्रवार को नए केंद्र शासित प्रदेश में बाकी बचे प्रतिबंधों को शीघ्र हटाने की जरूरत बताई है। अमित शाह ने टाइम्स नाऊ कॉनक्लेव में गुरुवार को कहा था, “वे (राहुल गांधी और सीताराम येचुरी) एक बार कश्मीर में रोक दिए जाने के बाद कभी कश्मीर नहीं गए। वे अब जा सकते हैं। अब कोई भी वहां जा सकता है। हम हर किसी को इजाजत देंगे।” इसके बाद से विपक्ष ने शाह को चुनौती दी है और खास उदाहरणों का जिक्र करते हुए उनका मजाक बनाया है।

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी को दो बार श्रीनगर एयरपोर्ट पर रोका गया तो वे अनुमति के लिए सुप्रीम कोर्ट गए। उन्होंने इसपर कहा, “भारतीयों को भारत के किसी हिस्से में जाने के लिए अमित शाह से अनुमति लेने की जरूरत कब से होने लगी है?” येचुरी ने शाह के बयान की गलतियां उजागर कीं और ट्वीट किया, “श्रीमान शाह, आपकी कृपापूर्ण अनुमति के बगैर मैं फिर कश्मीर गया था पर सुप्रीम कोर्ट में केस दाखिल करने के बाद। आप न सिर्फ एक बर्बर और असंवेदनशील सरकार चलाते हैं बल्कि अगर आपकी एजेंसियों ने नहीं बताया कि मैं तीन बार कश्मीर गया हूं तो वह बहुत ही अक्षम भी है।” भाकपा के डी राजा ने भी दो बार श्री येचुरी के साथ कश्मीर जाने की कोशिश की थी। उन्होंने भी सरकार से यह सवाल पूछा। “देश के एक हिस्से का दौरा करने के लिए हमें अनुमति देने वाले वे कौन हैं? एक तरफ सरकार का दावा है कि सामान्य स्थिति वापस आ गई है और फिर वे कहते हैं कि अनुमति देंगे। यह कैसी सामान्य स्थिति है?” ….

राष्ट्रीय जनता दल के मनोज झा ने ट्वीट किया, “एक लोकतांत्रिक देश में इस महान पेशकश के लिए शुकिया अमित शाह जी। अब जब आपने बेहद कृपापूर्वक अनुमति दी है तो इससे पहले कि हम वहां जाने का निर्णय करें, क्या हम वहां आपके / अपने सहकर्मी फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती आदि से मिल सकेंगे? इतजार कर रहा हूं!” उन्होंने अखबार वालों से आगे कहा, “….. यह हमारे लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति है जहां गृहमंत्री तय करेंगे कि हम कहां जा सकते हैं। वैसे भी, जब आप विदेशी जनप्रतिनिधियों और राजनयिकों के लिए संचालित दौरे का आयोजन करने के बाद अब जब हमें इजाजत दी है तो हम जाने के लिए तैयार हैं। पर हम जाएंगे और चीनार के पेड़ से पूछेंगे कि उसे सामान्य स्थिति कैसी लग रही है। कृपया हमें जेल में बंद नेताओं से भी मिलने की अनुमति दी जाए। बाद में जब हम वापस आएंगे तो अपने ही देश में यात्रा करने की अनुमति देने के लिए सार्वजनिक रूप से गृहमंत्री का आभार जताएंगे।”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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