इतिहास, शिक्षा, साहित्य और मीडिया..

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1977 की जनता पार्टी सरकार के मंत्रिमंडल में लालकृष्ण आडवाणी ने खुद मांग कर सूचना प्रसारण मंत्रालय लिया था और उसके बाद हर अखबार मालिक को फोन कर उन अखबारों में अपना एक एक आदमी बतौर पत्रकार रखवाया था ताकि सरोकारी पत्रकारिता के बीच संघ के लोग अपनी जगह बना कर दक्षिणपंथी विचारधारा का प्रसार कर सकें..

-राजीव मित्तल।।

ये चार ऐसे शक्तिशाली हथियार हैं, जो किसी भी समाज को लंबे समय तक कूपमंडूक और बौरा देने की क्षमता रखते हैं..युद्ध में हुई क्षति के घाव तो देर-सबेर भर जाते हैं, लेकिन ज़रा बताइये कि उन घावों जख्मों का क्या किया जाए, जो मनुस्मृतियों, वेद पुराण और उपनिषदों के रजाई गद्दों को हज़ारों साल से ओढ़ बिछा कर..और इनमें लिखे की गलत सलत व्याख्या कर हम अपने ही समाज के एक बड़े वर्ग को छुआ छूत और ऊंच नीच की जंजीरों से जकड़ दिये जा रहे हैं!!

ईसाइयत ने क्राइस्ट की और इस्लाम ने मोहम्मद साहब की मानवीयता को ताक पर रख अपने अपने हिसाब से बाइबिल और कुरान को खूनी हथियार बनाया..तो हमारे देश में आज इन्हीं हथियारों से सोच की आज़ादी को कुचल कर, मसल कर युवा वर्ग को शाहदूले की मज़ार के चूहे बनाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है..और जो चूहा बनने को तैयार नहीं हैं, उन पर अर्बन नक्सल, टुकड़े टुकड़े गैंग, जिन्ना की पता नहीं कौन सी आज़ादी, पाक परस्त वाले आरोप थोपे जा रहे हैं..जामिया की लायब्रेरी हो या जेएनयू के हॉस्टल, या गार्गी गर्ल्स कॉलेज या अभिव्यक्ति का केंद्र बन गए देश भर के शाहीनबाग-सब देश के विभाजन कारी केंद्र साबित किये जा रहे हैं..

जहां से जो याद है वहीं से शरुआत करूँ तो 1960 के आसपास दिल्ली के गली मोहल्लों में खाली पड़े बड़े बड़े मैदानों में सुबह शाम स्वास्तिक का झंडा लगा कर सांस्कृतिक प्रवचनों और देसी खेल खेलते खाकी निकर और सफेद कमीजधारियों की भरमार दिखी..कई बार शामिल भी हुआ..पर उस छोटी सी उम्र में ही कई सारे ख़तरे सूंघ कर उस धारा से अलग हो गया.. स्कूलों में भी वही गंध..पांचवी क्लास तो शुद्ध संघी स्कूल के पवित्र वातावरण में गुजरी..जहां लड़की बहिन और लड़के भैया हुआ करते..उस वेदकालीन एक साल ने अपन को काफीकुछ अधर्मी बना दिया और फिर अपनी को छोड़ किसी दोस्त की बहन तक से राखी नहीं बंधवाई.. दिल्ली में BITV के दिनों तक में राखी बांधने आयी युवती को दोस्ती का हवाला दे कर साफ इंकार कर दिया..

मतलब कि ये ससुरी वेदकालीन संस्कृति दो जेण्डरों को सिर्फ औरत-मर्द में ही देखती है, तभी गार्गी कॉलेज में हस्तमैथुन आस्था से जुड़ जाता है..उस पांचवी क्लास वाले स्कूल में समलैंगिक संबंधों की बू भी आयी..जो बाग बगीचों तक तो फैली हुई थी ही..बड़े होने पर सुबह घूमने के दौरान कुछ बुजुर्ग हाथ भी कई बार कुछ टटोलते नज़र आये..

जब जब यह सोच सरकार बनाती है, इतिहास और साहित्य खास मसालों में लपेटे जाने लगते हैं, विचारों का खुलापन सीलेपन की बदबू से घिर जाता है, सावन और शिवरात्र की कांवड़ यात्राएँ आस्था के समूहों से निकल ताण्डवकारी गुंडई में तब्दील हो जाती हैं, जिन पर पुष्पक विमान से पुष्प बिखेरने की इच्छा ज़ोर मारती है..

प्रेमचंद, रोमिला थापर, मुन्नवर राणा गद्दार नज़र आने लगते हैं तो मंगोलों से इस देश को बचाने वाले अलाउद्दीन खिलजी में भन्साली टाइप इंसान को पैशाचिक रूप दिखता है.. अंग्रजों पर पहली बार तलवार उठाने वाले हैदर अली और टीपू सुल्तान धर्मान्ध दिखने लगते हैं..बल्कि कर्नाटक में तो इन दोनों की देशभक्ति के सवाल पर साल में एकाध दंगा भी हो जाता है…कई उम्रदराज औरत मर्द इतिहासकार, पत्रकार, विचारक गोलियों से भून दिए जाते हैं..

बीफ के सबसे बड़े निर्यातक देश की सड़कों पर गाय की रास थामे जा रहे मुसलमानों को पीट पीट कर मार डाला जाता है..जबकि उस दौरान गोवा और उत्तर पूर्व के राज्यों से मधुर गायन उठ रहा होता है कि हम गायखोर हैं, क्या कर लोगे हमारा..

मैं नास्तिक क्यों हूँ लिखने वाले घोषित अधर्मी और कम्युनिस्ट शहीद भगत सिंह से एक दूरी बना कर हर ऐरे गैरे नत्थुखेरे से बस यही गवाया जाता है कि गांधी ने भगत सिंह को फांसी पर क्यों चढ़ जाने दिया तो विदेशमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति 70 साल बाद हारमोनियम पर नेहरु-पटेल, नेहरु-पटेल गा रहा है..जबकि इसी सोच की धार को सुभाषचंद्र बोस की आत्मा ने बहुत जल्द भोथरा जो कर दिया..

बचा मीडिया, तो 1977 की जनता पार्टी की सरकार में जनसंघी आडवाणी को सूचना मंत्रालय दिलवाया ही इसलिए गया ताकि आज सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी, कश्यप, चौरसिया, श्वेता सिंह टाइप कुपढ़ पत्रकार पत्रकारिता का तियापांचा कर सकें और मीडिया का बड़ा हिस्सा जनता को सफेद झूठ परोस सके और व्हाट्स अप पर आईटी सेल देश को बांटने का सिलेबस छाप सके..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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