सत्ता बहुसंख्यकवाद की राह चल ही हासिल..

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-सर्वप्रिया सांगवान।।

दिल्ली चुनाव के नतीजों के बाद ये मान लेना कि सांप्रदायिकता हार गयी या भ्रमित राष्ट्रवाद को जवाब मिल गया, जल्दबाज़ी है और त्वरित ख़ुशी में की गयी टिप्पणी.

क्या ये कहना ठीक होगा कि लोगों ने आम आदमी पार्टी को इसलिए वोट दिया क्योंकि उन्हें भाजपा को उनके सांप्रदायिक और ओछे बयानों के लिए वोट नहीं देना था? नहीं. बल्कि ये भी सम्भव है कि जो केंद्र में नरेंद्र मोदी को वोट देता है वो राज्य में अरविंद केजरीवाल को वोट दे रहा है. चुनावों से पहले बहुत से वोटर खुल कर ऐसा कह रहे थे. वोटर ये भी कह रहे थे कि नरेंद्र मोदी सीएम नहीं बनेंगे और इसलिए उनके नाम पर वोट नहीं दे रहे.

ये ज़रूर कहा जा सकता है कि ज़्यादातर लोगों पर चुनाव प्रचार में दिए गए बयानों का असर नहीं हुआ क्योंकि अरविंद केजरीवाल एक विश्वसनीय चेहरा हैं, उन्होंने जितना काम किया उसका प्रचार भी किया, उन्होंने रणनीति बनायी और उनकी पार्टी भी उस पर चली, स्वास्थ्य और शिक्षा पर बात की और काम किया जिसका तोड़ बाक़ी पार्टियों के पास नहीं था. जैसे भाजपा के धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति का तोड़ बाक़ी पार्टियों के पास नहीं.

तभी चुनावों से पहले राहुल गांधी की शिवभक्त की पहचान बाहर आती है. अरविंद केजरीवाल की हनुमान भक्त की पहचान बाहर आती है. ये आज की राजनीति है जहाँ मंज़िल का रास्ता बहुसंख्यकवाद से होकर गुज़रेगा ही.

कांग्रेस के लिए यही कहना होगा कि जीत की वजह कॉम्बिनेशन ऑफ़ फ़ैक्टर्ज़ होती है. सिर्फ़ चेहरा होना काफ़ी नहीं होता, वरना चेहरा तो कभी ‘आइरन मैन’ लाल कृष्ण आडवाणी भी थे. चेहरा विश्वसनीय होना चाहिए, आपके पास वो ऑफ़र होना चाहिए जो बाक़ी पार्टियाँ नहीं दे सकी. दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस के पास कुछ नहीं था लेकिन उस बात का उल्लेख करना होगा कि भाजपा में एक गृह मंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति ध्रुविकरण की भाषा तो बोल ही सकता है लेकिन घर-घर जाकर पर्चे भी बाँट सकता है. आम आदमी पार्टी में अब तक ये संस्कृति है कि वे घर-घर जाकर माफ़ी भी माँग सकते हैं, काम भी गिना सकते हैं, आख़िरी दिन तक मेहनत कर सकते हैं.

इस उम्मीद के साथ कि बाक़ी प्रदेशों को स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ने का मॉडल आम आदमी पार्टी ने दिया, ये कहना मुनासिब है कि सांप्रदायिकता और भ्रमित राष्ट्रवाद को हराने का सपना देखने वालों के लिए अभी दिल्ली दूर है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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