IIMC में 11 स्टूडेंट्स के 5 दिन के निलंबन के मुद्दे पर, दो एक बात कहनी है..

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-श्याम मीरा सिंह।।

पहली बात ये कि इस समय प्रशासन के नए डायरेक्टर जनरल को लेकर लगभग सभी छात्रों का एक ही मत रहा है कि वह पर्याप्त प्रगतिशील हैं, छात्रों की सुनते हैं, समझते हैं, पिछले दिनों भी जब लगातार 15 दिनों से अधिक दिनों तक धरना चला था, तब भी संस्थान के डीजी का रवैया कभी भी डिक्टेटर जैसा नहीं रहा बल्कि डीजी हर रोज सुबह 4 बजे ही छात्रों से उनका हालचाल लेने आते थे, अपने बच्चों की तरह केयर करते थे, कम्बल-रजाई के लिए पूछते थे, हर रोज छात्रों को धरना खत्म करने के लिए मनाते भी थे. मैं खुद उस धरने के दौरान छात्रों के साथ खुले आसमान में सड़क पर सोया हूँ. इसलिए मैं इस बात का पूरा दावा कर सकता हूँ कि वर्तमान के डीजी, प्रदर्शनकारियों से कम डेमोक्रेटिक नहीं हैं।

नए डीजी ने छात्रों के अधिकार का न केवल सम्मान किया है बल्कि हर वह चीज उन्होंने पहली दफा में ही मान ली जो उनके अधिकार क्षेत्र में थी. जैसे पहली मुलाकात में ही उन्होंने संस्थान को 24 घण्टे ओपन करने का आदेश दे दिया था, छात्रों के एक एप्लिकेशन पर ही उन्होंने रीडिंग रूम की बात भी मान ली थी. जबकि इसके लिए छात्रों को कोई प्रोटेस्ट तो क्या एक नारा लगाने की जरूरत न पड़ी. बाद में फीस वृद्धि को लेकर 15 दिन लगातार धरना चलने पर नए डीजी ने एक भी छात्र को कभी भी धमकाया नहीं, न ही गार्ड या पुलिस का इस्तेमाल किया. इसलिए ये आरोप बहुत सही नहीं है कि प्रशासन छात्रों की आवाज दबा रहा है या कुचल रहा है.

हां इस बात से मेरी सहमति है कि एलुमनाई मीट के दिन प्रशासन का रवैया कुछ सख्त था। इसका कारण यह था कि प्रशासन नहीं चाहता था कि एलुमनाई मीट वाले दिन यानी जिस दिन देशभर से पूर्व छात्र इकट्ठे होते हैं, उनके सामने कोई पोस्टर लेकर खड़ा हो जाए. प्रशासन ने छात्रों को पहले ही आगाह किया था कि आप एलुमनाई मीट वाले दिन कुछ भी मत करिए, बाकी दिन आप पूर्णतः स्वतंत्र हैं. जितना प्रदर्शन करना है करिए. नए डीजी के पिछले रवैये को देखते हुए इस बात में सच में कोई शक नहीं है कि उन्होंने छात्रों की स्वतंत्रता का हमेशा सम्मान किया है. देश के बाकी हिस्से में ऐसे बिरले ही एडमिनिस्ट्रेटर मिलते हैं. लेकिन प्रशासन की चेतावनी के बावजूद जब कुछ छात्रों ने बीच एलुमनाई मीट में प्रदर्शन किया. तो प्रशासन ने 11 छात्रों को अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत पांच दिन के लिए निलंबित कर दिया है।

एक तरह से देखा जाए तो पांच दिन अधिक नहीं हैं। लेकिन मेरा मानना है पांच दिन का निलंबन न ही किया जाता तो अधिक ही अच्छा था।

प्रशासन को इस बार भी बड़ा दिल दिखाने की जरूरत थी, विरोध-प्रदर्शन किसी संस्थान के लिए गंदे धब्बे नहीं होते, बल्कि विरोधप्रदर्शनों से किसी भी संस्थान की खूबसूरती और अधिक बढ़ती है.

प्रदर्शन के मोटिव पर सवाल किए जा सकते हैं! प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रोटेस्ट के समय के चुनाव पर भी प्रश्न किए जा सकते हैं. इसकी भी बहुत अधिक सम्भवनाएँ हैं कि प्रदर्शनकारियों के तर्क आपको ओछे लगें, या बोने लगें, हो सकता है आप उनसे पूर्ण सहमत न हों. लेकिन उनके बोलने, सुनने, असहमति के अधिकार को सुरक्षित रखना अत्यधिक जरूरी है.

हालांकि पांच दिन का निलंबन एक अनुशासनात्मक कार्यवाही ही है, और अधिक बड़ी भी नहीं है. लेकिन ऐसी अनुशासनात्मक कार्यवाहियां कब बड़ा रूप ले लें इसका पूरा जोखिम रहता है। इसलिए यदि 5 दिन का भी निलंबन है तो मैं इसके खिलाफ हूँ. एक डेमोक्रेसी में जरूरी नहीं है सबसे अच्छे तर्क रखने वाले लोग ही बोलेंगे, ये जरूरी नहीं है कि जिनके कारण वाजिब लगेंगे वही बोलेंगे. एक मैच्योर डेमोक्रेसी में तर्क-वितर्क-कुतर्क, अच्छे-बुरे-भले सभी विचारों को रखने का स्पेस मिलना चाहिए. कई बार कोई बात किस समय रखी जानी चाहिए इसका महत्व होता है लेकिन फिर भी हर किसी को पूरा हक है कि वह किस समय, अपनी बात कहना चाहता है कहे.

प्रशासन यहां कानूनी रूप से गलत नहीं है, नैतिक रूप से भी बहुत अधिक गलत नहीं है. लेकिन डेमोक्रेसी की परिभाषाओं में प्रशासन का ये कदम एकदम सतही और हल्का है. भले ही ये निलम्बन 5 दिन का है. लेकिन ये निलम्बन है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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