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-मुकेश नेमा।।

समझदार क़िस्म के बाबू आज के दिन से सबसे ज़्यादा डरते हैं ! प्रामिस कर बैठे आप तो फिर बचा क्या ! आप प्रामिस कर लें या प्रेम कर लें ! दोनों बातें एक साथ कभी मुमकिन रही नहीं कभी ! जो संवेदनशील क़िस्म के लड़के आज के दिन प्रामिस कर बैठते हैं ,उनके लिये वैलेंटाइन वीक के आगे के दिनों का कोई मतलब है भी नहीं !
मेरी राय तो यही है कि प्रामिस करने के पहले अपने दिमाग़ को थोड़ा थपथपा लें ! आप इश्क़ की खुमारी में अपनी बाबू से प्रॉमिस कर बैठते हैं और आपके ऐसा करते ही वो साहब हो जाती है ! उसकी सहेलियो की टीम विधानसभा की आश्वासन समिति में बदल जाती है ! चीर फाड़ की जाती है आपके किये गये वायदों की ! और फिर आप धिक्कारे जाते है !


याद रखिये ! लड़कियों की याददाश्त हाथी ये भी अच्छी होती है ! लिहाज़ा अपनी औक़ात से बड़ा प्रॉमिस करने से बचें ! खुदानाखास्ता आज की बाबू यदि कल बीबी हो गयी तो अपना मरण तय समझिये ! वो सुबह शाम ,उठते बैठते आपकी आख़री साँस तक आपको आपके आसमानी सुल्तानी वायदो बाबत ताने देती रहेगी ! आप जब भी उससे किसी बहस में जीत रहे होंगे वो ये नाज़ुक मुद्दा छेड़कर आपको पटक लेगी और आप ही ही करने के अलावा और कुछ कर नहीं सकेंगे !
प्रामिस करना बाबू वाली पारी समाप्त कर देने की घोषणा है ! आप प्रामिस करते हैं ! आपकी बाबू आपको और कुछ करने लायक़ छोड़ती नहीं फिर ! प्रामिस करना अपने हाथ कटवा लेना है ! आगे आप सोच लें कि कटे हाथों वाला बाबू होने में क्या क्या नुक़सान हैं ! जो बाबू प्रामिस करता है वो फिर किसी कहासुनी के लायक़ नहीं बचता और उसके हिस्से सुनना ही रह जाता है !
प्रॉमिस करने का सबसे बड़ा कष्ट ये है कि सामने वाला उम्मीदें बांध लेता है ! वह चाहता है जैसा आप कभी भावावेश में कह गये थे उसे करके दिखायें ! वो ये भूल जाते हैं कि राष्ट्रीय कवि इंदीवर बहुत पहले ही बता गये थे कि क़समें वादे प्यार वफ़ा सब बातें है ,बातों का क्या ! ऐसे में यदि आपका बाबू किसी नाज़ुक वक्त में आपसे कुछ कह सुन ले तो इसका मतलब यह क़तई नहीं कि आप उससे उस पर अमल करने की उम्मीद भी लगा लें !
बाबू को बातें भी करना ही होती है ,बाबू आपसे कोरोना वायरस या गीले सूखे कचरे की बात तो करेगा नहीं ! बाबू के पास बातचीत के विषय बड़े सीमित से होते है ! आपके रेशमी बालों ,बड़ी बड़ी आँखों ,नुकीली नाक और शरबती ओठों की तारीफ़ करते करते उसका भावनाओं में बह जाना स्वभाविक सा ही है ! ऐसे में बातचीत के दौरान वह लंबी लंबी छोड़ भी बैठता है !
लड़कियों को चाहिये कि वो अपने बाबू की भावनाओं को समझे ! उसके वायदों को उतनी ही गंभीरता से ले जितना पब्लिक चुनाव के दौरान पार्टियों के घोषणा पत्र को लेती है ! आप अपने बाबू के वायदों पर एतबार करेगी तो दुख पायेगी !
बेहतर होगा कि अपने बाबू के कहे को ज़्यादा सीरियसली ना लें ! खुद को शाबाशी दें कि एक अच्छा भला इंसान आपके इश्क़ में पागल है ! और इसी वजह से कुछ भी आयें बांये बकने लगा है ! इससे आप भी सुखी रहेंगीं और आपका बाबू भी चैन से जी सकेगा !

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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