मी लॉर्ड, माैका है, बच्चों के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाने का! उठा ही डालिए!!!

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-त्रिभुवन।।
शाहीन बाग प्रदर्शन के दौरान चार माह के बच्चे की मौत के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर सोमवार को सुनवाई की और बहुत शानदार बातें की।

सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने सख्त टिप्पणी की और पूछा कि क्या चार महीने का बच्चा प्रदर्शन करने गया था?

बहादुरी पुरस्कार से अलंकृत छात्रा ज़ेन गुणरत्न सदावर्ते की चिट्ठी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। इसे दैनिक भास्कर ने फ्रंट पेज पर प्रमुखता से छापा था। पत्र याचिका में कहा गया कि इस तरह के धरने प्रदर्शन में बच्चों को शामिल न किया जाए। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट गाइड लाइन बनाए। धरने आदि में बच्चों को ले जाना उन पर अत्याचार है।

मैं समझता हूं कि अब धरने और पदर्शन पर तो बच्चों को नहीं ही ले जाया जाएगा, साथ ही सुप्रीम कोर्ट यह भी मुकम्मल व्यवस्था करेगा कि अदालतों में सुुनवाई के लिए आने वाली माताओं के शिशुओं की देखभाल भी ठीक से हो। उन्हें अदालतों में सुबह से देर शाम नहीं बिठाया जाएगा। देश की मज़दूर मांओं के लिए कोई ऐसी व्यवस्था होगी कि उनके शिशुओं की अच्छी देखभाल हो। मैं आए दिन देखता हूं कि काेई मज़दूर स्त्री सड़क या भवन बनाने के काम में लगी है और उसका नन्हा सा बच्चा मिट्‌टी के ढेर पर धूलधूसरित हो रहा है। कभी रोता है और कभी हंसता है। कभी वह धूल सिर पर डालकर खेलता है।

मैं देखता रहा हूं, किसान मां अलसुबह उठती है। घर में इतने सारे पशु हैं। वह उनका पालन पोषण करती है। पति और परिजनों का भेाजन लेकर खेत जाती है। उसकी गोद में नन्हा शिशु होता है। सुप्रीम कोर्ट और देश के करुणापूर्ण हृदय वाला शासन इनके लिए ज़रूर कोई व्यवस्था निकालेगा। शहर की गलियों में दिन भर कितने ही बच्चे आवारा या भीख मांगते या फिर गुब्बारे बेचते हुए घूमते हैं। वे किसी शाहीन बाग या किसी अन्य प्रदर्शन में नहीं जाते। लेकिन उनका जीवन भी कितना संकटापन्न है। शायद सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख से इनके लिए भी कोई राह निकलेगी। शाहीन बाग में तो एक शिशु को कुछ हुआ था। लेकिन हमारे यहां तो एक बड़ी रिसर्च स्टोरी हुई और वह आनंद ने की। इसमें पूरा बताया कि गुजरात में किस तरह नन्हे बच्चों को ले जाया जाता है और बाल तस्करी होती है। शायद अब सुप्रीम कोर्ट इधर भी कुछ सोचे।

कितनी ही नन्ही बालिकाओं का उठा लिया जाता है और वहशी दरिंदे उनके साथ अपनी यौन पिपासा शांत करते हैं। शायद अब सुप्रीम काेर्ट उनके बारे में सुनेगा और इस सड़ते हुए समाज की रगों में भरी मवाद को किसी तरीके से बाहर निकलवाएंगा। शायद वह असम से लेकर कश्मीर तक उन मांओं की भी चिंता करेगा, जो अपने नन्हे शिशुओं के लिए दवा और दूध के लिए रात-रात बिलखती हैं। शायद कहीं बच्चों के जीवन की सुरक्षा, उनके खेलने के अधिकार और उनके हंसने रोने के दिनों की सुरक्षा हो। कई चीज़ें बहाने से ही हुआ करती हैं। शायद इसी बहाने हम उनकी शैतानियों की रक्षा कर पाएं। एक अकेले शाहीन बाग के बारे में क्यों सोचें? नमक सत्याग्रह या किसी अन्य शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए निकले गांधी का डंडा थामे सबसे आगे दौड़ते उस बच्चे के सपनों की भी चिंता करें और उस बच्चे को भी खुली आंख इसे इतिहास के पन्नों से वर्तमान में ले आएं, जो अंगरेजों से लड़ती रानी लक्ष्मी बाई की पीठ पर बंधा है। मी लॉर्ड, कहीं ऐसा न हो कि आप बिना सोचे समझें एक तरफा फैसले कर लें आैर बिना बहस और तर्कवितर्क के ही कुछ निर्णय ले लें और कहीं ऐसा भी न हो जाए कि गांधी की लाठी लेकर उत्साह से भागते बच्चे या लक्ष्मी बाई की पीठ से बंधे बच्चे की ये दोनों तस्वीरें ही इतिहास से लुप्त हो जाएं।

मी लॉर्ड, माैका है, बच्चों के लिए एक क्रांतिकारी कदम उठाने का! उठा ही डालिए!!!

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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