जनसुरक्षा का सवाल..

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देशबन्धु में आज का संपादकीय

जम्मू-कश्मीर में सब कुछ सामान्य होने का दावा करने वाली मोदी सरकार को शायद अपनी ही बातों पर भरोसा नहीं है। इसलिए पिछले छह महीने से हिरासत में रखे नेताओं से उसे अब भी डर लग रहा है। पांच अगस्त से उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती – जम्मू-कश्मीर के इन दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को देश की जनता ने नहींं देखा है। मोदी सरकार के सिवाय कोई नहीं जानता कि वे किस हाल में हैं, लेकिन सरकार को अब भी उनसे ख़तरा महसूस हो रहा है। शायद इसलिए उनकी एहतियातन हिरासत की छह माह की अवधि बीते गुरुवार को ख़त्म हुई और सरकार ने उन दोनों पर पीएसए यानी जनसुरक्षा कानून लगाकर उनकी रिहाई का रास्ता फिर कुछ समय के लिए बंद कर दिया। उमर अब्दुल्ला के पिता और पूर्व मुख्यमंत्री फारुख़ अब्दुल्ला भी पीएसए के तहत बंद किए गए हैं।

अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला मोदी सरकार देश और कश्मीर के हक़ में बताते आई है, लेकिन अगस्त से लेकर अब तक मोदी सरकार इस बात की हिम्मत नहीं दिखा पाई कि इस फैसले पर जनता की प्रतिक्रिया का खुद सामना कर सके। इसलिए पहले लंबे समय तक कश्मीर मेंं संचार सेवाओं पर प्रतिबंध लगा रहा। इंटरनेट बंद कर लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी को कुचला गया। कश्मीर के जन नेताओं को कैद में रखा गया, देश के अन्य विपक्षी नेताओं को कश्मीर जाने से रोका जा रहा है और अब जनसुरक्षा के नाम पर सरकार फिर अपने बचाव में लगी हुई है।

सरकार का कमोबेश यही हाल सीएए के नाम पर खड़े हुए आंदोलन से निपटने में नजर आ रहा है। दिल्ली के शाहीन बाग में महिलाओं ने जो स्वत:स्फूर्त आंदोलन खड़ा किया है, वह अब पूरे देश के लिए मिसाल बन चुका है। लेकिन भाजपा इसे बदनाम करने की कोई कसर नहीं छोड़ रही। दिल्ली चुनाव में शाहीन बाग एक बड़ा मुद्दा बना। ट्रोल आर्मी ने पहले यहां की महिलाओं के पैसे लेकर धरने पर बैठने की झूठी खबरें प्रसारित कीं। फिर अफ़वाह फैलाई गई कि आम आदमी पार्टी यहां बिरयानी बांट रही है।

कितने दुख की बात है कि बिरयानी जैसा लोकप्रिय व्यंजन भी अब धर्म की भेंट चढ़ चुका है। धर्मांधता की राजनीति से भूखों का पेट तो नहीं भर सकता, लेकिन पोहे और बिरयानी का धार्मिक बंटवारा कर किनका हित साधा जा रहा है, यह देश को समझ जाना चाहिए। खैर शाहीन बाग में मोदी समर्थक एक महिला पत्रकार ने बुर्के के भीतर कैमरा छिपाकर स्टिंग आपरेशन करने की कोशिश की। लोगों ने उसे पकड़ लिया, तो अब उस पर भी झूठ फैलाया जा रहा है। भाजपा के कुछ सांसद सरेआम शाहीन बाग को लेकर अनाप-शनाप बयान दे रहे हैं। प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के बाद तेजस्वी सूर्या शाहीन बाग पर कहते हैं कि बहुसंख्यक समाज को सतर्क रहने की जरूरत है, नहीं तो मुगल शासन फिर लौट सकता है। दरअसल सतर्क रहने की ज़रूरत तो इतिहास के बारे में झूठ फैलाने वाले इन लोगों से है।

भारत एक दिन में बनकर तैयार नहीं हुआ है। यहां कई तरह के शासकों ने राज किया, यहां की धार्मिक, सांस्कृतिक बहुलता को भी पनपने दिया। अपने साम्राज्य की सरहदें बढ़ाने के लिए कभी धर्म को हथियार की तरह इस्तेमाल किया, कभी ढाल की तरह। राजशाही की बुराइयां राजतंत्र के साथ चलती रहीं, लेकिन इन्हीं राजाओं में अशोक, अकबर, शेरशाह सूरी जैसे शासक भी हुए, जिन्होंने जनता के हित में कई दूरगामी फैसले लिए। रहा सवाल मुगल शासन का, तो आज ताजमहल के नाम पर जो राजस्व सरकार हासिल करती है, वह मुगल शासन की ही देन है। जिस लाल किले से प्रधानमंत्री 15 अगस्त को भाषण देते हैं (और मोदीजी ने तो प्रधानमंत्री बनने से पहले ही लालकिले का माॅडल बनवाकर वहां से भाषण दिया था) वह भी मुगल शासन की ही देन है।

कभी धर्म का चश्मा उतार कर इतिहास को निष्पक्ष नजरिए से पढ़ने की कोशिश संघ के लोग करेंगे, तो मुगल शासन के और कई योगदान नजर आ जाएंगे। इसलिए भारत में हिटलर की तरह की नस्लीय शुद्धता की सनक भरी बात करने का कोई अर्थ नहीं है। मगर फिर भी मोदीजी और उनके सांसद लगातार शाहीन बाग को लेकर भ्रम फैला रहे हैं, गलतबयानी कर रहे हैं। सीएए हो या अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला, अगर जनता को यह लगता है कि सरकार उसके हित में निर्णय नहीं ले रही है, तो उसे विरोध करने का हक़ संविधान ने दिया है। सरकार को उसके इस अधिकार का सम्मान करना चाहिए। लेकिन इसके उल्ट सरकार इस विरोध को कुचलने में लगी हुई है। क्या यह जन और जनतंत्र सुरक्षा के हित में है, यह सोचना चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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