बेरोजगार युवा डंडा मारेंगे – कहना गलत है तो क्या बाकी सब ठीक है?

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-संजय कुमार सिंह।।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान एक रैली में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बेरोजगारी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा, ”ये जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, छह महीने – सात-आठ महीने बाद ये घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। हिंदुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे, इसको समझा देंगे कि हिंदुस्तान के युवा को रोजगार दिए बिना ये देश आगे नहीं बढ़ सकता।” आप इसे सही मानें या गलत, मैं अभी इस विवाद में नहीं जा रहा। ना मैं राहुल गांधी का बचाव करना चाहता हूं। मैं बताना चाहता हूं कि इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने क्या कहा। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान पीएम ने कहा, “लोग मुझे डंडे मारने की बात कहते हैं। लेकिन उन्होंने छह महीने की बात कही है, ऐसा करने की तैयारी करने में इतना समय तो लगता ही है। छह महीने में कोशिश करूंगा कि सूर्य नमस्‍कार की संख्‍या बढ़ा दूंगा। अपनी पीठ को मजबूत बना लूंगा।”

कहने की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी ने जो भी कहा मु्द्दा बेरोजगारी का था। युवाओं को नौकरी नहीं मिलने पर पैदा हो सकने वाली स्थिति का था और इस तथ्य के बाद कहा गया था कि, मैं चौराहे पर आ जाउंगा। मैं राहुल गांधी को सही नहीं कह रहा, मेरा मानना है कि चौराहे पर आने की बात कहने के बाद घर से नहीं निकलने पर युवा डंडा मारेंगे कहने पर बुरा नहीं मानना चाहिए था। इसलिए भी नहीं कि इसपर लोक सभा में पर्याप्त हंगामा हो चुका है। वैसे भी अगर कहा जाए कि आप ऐसा नहीं करेंगे तो लोग डंडे मारेंगे का मतलब यह नहीं है कि आप डंडे खाने के लिए पीठ मजबूत करें। कायदे से आपको वह काम करना चाहिए कि डंडे मारने की स्थिति नहीं आए। राजनीतिक कारणों से आप कह सकते हैं कि मैं डंडे ही खाऊंगा क्योंकि उससे वोट मिलते हैं। और नरेन्द्र मोदी यही करते नजर आ रहे हैं। उन्होंने असम के कोकराझार में फिर इस बयान का आधा-अधूरा हवाला दिया और एक रैली में कहा, “कुछ नेता डंडे मारने की बात करते हैं, लेकिन देश की माताओं और बहनों के आशीर्वाद से मैं बच जाऊंगा। मोदी ने कहा कि आज आप इतनी बड़ी तादाद में आशीर्वाद देने आए हैं, तो मेरा विश्वास और बढ़ गया है। जिस मोदी को इतनी बड़ी मात्रा में माताओं-बहनों का सुरक्षा कवच मिला हो, उस पर कितने ही डंडे गिर जाएं, उसको कुछ नहीं होता।

ध्यान देने वाली बात है कि पहले पीठ मजबूत करने की बात कहने वाले प्रधानमंत्री अब आशीर्वाद पर भरोसा जता रहे हैं। मेरे ख्याल से डंडा मारेंगे वाला बयान ऐसा नहीं है कि बिना संदर्भ का उसके हवाले कोकराझार में माताओं बहनों के आशीर्वाद की ताकत बताने के लिए उपयोग किया जाए। आशीर्वाद में इससे बहुत ज्यादा ताकत है। साफ है कि उस बयान का दुरुपयोग किया जा रहा है। अगर राहुल गांधी का यह बयान गलत है तो प्रधानमंत्री की ही नहीं अन्य भाजपा नेताओं की भी प्रतिक्रिया गलत है। लेकिन अखबार पलट वार के नाम पर कुछ भी छाप देते हैं और मूल बयान को संदर्भ से काटकर और बुरा बनाते हैं। बाकी नेता (दूसरे दलों के भी) चुप रहते हैं सो अलग। ऐसे में अखिलेश यादव का यह कहना सही है कि प्रधानमंत्री अपनी पीठ मजबूत करने की बजाय बेरोजगार युवाओं को कोई ऐसा ही आसन बताते तो बेहतर रहता।

मुख्तार अब्बास नक़वी पहले बोल चुके हैं कि किसी नशा मुक्ति केंद्र में जाकर उन्हें इलाज कराना चाहिए। इसके बाद उन्होंने सोनिया गांधी से कहा कि राहुल गांधी को किसी राजनीतिक प्ले स्कूल में भेजें। रायबरेली में उनके खिलाफ केस दर्ज कराने की मांग की गई है। भाजपा नेताओं ने राहुल के खिलाफ केस दर्ज कराने को लेकर रायबरेली के एसपी से मुलाकात की। बीजेपी नेताओं ने पुलिस अधिकारी को एक पत्र सौंपते हुए प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अशोभनीय टिप्पणी का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराने की मांग की। इस दौरान भाजपा नेताओं ने कहा कि पीएम मोदी किसी दल के नहीं बल्कि देश के जनप्रतिनिधि हैं। ऐसे में उनके खिलाफ टिप्पणी करने वालों पर तत्काल केस दर्ज किया जाना चाहिए। पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पत्र देने के बाद भाजपा नेताओं ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय के सामने ही राहुल गांधी के खिलाफ नारेबाजी भी की। ऐसे में सवाल उठता है कि राजनीतिक विरोध पर एफआईआर होगी या प्रधानमंत्री राजनीतिक जवाब देंगे? या सब कुछ होगा वह काम नहीं होगा जो किया जाना चाहिए। उसपर चर्चा तो टेलीविजन चैनल वाले भी नहीं करते।

जहां तक मुख्तारअब्बास नकवी की बात है तो वे किस राजनीतिक प्ले स्कूल की बात कर रहे हैं? ऐसा कोई स्कूल आम जानकारी में तो नहीं है और राहुल गांधी का जन्म जिस परिवार में हुआ है वह राजनीतिक प्ले स्कूल नही, किसी घर परिवार के विश्वविद्यालय से बड़ा और पुराना है। अगर वे ठीक समझें तो अपने स्कूल का नाम बताएं जहां वे राजनीतिक रूप से इतने परिपक्व हो गए कि राहुल गांधी को प्ले स्कूल में भेजने की बात कर रहे हैं। चाहें तो वहां उन्हें मिल सकने वाली राजनीतिक सीख की भी जानकारी देनी चाहिए। उनका इशारा राष्ट्रवादी होने के आसान तरीके की ओर तो नहीं है? कोई उम्मीवार उनके ध्यान में है तो इसे राष्ट्रवाद माना जाए या राष्ट्रवादियों के खिलाफ साजिश? मुझे यकीन है कि वे यह सलाह नहीं दे रहे होंगे कि किसी राजनीतिक परिवार में शादी करके राहुल राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जाएंगे या हो सकते हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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