चुनाव प्रचार – जिसने समर्थकों की सोच, जरूरत और प्राथमिकता बदल दी..

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-संजय कुमार सिंह।।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा का प्रचार ऐसा रहा कि लोग सरकारी मुफ्त सेवाओं के विरोधी हो गए हैं उसके खिलाफ बोलने लगे हैं। सरकार का काम है कि वह नागरिकों की बुनियादी जरूरतें पूरी करे और शिक्षा व इलाज इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं। दिल्ली सरकार ने इन दोनों क्षेत्रों में अच्छा काम करने के अलावा दिल्ली की महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा दी है। निश्चित रूप से यह प्रशासनिक कौशल का नतीजा है और चुनाव में इसका लाभ आम आदमी पार्टी को मिलना था। चूंकि वादे करने से बात नहीं बनती और 15 लाख का वादा पहले जुमला हो चुका है इसलिए पार्टी के समर्थकों और प्रचारकों ने इसे मुफ्तखोरी बताते हुए इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया। इसका अच्छा-खासा असर हुआ और एक से एक गधे आदर्शों की बात करने लगे हैं। जो स्कूल नहीं गए वो भी मुफ्त शिक्षा के विरोधी हैं। उन्हें नेताओं की मुफ्तखोरी से कोई मतलब नहीं है। और अपनी मुफ्तखोरी जारी रखने के लिए भाजपा ने अपने विज्ञापनों के जरिए मुफ्त देने के वादे खूब किए। आइए देखें।
दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण में खबरों के पहले पन्ने पर 28 जनवरी से रोज कम से कम एक विज्ञापन छपा है और यह क्रम प्रचार के आखिरी दिन 6 फरवरी तक चला है। आठ को वोट देने की अपील भी है। इस बीच प्रधानमंत्री की दो रैलियों का विज्ञापन, एक आधे पेज का और एक पूरे पेज का – खबरों के पहले पन्ने पर नजर आया। मैंने दूसर अखबार और अंदर के पन्ने नहीं देखे। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए इतना बड़ा प्रचार अभियान सिर्फ एक अखबार में नहीं था और ना ही सिर्फ अखबार में था। पार्टी ने प्रचार के दूसरे तरीकों का भी उपयोग किया। वह भी तब जब विधानसभा में उसके तीन ही सदस्य थे और लोकसभा की सातों सीटें उसके पास है। वैसे, इस हिसाब से सबसे अजीब स्थिति उसी की थी। वह तीन से शून्य पर (लोकसभा में सारी और विधानसभा मे एक भी नहीं) से सभी 70 सीटें जीतने का तर्क दे सकती है और हौसला रख सकती है।


इस लिहाज से उसना पूरा जोर लगाया, पैसे भी खर्च किए और राजनीति भी की। शाहीनबाग का संयोग और प्रयोग इसमें शामिल है। ध्रुवीकरण की कोई कोशिश नहीं छोड़ी गई और जेएनयू का हमला अगर भाजपा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और संघ पोषित-प्रेरित न भी हो तो किसी का नहीं पकड़ा जाना उसके बारे बहुत कुछ कहता है। फिर “गोली मारो” और एक बच्चे का जामिया पहुंच कर वाकई गोली मार देना और उसे 19 साल का कहकर फिर अवयस्क बताने का संरक्षणवादी तरीका दूसरों को प्रेरित करने वाला था। बाद में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया कि युवक का नाम मतदाता सूची में है तो वह अवयस्क कैसे हो सकता है। पर यह खबर कम छपी। दूसरी बार जिसने कट्टा चलाया वह आम आदमी पार्टी का “कपिल” निकला। इसे मिला प्रचार भी असाधारण रहा। बाद में उसके परिवार का कहना कि वह आप में नहीं है और इस ‘प्रचार’ के लिए चुनाव आयोग का दिल्ली पुलिस के अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए कहना इस चुनाव की गंभीरता और निष्पक्षता दोनों को रेखांकित करता है।


शाहीनबाग धरने को चलने देना, जबरन नहीं हटाना और उसे संयोग नहीं प्रयोग कहना, वहां से रिपोर्टिंग और रिपोर्टर के कथित तौर पर पीटे जाने की रिपोर्टिंग और फिर समूह में बाइट लेने पहंच जाने, जवाब नहीं देने पर अपने हिसाब से रिपोर्टिंग और इसी स्थिति में भाजपा समर्थक मशूहर एंकर को पहुंचा देने के लिए कॉमेडियन कुणाल कामरा पर प्रतिबंध, फिर केंद्रीय मंत्री की “सलाह’ पर दूसरी विमानसेवाओं में भी कुणाल को बैन किया जाना भी अच्छी भली कॉमेडी ही है। यह सब चल ही रहा था कि गुंजा की गूंज उठी। गुंजा एक प्रतिभाशाली भाजपा समर्थक हैं जो बुर्के में नाम बदलकर शाहीनबाग में स्टिंग कर रही थीं। यह युवती साधारण नहीं थी, प्रधानमंत्री ट्वीटर पर बहुत कम लोगों को फॉलो करते हैं और गुंजा उनमें एक है। कुल मिलाकर, गुंजा कपूर फंस गई थीं। पर यह खबर वैसे नहीं छपी जैसे छपनी चाहिए थी। यही नहीं,चर्चा है कि 40 पुलिस वालों ने सुरक्षित निकाला। इससे पता चलता है कि योजना बिगड़ने पर बचने के लिए बनाई गई उसकी योजना कितनी दुरुस्त थी।
इस पृष्ठभूमि में दैनिक भास्कर में छपे विज्ञापनों में किए गए वादे दिलचस्प हैं। आइए इन्हें भाजपा के अपने वादों और उन्हें जुमला कहे जाने से लेकर भूल जाने के आलोक में देखें। इस क्रम में पहला विज्ञापन था, झूठे वादों को नहीं, मेरा वोट मजबूत इरादों को। इसमें किसके झूठे वालों की बात हो रही है यह स्पष्ट नहीं है। पर वादे पूरे करने का भाजपा का रिकार्ड आम आदमी पार्टी के मुकाबले बहुत खराब है पर यह दावा भाजपा ने किया। इसके बाद का विज्ञापन था, धारा 370 हटाई, तीन तलाक पर पाबंदी और शरणार्थियों को नागरिकता देने का कानून। इसमें भाजपा ने जिन “ऐतिहासिक” फैसलों की बात की है उनमें एक पिछले लोकसभा चुनाव से पहले और दो चुनाव जीतने के बाद का है। क्रम बदल दिया गया है। तीन तलाक पर पाबंदी के “ऐतिहासिक” फैसले से भाजपा को मुसलिम “बहनों” का वोट लोकसभा चुनाव में भले मिला हो अभी तो देश भर के शाहीनबाग में कुछ और कहानी दिखाई पड़ रही है। धारा 370 हटाने से क्या फायदा हुआ है यह तो पार्टी ने भी नहीं बताया है।
नागरिकता कानून का इतना विरोध हो रहा है इसे भी “देशहित में ऐतिहासिक फैसला” बताना – साफ कहता है कि पार्टी उम्मीद करती है कि दूसरे देश के नागरिकों को यहां की नागरिकता देने के उसके फैसले से उसे वोट मिलेंगे। यह कुछ खास मतदाताओं पर भरोसे की पराकाष्ठा है। पर सबसे बड़ी बात यह है कि भाजपा के पास किए गए काम के नाम पर यही है और इसमें पिछले कार्यकाल का कुछ नहीं है। एक विज्ञापन था, देश बदला अब दिल्ली बदलो। देश तो यही बदला है कि जीडीपी 8 प्रतिशत से चार पर आ गई (या आ जाएगी), नौकरियां नहीं हैं, रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। ऐसे में दिल्ली बदल कर क्या होगा?
आधे पन्ने का एक विज्ञापन था, हर वचन निभाएंगे, दिल्ली में करके दिखाएंगे। इसमें गरीबों को दो रुपए किलो आटा, नौवीं कक्षा तक गरीब लड़कियों को साइकिल का उपहार, कॉलेज जाने वाली गरीब लड़कियों को स्कूटी का उपहार, टैंकर मुक्त दिल्ली, हर घर नल से स्वच्छ जल, आयुष्मान भारत, किसान सम्मान निधि और प्रधानमंत्री आवास योजना लागू, युवाओं के लिए टैलेंट हंट और कौशल विकास, ठेका मजदूरों को नौकरी की गारंटी, दिव्यांगों, विधवाओं व बुजुर्गों को पेंशन बढ़ोत्तरी, रेहड़ी पटरी वालों का नियमितीकरण और जीवन बीमा आदि घोषणाएं हैं। आप देखेंगे कि इनमें से ज्यादातर मुफ्त की सुविधाएं हैं। पर ये उपहार हैं या निधि अथवा सम्मान इसलिए मुफ्तखोरी की आदत नहीं डालेंगे और भाजपा के समर्थकों को इसमें कुछ गलत नहीं लग रहा है या वे जानते होंगे कि सब जुमला है।
इसमें के कई वादे भाजपा के संकल्प पत्र 2020 के हैं और ये अलग-अलग विज्ञापन के रूप में भी छपे। प्रधानमंत्री आवास योजना का एक विज्ञापन आठ कॉलम वाली पट्टी के रूप में भी था। इसके मुताबिक योजना का लाभ दिल्ली वासियों को मिलने नहीं दिया। सबके सर पर पक्की छत, अब दिल्ली में भी कर दिखाएंगे। यह मुफ्तखोरी की आदत नहीं डालेगा ना उम्मीद बंधाएगा। गजब है भाजपाइयों की सोच। पूरे पन्ने का एक विज्ञापन, जहां झुग्गी वहीं फ्लैट का वादा करता है, 1736 कच्ची यानी अवैध कालोनियों को मालिकाना हक देने का भी वादा है। गरीब परिवार की दो लड़कियों को 21 साल की होने पर दो लाख रुपए भी मुफ्तखोरी की आदत नहीं डालेंगे। पांच लाख रुपए का मुफ्त इलाज – बीमा है पर वह सबको देने जैसा प्रचार है और बीमा कराना भी मुफ्तखोरी की आदत डालना नहीं है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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