विश्व हिन्दू महासभा के अध्यक्ष की हत्या स्मृति और दीपेंद्र ने की थी..

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-श्याम मीरा सिंह।।

विश्व हिंदू महासभा के अध्यक्ष रणजीत बच्चन की हत्या का मामला सुलझ चुका है. इंडिया टूडे और आजतक ने रिपोर्ट की है कि रणजीत बच्चन का हत्या, किसी और ने नहीं बल्कि उसकी दूसरी पत्नी स्मृति और उसके बॉयफ्रेंड दीपेंद्र ने की है।

दरअसल रंजीत बच्चन और उसकी दूसरी पत्नी स्मृति के बीच तलाक का मामला कोर्ट में चल रहा था. मामला इतना लंबा खिंच गया कि पत्नी स्मृति किसी दूसरे शख्स यानी अपने बॉयफ्रेंड से शादी नहीं कर पा रही थी. इसलिए उसने अपने पति को निपटाने का ही प्लान बना लिया. बाइक सवार उसके बॉयफ्रेंड ने लखनऊ में रणजीत बच्चन के सर पर गोली मारकर हत्या कर दी थी. फिलहाल लखनऊ पुलिस जैसे-तैसे सीसीटीवी की मदद से कातिल तक पहुंच पाई है।

इस हत्याकांड के बाद आरएसएस और भाजपा वालों ने इसके पीछे मुसलमानों की साजिश बताना शुरू कर दिया था. अब एक बात सोचिए ये लोग कितने निकम्मे हैं अपने ही साथी की मौत के बाद उसे न्याय दिलाने की बजाय उसके शव से भी वोट निकालना चाहते थे. इन्हें कमलेश तिवारी या रणजीत बच्चन उतने प्यारे नहीं हैं बल्कि उनकी हत्या पर हिन्दू-मुसलमान खेलकर अपने लिए वोटर तैयार करना अधिक प्यारा है। ये लोग लाशों पर नृत्य करने वाले लोग हैं. फिर वह लाश भले ही अपना कार्यकर्ता की ही क्यों न हो.

ऐसे ही बंगाल में एक पूरे परिवार की हत्या होने पर इन लोगों ने ममता बनर्जी और मुसलमानों के लिए जहर उगलना शुरू कर दिया था. बाद में पता चला कि वह भ
हत्या भी एक लेनदेन के मामले में हिंदुओं ने ही की थी.

बंगलुरू में भी एक महिला डॉक्टर के साथ दुष्कर्म के बाद जला देने की घटना पर, आरएसएस और भाजपा के लोगों ने एक मुस्लिम आरोपी के नाम को उछालना शुरू कर दिया था. व्हाट्सएप से लेकर ऑप इंडिया जैसी वेबसाइटों ने भी बलात्कार के लिए मुस्लिम नाम ही छापा था ताकि बलात्कार का जिम्मा एक मुसलमान के मत्थे चढ़ाकर हिन्दू-मुसलमान किया जा सके. बाद में पता चला कि दुष्कर्म करने में अन्य तीन अपराधी तो हिन्दू मजहब से ही थे.

इन्हें न हिंदुओं से संवेदनाएं हैं, न बच्चियों से हैं, इन्हें अपने कार्यकर्ताओं से भी कोई संवेदनाएं नहीं हैं, असल में ये लोग आदमी की शक्ल में चील हैं, जिन्हें केवल लाशों से मतलब है…

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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