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देशबन्धु में आज का संपादकीय..

इस देश में जब से मोदी सरकार आई है, तब से नफ़रत, हिंसा, असहनशीलता, कट्टरता को ‘न्यू नाॅर्मल’ बनाकर पेश किया जा रहा है, मानो ये सब इंसानी स्वभाव है और इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। और इसी तरह संसद में स्तरहीन बयानों का अब ‘न्यू लो’ यानी स्तरहीनता का चरम दिखाई दे रहा है।विडंबना है कि यह स्तरहीनता खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तय कर रहे हैं। संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान बीते सालों में निचले दर्जे की टिप्पणियां मोदीजी ने की हैं। याद कीजिए, किस तरह उन्होंने डॉ.मनमोहन सिंह के लिए ‘रेनकोट पहनकर नहाने’ वाला कटाक्ष किया था। अब एक बार फिर वैसी ही घटिया टिप्पणियां संसद के रेकाॅर्ड में दर्ज हुई हैं।

देश इस वक्त बेहद नाजुक मोड़ से गुज़र रहा है। आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। नागरिकता कानून, एनआरसी जैसे फैसलों को लेकर गरीब, अल्पसंख्यक, कमजोर लोगों में डर बैठा हुआ है कि कहीं वे अनागरिक घोषित न कर दिए जाएं। अगर ऐसा हुआ तो वे कहां जाएंगे? धर्म के आधार पर नागरिकता देने का फैसला संविधान को उलटने जैसा है। इन्हीं सब वजहों से एक बड़ी आबादी, जिसमें महिलाएं ज्यादा हैं, देश भर में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रही हैं। शाहीन बाग, लोकतंत्र और संविधान बचाने का नया मंच बन गया है। जिस लोकतांत्रिक देश में जनता अरसे से उद्वेलित हो, उस देश के शासक की नींद उड़ जानी चाहिए कि आखिर उसके फ़ैसले से जनता के भरोसे को ठेस क्यों पहुंची ? उसे आत्ममंथन करना चाहिए ।

लेकिन अफ़सोस कि मोदीजी का व्यवहार इसके ठीक विपरीत है। वे शाहीन बाग के प्रदर्शन का मखौल उड़ा रहे हैं। उनकी पुलिस प्रदर्शनकारियों पर अत्याचार कर रही है। उनके समर्थक आंदोलनकारियों को बदनाम करने के नित नए पैंतरे आजमा रहे हैं। और मोदीजी ऐसा करने वालों का हौसला बढ़ा रहे हैं। वे अगर संसद में इन प्रदर्शनों से असहमति होते हुए भी प्रदर्शनकारियों के बारे में यह कहते कि वे लोकतंत्र के अधिकारों का उपयोग कर रहे हैं, तो जनता के बीच यह संदेश जाता कि प्रधानमंत्री को सचमुच हमारी फ़िक्र है। लेकिन वे तो विपक्षी दलों पर, नेहरूजी पर कटाक्ष करने से ही बाज नहीं आ रहे।

आज उन्होंने यह कहा कि प्रधानमंत्री बनने की इच्छा किसी की भी हो सकती है. लेकिन इस इच्छा को पूरा करने के लिए देश पर एक लकीर खींच दी गई। साफ़ नज़र आ रहा है कि मोदीजी ने बंटवारे का जिम्मेदार नेहरूजी को ठहरा दिया। संघ शुरु से इसी झूठ को फैलाता और दोहराता आया है और मोदीजी ने इस पर संसद में ठप्पा लगवाना की कोशिश की। उन्होंने बड़ी चालाकी से नागरिकता कानून को गांधी-नेहरू की भावनाओं से जोड़ दिया। आज़ादी के समय के हालात अलग थे और आज अगर गांधी-नेहरू होते तो वे सुरक्षा व्यवस्था की परवाह किए बिना शाहीन बाग जा कर बैठ जाते, फिर भले नाराज़ लोग उन पर पत्थर क्यों न बरसाते।

लेकिन मोदीजी का पूरा ध्यान तो इस वक्त गांधी को हथियाने में लगा है। जब कांग्रेस समेत विपक्षी सांसदों ने अनंत हेगड़े के स्वतंत्रता आंदोलन वाले अशोभनीय बयान पर उनसे जवाब चाहा तो उन्होंने कहा कि आपके लिए गांधी ट्रेलर होंगे, हमारे लिए ज़िंदगी हैं। अगर सचमुच ऐसा है तो क्यों नहीं इस सरकार में गांधी की विचारधारा के दर्शन होते? मोदी सरकार तो गोली की भाषा को बढ़ावा देेने में लगी है। राहुल गांधी के डंडे वाले बयान पर मोदीजी का जवाब था कि मैं अपनी पीठ को डंडे झेलने वाला बना लूंगा। वे अपने आप को पीड़ित दिखाते हुए कहते हैं कि 20 वर्षों से गालियां सुनता आ रहा हूं, अब मैंने खुद को गाली प्रूफ बना लिया है। ऐसी सहनशीलता इस लोकतांत्रिक देश के शासक में होनी ही चाहिए, लेकिन विपक्षियों का आदर करने का भाव भी होना चाहिए।

वे अगर अपशब्द सुनते हैं तो क्या उन्होंने राहुल गांधी, सोनिया गांधी, यहां तक कि दिवंगत राजीव गांधी के लिए अपशब्द नहीं कहे? उनकी पार्टी के सांसद संसद भवन में राजीव गांधी का नाम गलत लेते हैं, राहुल गांधी को शहज़ादा, पप्पू और न जाने क्या-क्या कहते हैं । आज भी मोदीजी ने राहुल गांधी को ट्यूबलाइट कहा। क्या एक निर्वाचित सांसद का इस तरह सदन मेंं अपमान करके मोदीजी भारत की जनता का अपमान नहीं कर रहे हैं? जिस सम्मान की अपेक्षा उन्हें हैं, वही सम्मान उन्हें और उनके सांसदों को पहले विपक्षियों को देना चाहिए। आप किसी की इज़्ज़त करेंगे, तब ही तो आप इज़्ज़त पाएंगे भी.

देश लगातार संसद में सरकार की ओर से स्तरहीनता के नए उदाहरण देख रहा है। क्या मोदी सरकार यही चाहती है कि जनता का भरोसा संसदीय परिपाटी से उठ जाए? अगर नहीं तो संसद की मर्यादा कायम रखने की कोशिश सरकार क्यों नहीं कर रही है? मोदीजी ने सही कहा कि लोगों ने सिर्फ एक सरकार बदली है- केवल ऐसा नहीं है, बल्कि सरोकार भी बदलने की अपेक्षा की है। अब उन्हें विचार करना चाहिये कि क्या वे लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतर रहे हैं?

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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