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-मुकेश नेमा।।

बैंक वाले बुरा ना मानें ! वो खुद चोर होते हैं ! क्रेडिट कार्ड के रखरखाव के नाम से ,मिनिमम बैलेंस के नाम से और भी दूसरे दर्जनों बहानों से पब्लिक का धन चुरा लिया जाता है ! यदि हमारी दयालु सरकार पाँच लाख तक जमा की ज़िम्मेदारी नहीं लेती तो बैंक वाले कभी भी आपको सड़क पर ला सकते थे ! इंग्लैंड का सिटी बैंक कौन सा हमारे बैंकों से अलग होगा ! ऐसे में पारस ने केवल चोर के घर चोरी की है जिसे लेकर इतना शोर शराबा करना अपने आप में ग़लत बात है !
अब लंदन के सिटी बैंक के कर्ता धर्ताओं को चाहिये कि वो भागवत पढ़ें ! हमारे कृष्ण जी माखनचोर थे ! रसखान ने बताया है कि वो चोरी के माखन को रोटी में लगा कर खाते थे ! ब्रैड सैंडविच माखन रोटी ही है ऐसे मे इस धार्मिक बालक के इस पवित्र काम की तो सराहना करने के बजाय उसकी नौकरी ले लेने की आलोचना की ही जाना चाहिये !

सैंडविच का सीधा संबंध भूख से है और चीज़ लगा सैंडविच भूख में इज़ाफ़ा ही करता है ! और किसी बैंक के मेनुअल में यह नहीं लिखा कि बैंकर को भूख नहीं लग सकती ! पेट पापी होता है और पारस को इसी पापी पेट ने सैंडविच चुराने के लिये मजबूर किया ! भूख भगवान ने बनाई है इस लिहाज़ से ये पारस की नहीं भगवान की गलती है !
खाने पीने की चोरी को चोरी मानते ही नहीं हम लोग ! हमारे यहाँ ज़िम्मेदार लोग गेंहू चावल से भरे सरकारी गोदाम खा लेते हैं और कोई बुरा नहीं मानता ! स्कूली बच्चों के मध्याह्न भोजन को यदि मास्टर नहीं चखेगा तो ये कैसे पता चलेगा कि वो बना कैसा है ! जहाँ भी चिकनाई दिखाई देती है हमारा मन चोर होने का होने लगता है ! ऐसे में एक सैंडविच की चोरी के बदले किसी ज़हीन लड़के की नौकरी खा जाना तो बेहद निंदनीय है !
और फिर कौन चोर नहीं ! ये लंदन वाले खुद चोर हैं ! सैकड़ों बरसों तक ये हिंदुस्तान को लूटते रहे ! अंग्रेजों के आने के पहले हम दुनिया की सत्ताईस फ़ीसदी जीडीपी के हिस्सेदार थे और इनके जाने के बाद ये फ़क़त दो फ़ीसदी बची ! उनके पास जो कुछ भी है हमारा ही है ! इस सच्चे हिंदुस्तानी ने केवल अपनी चीज़ वापस लेने की कोशिश भर की और सैंडविच उन्हें इसलिये लेना पड़ा क्योंकि वो चीज़ सैंडविच था !
चोरी करना सबके बूते की बात है भी नहीं ! चोर का हिम्मती ,धीरजमंद ,होशमंद और अक़्लमंद होना ज़रूरी है ! इन ख़ासियतो के बिना आप ना खुद आगे बढ़ सकते हैं ना अपने देश को आगे ले जा सकते है ! पारस के पास ये सारी क़ाबिलियत थी ! यह बंदा जो प्रमोशन का हक़दार था बेमतलब में नौकरी से निकाल दिया गया है !
इंग्लैंड वैसे ही गरीब हो चला है अब ! कभी पूरी दुनिया पर राज करने वाले इस देश की अब एक एक सैंडविच का हिसाब रखने की नौबत आन पड़ी है ! नौकरियाँ है नहीं वहाँ अब ! उनके यहाँ की नई पीढ़ी की पढ़ने लिखने में भी ज़्यादा दिलचस्पी है नहीं ऐसे में हिंदुस्तान के इस पारस पत्थर जैसे होनहार बालक को नौकरी से निकाल दिया जाना उन्हें भारी पड़ सकता है !
बैंक वालो को यह भी याद रखना चाहिये था कि वो शाह है ! शाह को कुछ भी करने या लेने के पहले किसी की परमीशन की ज़रूरत नहीं होती !
ख़ैर ! सिटी बैंक ने ऐसा करके ख़ुद अपना ही नुक़सान किया है ! ये बालक इस बैंक को इस्ट इंडिया कंपनी में तब्दील कर सकता था ! इंग्लैंड को एक बार फिर दुनिया का शाह बना सकता था ये बंदा ! पर ये देश इस बेहतरीन मौक़े को गँवा बैठा है !

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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