गुप्त विकास: विकास हुआ लेकिन देशवासियों को पता ही न चला..

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देश ऐसा बदला कि गृह मंत्री को पर्चा बांट कर बताना पड़ रहा है

-संजय कुमार सिंह।।

दिल्ली के अखबारों और अखबारों के दिल्ली संस्करण में आज खबरों के पहले पन्ने पर भाजपा के दो विज्ञापन हैं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का कोई नहीं। इससे भाजपा के चुनावी बजट, ईमानदारी आदि का) अनुमान लगाइए। नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण में पहले पन्ने पर ये विज्ञापन नहीं हैं, दैनिक हिन्दुस्तान में पहले पन्ने का पूरा विज्ञापन है और भाजपा का विज्ञापन खबरों के पहले पन्ने पर है। अमर उजाला के पहले पन्ने पर भी पूरा विज्ञापन है। नेट पर मुफ्त में आगे के पन्ने नहीं दिखते, मैं नहीं देखता (कल बाजार से खरीद लाया था)। मैं जो अखबार देखता हूं उनमें राजस्थान पत्रिका के दिल्ली संस्करण में भी ये विज्ञापन नहीं है पर वहां पहले पन्ने पर सात कॉलम का बॉटम है – मोदी बनाम केजरीवाल की ओर बढ़ी दिल्ली की राजनीति, चुनावी घमासान तेज। इस खबर के साथ एक फोटो है जिसमें भाजपा के पूर्ण अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह चुनाव प्रचार के तहत पर्चा बांटते दिख रहे हैं।

इस विवरण के बाद कहा जा सकता है कि जिन अखबारों के दिल्ली संस्करण मैं नेट पर देखता हूं उनमें दैनिक भास्कर और नवोदय टाइम्स ही दो अखबार हैं जिनमें भाजपा के दो विज्ञापन पहले पन्ने पर हैं। अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि इन विज्ञापनों के लिए अखबारों के चयन का आधार क्या रहा होगा। मैं उसपर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा। सिर्फ यह बताउंगा कि बाकी अखबारों में किसी भी पार्टी का विज्ञापन पहले पन्ने पर वैसे नहीं है जैसे भाजपा का है। यही नहीं, हिन्दी अखबारों में हिन्दी में प्रकाशित आठ कॉलम के पट्टीनुमा इन विज्ञापनों में अलग-अलग बातें कही गई हैं। नवोदय टाइम्स के विज्ञापन में कहा गया है, रेहड़ी – पटरी वालों का नियमितीकरण और जीवन बीमा (प्राइवेट कंपनियों से सरकारी बीमा कराना अलग मुद्दा है उसपर फिर कभी)। दैनिक भास्कर के विज्ञापन में कहा गया है, दिव्यांगों, विधवाओं व बुजुर्गों की पेंशन बढ़ोत्तरी। दैनिक हिन्दुस्तान का विज्ञापन है, कॉलेज जाने वाली गरीब छात्राओं को स्कूटी का उपहार।

भाजपा संकल्प पत्र 2020 की इन घोषणाओं के साथ हर वचन निभाएंगे, दिल्ली में करके दिखाएंगे का दावा भी है। मुझे 50 दिन में सपनों के भारत के वादे की याद आ रही है। इन विज्ञापनों से आप समझ सकते हैं कि इनपर कितना परिश्रम किया गया है और कितना धन खर्च किया गया है। इसके साथ प्रकाशित खबरें भी गौरतलब हैं। हिन्दुस्तान में चार कॉलम के बाटम लीड का शीर्षक है – दिल्ली के 11 लाख से अधिक मतदाता ‘लापता’ छापा है। बाकी चार कॉलम में भाजपा का विज्ञापन है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है – अंतिम सूची में दिए गए पते से गायब लोगों को जांच पड़ताल के बाद ही मतदान करने दिया जाएगा। वैसे तो यह खबर सामान्य है और अक्सर चुनाव के आस-पास ऐसी खबरें छपती हैं। पर दुनिया जानती है कि देश में मतदान मतदाता सूची के अनुसार होते हैं और मतदान वही करता है जिसका नाम मतदाता सूची में होता है। मतदान करने के लिए आपका नागरिक होना पर्याप्त नहीं है। यानी आप पासपोर्ट, आधार कार्ड या पैन कार्ड दिखाकर वोट नहीं डाल सकते हैं। वोट डालने के लिए मतदाता सूची में नाम होना चाहिए। मतदाता सूची जैसे बनती है वैसे बनती है उसमें नाम होने के बाद कोई लापता है या उस पते पर नहीं रहता है इसका कोई मतलब नहीं है। और यह पासपोर्ट या आधार कार्ड के मामले में भी सही है। पर चुनाव के समय चर्चा मतदाता सूची की ही होगी।

भले ही यह चुनाव नागरिकता संसोधन कानून के विरोध और समर्थन के विवाद में हो रहा हो और उसकी जरूरत पर भी सवाल उठाया जा सकता है जो कभी नहीं उठा या नहीं के बराबर उठा है। अगर नागरिकता संशोधन होना है। एनआरसी के लिए उसकी जांच होनी है तो मतदाता ही नहीं, चुनाव लड़ने वालों और स्टार प्रचारकों की भी नागरिकता की जांच होनी है। पर यह खबर सिर्फ मतदाताओं के लापता होने की है। स्टार प्रचारकों और उम्मीदवारों की स्थिति से इसका संबंध नहीं है। पर आजकल पत्रकारिता ऐसी ही है। टीआरपी वाली, जनहित वाली नहीं। इसीलिए, आज के बाकी अखबारों में पहले पन्ने की चुनावी खबरों में, 300 यूनिट बिजली फ्री देने का कांग्रेस का वादा (नवोदय टाइम्स) है। निर्भया के दोषियों को फांसी भी आजकल चुनावी खबर है और यह दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान में पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। पर यह खबर पहले पन्ने पर नहीं दिखी कि केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष घर-घर जाकर पर्चा बांट रहे हैं (पत्रिका छोड़कर)। मुझे याद नहीं है कि पिछली बार गृहमंत्री या भाजपा अध्यक्ष या किसी पार्टी के अध्यक्ष ने स्वयं पर्चा बांटा हो। दिल्ली में या कहीं और। ऐसे में यह बड़ी खबर है पर अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं दिखी।

आइए, इस छिपी या दबी खबर के आलोक में भाजपा के विज्ञापनी दावों को भी देख लें। पहले पन्ने पर लगभग चौथाई पन्ने के विज्ञापन में सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर है। भाजपा ने इस बार दिल्ली चुनावों के लिए अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बताया है। इसलिए इस विज्ञापन में किसी और की फोटो नहीं है। पर दूसरे दल जब मुख्यमंत्री पद का या लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावे दार की घोषणा नहीं की थी तो भाजपा और उसके समर्थकों का रुख क्या था, याद कीजिए। अभी इसपर कैसा सन्नाटा है ध्यान दीजिए। प्रधानमंत्री की रैली की इस सूचना (या विज्ञापन) में देश बदला, अब दिल्ली बदलो। दिल्ली चुनाव प्रचार में यह भाजपा की टैगलाइन है। पर ना कोई पूछ रहा है और ना बता रहा है कि देश क्या बदला? संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास कम हुआ, जीडीपी आठ से चार प्रतिशत की ओर अग्रसर है, बेरोजगारी चरम पर है, टैक्स संग्रह कम है, महंगाई का कोई मुकाबला नहीं है, विमानसेवाओं ही नहीं भारतीय रेल को भी यात्रियों को लूटने का लाइसेंस दे दिया गया है, सरकारी नौकरियों में बहाली का वही हाल है, बैंकों का बुरा हाल है, ब्याज के पैसे से जीने वाले पेंशनभोगियों की आय कम हो गई है।

इनकी चर्चा नहीं करके देश बदला के दावों पर चुप रहना राष्ट्रद्रोह नहीं है? जहां तक दिल्ली बदलने की बात है, पूर्वांचल के लोग इलाज कराने दिल्ली वैसे ही आ रहे हैं, स्कूलों में बदलाव सड़क चलते दिखने लगता है आप इसे बदलकर क्या बनाएंगे? कोई सवाल नहीं। उल्टे दैनिक भास्कर वित्त मंत्री से सीधी बात छाप रहा है। शीर्षक एक सवाल जवाब है जो इस प्रकार है। सवाल : रोजगार कितने मिलेंगे, आंकड़ा क्यों नहीं दिया? जवाब : “मान लीजिए मैं आंकड़ा बोल दूं – एक करोड़, फिर राहुल गांधी पूछेंगे कि एक करोड़ नौकरियों का क्या हुआ? इसलिए नहीं बताया।” आपको यह जवाब ठीक या सामान्य लगता है तो अच्छा है। आप तनाव नहीं पालते। मत पालिए। स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदेह होता है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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